परिचय
व्यक्तित्व - संजय शर्मा
( संस्थापक एवं एडिटर-इन-चीफ, 4 PM न्यूज़ नेटवर्क )
बदायूँ से निकला एक पत्रकार, जिसने कभी दूसरे संस्थानों में नौकरी की, आज 120 से अधिक लोगों को रोजगार देने वाला मीडिया संस्थान चला रहा है. जिसकी आवाज एक शहर से उठी और आज दुनिया के 140 से अधिक देशों में सुनी जाती है. संजय शर्मा का सफर अपने विश्वास पर टिके रहने, मुश्किल समय में लड़ने और हर बाधा के बाद फिर खड़े होने की कहानी है.
साढ़े तीन दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय संजय शर्मा ने राष्ट्रीय सहारा, ईटीवी और स्टार न्यूज़ जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में काम किया. राजनीति विज्ञान में एम.ए. और एलएल.बी. की शिक्षा प्राप्त शर्मा ने जमीन पर रिपोर्टिंग करते हुए लोगों की तकलीफों और व्यवस्था की कार्यप्रणाली को करीब से समझा. साधारण नागरिक की वह बात, जो बड़े दरवाजों तक पहुँचते-पहुँचते दब जाती है, उनकी पत्रकारिता में जगह पाती रही.
वर्ष 2005 में उन्होंने ‘वीक एंड टाइम्स’ की शुरुआत की. अपना प्रकाशन खड़ा करना उनके जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ था. अब खबर लिखने के साथ संस्थान चलाने, लोगों को साथ जोड़ने और हर महीने उनकी आजीविका की जिम्मेदारी भी उनके कंधों पर थी. इसके बाद लखनऊ से सांध्य दैनिक ‘4 PM’ के माध्यम से उन्होंने अपनी स्वतंत्र संपादकीय पहचान को विस्तार दिया.
इस सफर में सीमित संसाधन भी थे और बड़े दबाव भी. लेकिन उनके भीतर अपना मंच बनाने का विश्वास बना रहा. उन्होंने धीरे-धीरे टीम तैयार की, पाठकों का भरोसा अर्जित किया और बदलते समय के साथ नए माध्यमों को अपनाया.
वर्ष 2018 में डिजिटल पत्रकारिता की ओर बढ़ाया गया उनका कदम आज एक बड़े मीडिया नेटवर्क का रूप ले चुका है. 4 PM के अंतर्गत 18 यूट्यूब चैनल संचालित हैं. मुख्य चैनल के 90 लाख सब्सक्राइबर हैं और प्रतिदिन लगभग एक करोड़ व्यू आते हैं. दर्शकों और व्यू के डेटा के आधार पर 4 PM पिछले चार वर्षों से लगातार देश में नंबर वन बना हुआ है. आज इसे दुनिया के 140 से अधिक देशों में देखा जाता है.
इन आँकड़ों के पीछे एक व्यक्ति की वर्षों की मेहनत और उसके साथ खड़ी टीम का समर्पण है. कभी स्वयं नौकरी करने वाले संजय शर्मा ने ऐसा संस्थान बनाया है, जिससे आज 120 से अधिक परिवारों की आजीविका जुड़ी है. उन्होंने युवा पत्रकारों को अवसर दिए, उनकी क्षमताओं पर भरोसा किया और उन्हें अपनी पहचान बनाने का मंच दिया.
संजय शर्मा की पहचान जनहित के सवालों को अदालत तक लेकर जाने वाले पत्रकार की भी है. कोरोना काल में गंगा में बहते शवों का मामला हो, पान और तंबाकू थूकने से जुड़ा जनस्वास्थ्य का प्रश्न, जेपीएनआईसी को तोड़े जाने का मुद्दा या नौकरशाही में कथित भ्रष्टाचार—उन्होंने रिपोर्टिंग के साथ हाईकोर्ट में जनहित याचिकाएँ दाखिल कीं. उनके उठाए कई मुद्दे और न्यायिक प्रयास राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बने.
उनके लिए किसी पीड़ित की बात सुनना उसके प्रति जिम्मेदारी की शुरुआत रही है. जहाँ उन्हें लगा कि सार्वजनिक हित में हस्तक्षेप जरूरी है, वहाँ उन्होंने समय, संसाधन और जोखिम की परवाह किए बिना कानूनी रास्ता अपनाया.
इस निर्भीकता की कीमत भी उन्हें चुकानी पड़ी. उनके चैनल को दो बार ब्लॉक किया गया. पहलगाम हमले के बाद पहली रोक लगी तो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ी. न्यायालय में मामला पहुँचने के बाद सरकार ने रोक वापस ली और चैनल फिर दर्शकों तक पहुँचा. दूसरी बार रोक लगी तो उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. अदालत ने कुछ विवादित वीडियो पर अस्थायी रोक की शर्त के साथ चैनल बहाल करने का आदेश दिया.
एक संस्थापक के लिए अपना चैनल बंद होते देखना बहुत कठिन होता है. स्क्रीन के साथ उसकी वर्षों की मेहनत रुकती है, कर्मचारियों के भविष्य की चिंता सामने आती है और दर्शकों से रोज का संवाद टूट जाता है. संजय शर्मा ने ऐसे समय में अपनी टीम को संभाला, अदालत में लड़ाई लड़ी और दोबारा काम शुरू किया.
जाँच एजेंसियों की पड़ताल, हमलों और दबावों का सामना करने के बावजूद उन्होंने पत्रकारिता जारी रखी. सरकारों से सवाल पूछने और कठिन परिस्थितियों में भी अपने सवालों के साथ खड़े रहने के कारण देशभर में उनकी पहचान बनी. उनके काम में एक ऐसे योद्धा का धैर्य दिखाई देता है, जो चोट और थकान के बीच भी अपनी जिम्मेदारी नहीं भूलता.
बाधाओं के बीच उन्होंने भारत के बाहर भी अपना कार्यक्षेत्र बढ़ाया. दुबई जाकर ‘4 PM मिडिल ईस्ट’ की शुरुआत की और विदेश में रहने वाले दर्शकों से जुड़ने का नया रास्ता बनाया. आज यह चैनल भी अपनी मजबूत पहचान बना रहा है.
दुनिया के अलग-अलग देशों में बसे दर्शकों के बीच संजय शर्मा के प्रति गहरा लगाव और उनकी बात सुनने की उत्सुकता है. उन्हें विभिन्न देशों में संवाद और कार्यक्रमों के लिए आमंत्रित किया जाता रहा है. अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन में वक्तव्य देने का आमंत्रण उनकी यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव रहा. बदायूँ से शुरुआत करने वाला पत्रकार अपने अनुभव और विचार लेकर अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक मंच तक पहुँचा. उनके संघर्षों और पत्रकारिता पर ‘द हिंदू’ सहित देश-विदेश के प्रतिष्ठित समाचार माध्यमों ने लिखा है.
समाचारों के साथ उन्होंने लोगों के जीवन को समझने के लिए ‘4 PM पॉडकास्ट’ शुरू किया. फिल्म कलाकारों, संगीतकारों, गायकों, वरिष्ठ नौकरशाहों और देश की जानी-मानी हस्तियों के साथ बातचीत में उन्होंने उनकी उपलब्धियों के पीछे के संघर्ष और अनुभव सामने रखे. इन संवादों ने दर्शकों को प्रसिद्ध चेहरों के भीतर के इंसान से परिचित होने का अवसर दिया.
‘4 PM म्यूज़िक’ के माध्यम से उन्होंने उन प्रतिभाओं को सहारा दिया, जिनके पास हुनर था, लेकिन अपनी आवाज लोगों तक पहुँचाने के साधन नहीं थे. संघर्ष करके आगे बढ़े संजय शर्मा ने दूसरों के संघर्ष को पहचाना और उनके गीतों को मंच दिया. किसी नए कलाकार के लिए पहला अवसर कितना मायने रखता है, इसकी संवेदनशील समझ उनकी इस पहल में दिखाई देती है.
शॉर्ट फिल्मों के लिए उन्होंने ‘4 PM फिल्म्स’ चैनल शुरू किया. इस मंच की दो शॉर्ट फिल्मों ने लगभग दस-दस लाख व्यू हासिल किए हैं. दर्शकों का यह स्नेह कहानियों और नई प्रतिभाओं को आगे लाने के उनके प्रयास को ताकत देता है.
फीचर फिल्म ‘सहिया’ का निर्माण उनकी रचनात्मक यात्रा का एक और महत्वपूर्ण अध्याय है. सेंसर बोर्ड ने प्रमाणन रोका तो वे अपनी फिल्म के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट पहुँचे. लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अदालत ने बोर्ड को 27 अक्टूबर 2026 तक अंतिम निर्णय देने का निर्देश दिया. अपनी बात कहने और अपनी रचना दर्शकों तक पहुँचाने के लिए उन्होंने यहाँ भी संघर्ष का रास्ता चुना.
संगीत और संस्कृति की पहल ‘तहज़ीब’ के माध्यम से वे कलाकारों और श्रोताओं को भी जोड़ रहे हैं. एक पत्रकार के रूप में शुरू हुआ उनका सफर आज समाचार, पॉडकास्ट, फिल्म, संगीत और अंतरराष्ट्रीय प्रसारण तक विस्तृत है.
संजय शर्मा की कहानी में सबसे अधिक प्रभावित करने वाली बात हर कठिन दौर के बाद उनका फिर काम पर लौटना है. अपने संस्थान के लिए लड़ते हुए उन्होंने दूसरों के लिए अवसर बनाए. अपनी आवाज बचाते हुए नई आवाजों को मंच दिया. छोटे शहर से निकले अपने सपने को उन्होंने ऐसा आकार दिया, जिसमें आज अनेक लोगों के सपने जगह पाते हैं.
उनकी पहचान उस पत्रकार की है, जिसे रोका गया तो वह अदालत पहुँचा, जिसके रास्ते बंद हुए तो उसने नए रास्ते बनाए और जिसे मुश्किलों ने घेरा तो वह अपनी टीम के साथ फिर खड़ा हो गया. बदायूँ से दुनिया तक की यह यात्रा उसी साहस, संवेदना और विश्वास से बनी है.