पूरे देश में चल रहे वोटर लिस्ट के खेल की खुली पोल, एसडीएम पर एफआईआर दर्ज

पहले मांगते थे सबूत, अब दो जवाब दिल्ली से पीलीभीत तक मतदाता सूचियों पर सवाल

फिर बहस के केंद्र में चुनाव आयोग की जवाबदेही
लोकतंत्र में मतदाता सूची किसी सरकार, विपक्ष या चुनाव आयोग की निजी संपत्ति नहीं
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। वोट चोरी, मतदाता सूचियो में हेर फेर और वोट डालने के अधिकार को लेकर चल रहे संघर्षों के बीच देश की सबसे बड़ी खबर पीलीभीत से। पीलीभीत में पकड़ में आयी मतदाता सूचियों में हेर फेर से लोकतंत्र के जंगल में आग सी लग गयी है और इस गड़बड़झाले को विपक्षी पार्टियां अपने आरोंपों के पुख्ता सबूत के तौर पर पेश कर रही है।
हालांकि इस पूरे प्रकरण में जेम्स बांड वाली भूमिका समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक हेमराज वर्मा ने निभाई थी लेकिन अपनी आक्रमक नीति के चलते इस पूरे मुददे को कांग्रेस ले उड़ी और प्रेस कांफ्रेंस के जरिये ऐसी चिंगारी लगाई कि चुनाव आयोग को जवाब देते नहीं बन रहा है। पहली बार विपक्ष के आरोपों की जद में दो एसडीएम और एक कंम्यूटर आपरेटर पर एफआईआर दर्ज की जा चकी है। चुनाव आयोग ने पूरे प्रदेश की मतदाता सूचियों को नवंबर से पहले फिर से खंगाले जाने के आदेश दिये हैं।

पूरी कहानी का सबसे ठोस और ताजा सिरा उत्तर प्रदेश के पीलीभीत से आया है

पीलीभीत सदर विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची में संशोधन को लेकर शिकायतों के बाद जांच कराई गई। जिला निर्वाचन अधिकारी के मुताबिक 31 मई से 29 अगस्त 2026 के बीच मतदाता विवरण में संशोधन के लिए कुल 13,779 फॉर्म-8 की प्रविष्टियां की गई थीं। इनमें 10,470 फॉर्म स्वीकृत और 3,309 अस्वीकृत किए गए। जांच में इन फॉर्मों से जुड़े ऑनलाइन और ऑफलाइन रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं मिले। इसके बाद स्वीकृत 10,470 फॉर्मों की दोबारा जांच के आदेश दिए गए। मामले में तत्कालीन निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों की भूमिका की जांच हुई और दो एसडीएम तथा एक कंप्यूटर सहायक के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। संबंधित अधिकारियों को चुनावी दायित्वों से हटाने और विभागीय कार्रवाई के कदम भी उठाए गए है। सबसे महत्वपूर्ण मुददा यह है कि जब मतदाता सूची में सुधार के लिए निर्धारित प्रक्रिया है तो उसके रिकॉर्ड सुरक्षित रखने और हर संशोधन की जांच सुनिश्चित करने की व्यवस्था कितनी मजबूत है। क्योंकि दिल्ली से बिहार, बंगाल, पंजाब और पीलीभीत तक की घटनाएं एक जैसी नहीं हैं। कहीं नाम हटाए जाने पर विवाद हुआ कहीं प्रविष्टियों की विसंगतियां सामने आईं तो कहीं अधिकारियों पर कार्रवाई हुई और कहीं प्रशासन ने गलती सुधारने की बात कही। इसलिए पूरे देश में एक ही निष्कर्ष निकालने के बजाय हर मामले की अलग जांच और उसके निष्कर्ष सार्वजनिक करना ज्यादा जरूरी है।

चुनाव आयोग के सामने कुछ स्पष्ट सवाल हैं

सवाल नम्बर एक-क्या मतदाता सूची में किए गए हर संशोधन का मूल आवेदन और संबंधित रिकॉर्ड सुरक्षित रखा जा रहा है?
सवाल नम्बर दो-जिन मतदाताओं के नाम, पिता का नाम, पहचान संख्या या अन्य विवरण में विसंगति है उन्हें समय रहते कैसे सूचना दी जाएगी?
सवाल नम्बर तीन-नाम हटाने या बदलने के मामलों में प्रभावित नागरिक को सुनवाई और सुधार का पर्याप्त अवसर कैसे मिलेगा?
सवाल नम्बर चार- जिन मामलों में अनियमितता की जांच चल रही है वहां जांच के निष्कर्ष और सुधारात्मक कार्रवाई सार्वजनिक कब की जाएगी?
सवाल नम्बर पांच-क्या अलग-अलग राज्यों में सामने आई शिकायतों का तुलनात्मक विवरण सार्वजनिक किया जाएगा ताकि गलतियों और वास्तविक अनियमितताओं के बीच अंतर साफ हो सके?

और आखिरी सवाल मतदाता सूची पर भरोसा कैसे बचेगा?

राहुल गांधी और दूसरे विपक्षी नेताओं ने मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया में गड़बडिय़ों को लेकर लगातार सवाल उठाए हैं। चुनाव आयोग ने आरोपों को चुनौती दी है और एसआईआर का बचाव करते हुए कहा है कि इसका उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध करना है। अब पीलीभीत में एफआईआर और दोबारा जांच का आदेश सामने आने के बाद जरूरत है कि जांच पूरी पारदर्शिता से हो। जहां गलतियां हुई हैं उन्हें सुधारा जाए। जहां नियमों का उल्लंघन हुआ है वहां जिम्मेदारी तय हो। लोकतंत्र में मतदाता सूची किसी सरकार विपक्ष या चुनाव आयोग की निजी संपत्ति नहीं है। वह नागरिक के मतदान के अधिकार का आधार है। इसलिए उसकी हर प्रविष्टि का सही होना हर बदलाव का रिकॉर्ड उपलब्ध होना और हर शिकायत की निष्पक्ष जांच होना जरूरी है।

राहुल गांधी लगा रहे हैं लंबे समय से वोट चोरी के आरोप!

देश में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण लेकर विपक्ष लंबे समय से सवाल उठा रहा है। राहुल गांधी ने चुनावी प्रक्रिया में गड़बडिय़ों, संदिग्ध मतदाता प्रविष्टियों और वोट चोरी के आरोप लगाए। चुनाव आयोग ने इन आरोपों को चुनौती देते हुए सबूत मांगे और अपनी प्रक्रिया का बचाव किया। लेकिन अब उत्तर प्रदेश के पीलीभीत से मतदाता सूची में गंभीर अनियमितताओं का ऐसा मामला सामने आया है जिसमें जांच के बाद दो एसडीएम और एक कंप्यूटर सहायक के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। यही वह मोड़ है जहां सवालों का दायरा बढ़ गया है कि क्या मतदाता सूची तैयार करने और उसमें संशोधन करने की व्यवस्था में निगरानी पर्याप्त है? क्या गलत प्रविष्टियों की पहचान समय रहते हो रही है? और अगर रिकॉर्ड ही उपलब्ध न हों तो नागरिक कैसे भरोसा करे कि उसकी पहचान सुरक्षित है? पीलीभीत का मामला अपने आप में देशव्यापी वोट चोरी के आरोपों को प्रमाणित करने की कड़ी मे एक दस्तावेजी सबूत के तौर पर सामने आया है और सवाल उठा रहा है कि मतदाता सूची से जुड़ी शिकायतों की जांच दस्तावेजों की उपलब्धता और जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया कितनी महत्वपूर्ण है।

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