कुर्सी पर बैठने को लेकर भिड़े सपा नेता, मारपीट के बाद अखिलेश यादव ने किया बड़ा फैसला

समाजवादी पार्टी एक ओर जहां देशभर में लोकतंत्र बचाने और लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती की बात कर रही है,

4पीएम न्यूज नेटवर्क: समाजवादी पार्टी एक ओर जहां देशभर में लोकतंत्र बचाने और लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती की बात कर रही है,

वहीं उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में पार्टी के एक कार्यक्रम के दौरान हुआ विवाद अब सियासी चर्चा का विषय बन गया है। शनिवार को प्रेस क्लब में आयोजित कार्यक्रम के दौरान कुर्सी पर बैठने को लेकर विवाद इतना बढ़ गया कि मारपीट और थप्पड़ मारने के आरोप सामने आए।

मामले में पार्टी के भीतर कार्रवाई भी तेजी से हुई। पूर्व जिलाध्यक्ष नगीना साहनी से कथित मारपीट के आरोपों के बाद अंशुमान सिंह को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। इसके अगले ही दिन रविवार को सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने गोरखपुर की जिला और महानगर कार्यकारिणी समेत प्रदेश की सभी कार्यकारिणियों को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया।

समाजवादी पार्टी में गोरखपुर के विवाद के बाद संगठन स्तर पर बड़ा फैसला लिया गया है। पार्टी के केंद्रीय कार्यालय से जारी पत्र के मुताबिक, कार्रवाई का दायरा केवल गोरखपुर के जिला संगठन तक सीमित नहीं है। जिला और महानगर कार्यकारिणी के साथ-साथ फ्रंटल संगठनों की प्रदेश कार्यकारिणियों के पदाधिकारियों और सदस्यों को भी तत्काल प्रभाव से हटा दिया गया है।

पार्टी के इस फैसले को शनिवार को सामने आए विवाद की तत्काल प्रतिक्रिया से आगे एक व्यापक संगठनात्मक कदम के तौर पर देखा जा रहा है। गोरखपुर में लंबे समय से नेताओं के बीच मतभेद, राजनीतिक दावेदारी और संगठन के भीतर वर्चस्व को लेकर खींचतान की चर्चाएं होती रही हैं।

एक घटना नहीं, लंबे समय से जमा हो रहा था असंतोष
जफर अमीन डक्कू प्रकरण ने भी स्थानीय संगठन की मुश्किलें बढ़ाई थीं। जेल में बंद डक्कू ने पत्र लिखकर जिलाध्यक्ष ब्रजेश गौतम और कुछ पार्षदों को उनसे मिलने की जरूरत न होने की बात कही थी। उन्होंने जिलाध्यक्ष पर उनकी बात पूरी तरह नहीं सुनने का आरोप लगाया था। इसके जवाब में ब्रजेश गौतम ने भी डक्कू पर पलटवार किया था। मामला पार्टी के अंदर सार्वजनिक बहस का विषय बन गया।

इसके पहले भी गोरखपुर सपा में नेतृत्व और गुटों के बीच खींचतान के कई प्रसंग सामने आते रहे हैं। ऐसे में शनिवार का विवाद सिर्फ दो नेताओं के बीच कुर्सी को लेकर हुई कहासुनी नहीं था। जिस समय जिलाध्यक्ष बृजेश गौतम ‘लोकतंत्र बचाओ’ अभियान को लेकर पत्रकार वार्ता कर रहे थे, उसी समय पार्टी के पूर्व जिलाध्यक्ष नगीना साहनी के साथ मारपीट ने संगठन की अनुशासन व्यवस्था पर ही सवाल खड़ा कर दिया।

नगीना से बृजेश तक, बदलते रहे चेहरे
गोरखपुर में संगठन के नेतृत्व का इतिहास भी शीर्ष नेतृत्व की लगातार कोशिशों को दिखाता है। नगीना साहनी को मार्च 2020 में जिलाध्यक्ष बनाया गया था। करीब डेढ़ साल बाद जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव में पार्टी के खराब प्रदर्शन के बाद उन्हें हटा दिया गया और अवधेश यादव को जिम्मेदारी दी गई। इसके बाद मार्च 2023 में ब्रजेश कुमार गौतम को जिलाध्यक्ष बनाया गया। वह करीब साढ़े तीन वर्ष से इस पद पर थे।

यानी नगीना साहनी का जिलाध्यक्ष के रूप में कार्यकाल करीब डेढ़ वर्ष ही रहा, लेकिन उनके बाद भी संगठन के भीतर खेमेबंदी का सिलसिला पूरी तरह नहीं थमा। अब ब्रजेश गौतम के नेतृत्व वाली कार्यकारिणी भी भंग हो गई है।

राजनीतिक रूप से देखें तो अखिलेश यादव का ताजा फैसला चेहरों से ज्यादा संगठन की कार्यशैली पर सवाल है। 2027 का चुनाव सामने है और गोरखपुर सपा के लिए राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे समय में स्थानीय नेतृत्व यदि टिकट की दावेदारी, व्यक्तिगत वर्चस्व और आपसी टकराव में उलझता दिखे तो उसका सीधा असर चुनावी तैयारी पर पड़ना स्वाभाविक है।

इसलिए शनिवार का थप्पड़ शायद केवल एक विवाद का अंत नहीं, बल्कि लंबे समय से जमा हो रही शिकायतों पर नेतृत्व की बड़ी कार्रवाई का ट्रिगर बना है। अब असली परीक्षा नई जिला और महानगर टीम के गठन की होगी। अखिलेश यादव गोरखपुर में पुराने गुटों के बीच संतुलन बनाते हैं या पूरी तरह नए चेहरों के साथ संगठन खड़ा करते हैं, यही तय करेगा कि यह फैसला महज कार्यकारिणी भंग करने तक सीमित रहता है या सपा गोरखपुर में संगठनात्मक रीसेट की ओर बढ़ती है।

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