नगर निगम में ₹4,400 करोड़ का घोटाला, आखिर किसकी मिलीभगत से हुए खेल!
नगर निगम की ऑडिट रिपोर्ट की समीक्षा के लिए कोई समिति नहीं होने के चलते ₹4,400 करोड़ के कथित घोटाले का मामला सामने आया है...

4पीएम न्यूज नेटवर्कः दिव्य भास्कर की एक जांच में गुजरात के नगर निगमों और नगर पालिकाओं से जुड़ी वित्तीय व्यवस्था को लेकर चौंकाने वाली बातें सामने आई हैं.. रिपोर्ट के मुताबिक जनता से टैक्स के रूप में जुटाया गया पैसा, जिसे शहरों के विकास.. और नागरिक सुविधाओं पर खर्च किया जाना चाहिए.. उसकी निगरानी और जवाबदेही की व्यवस्था में गंभीर खामियां मौजूद हैं.. गुजरात की पंचायतों की ऑडिट रिपोर्ट की समीक्षा के लिए विधानसभा में पंचायती राज समिति जैसी व्यवस्था है.. लेकिन नगर निगमों और नगर पालिकाओं की ऑडिट रिपोर्ट की समीक्षा के लिए ऐसी कोई विशेष समिति नहीं है.. वहीं सवाल इसलिए भी गंभीर है.. क्योंकि इन शहरी स्थानीय निकायों का बजट पंचायतों की तुलना में कई गुना अधिक होता है..
आपको बता दें कि दिव्य भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार इसी प्रशासनिक.. और कानूनी खामी का फायदा उठाते हुए पिछले एक दशक के दौरान नगर निगमों.. और नगर पालिकाओं में करीब 4,400 करोड़ रुपये की कथित वित्तीय अनियमितताएं और घोटाले सामने आए हैं.. स्थानीय फंड के ऑडिट के दौरान कई मामलों में गड़बड़ियों, नियमों के उल्लंघन.. और वित्तीय अनियमितताओं की जानकारी सामने आती है.. लेकिन सवाल यह है कि इन रिपोर्टों के विधानसभा में पेश होने के बाद उनका क्या होता है.. अगर गंभीर आपत्तियों और करोड़ों रुपये की अनियमितताओं वाली रिपोर्टों पर समयबद्ध तरीके से कार्रवाई नहीं होती.. तो ऑडिट की पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाता है.. जनता को यह जानने का अधिकार है कि उसके टैक्स से जुटाए गए पैसे का इस्तेमाल किस तरह हुआ.. और उसमें गड़बड़ी पाए जाने पर जिम्मेदारी किसकी तय हुई..
लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता द्वारा चुकाया गया हर रुपया सार्वजनिक धन होता है.. यह पैसा सड़क, पानी, सफाई, स्ट्रीट लाइट, अस्पताल, शिक्षा, परिवहन और दूसरी बुनियादी नागरिक सुविधाओं पर खर्च करने के लिए होता है.. लेकिन जब करोड़ों रुपये की लागत से तैयार की गई सड़कें पहली ही मॉनसून की बारिश में खराब होने लगती हैं.. जगह-जगह गड्ढे बन जाते हैं या निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल उठते हैं.. तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल खड़ा होता है.. कि आखिर उस निर्माण पर खर्च हुए पैसे की निगरानी किसने की.. काम की गुणवत्ता जांचने की जिम्मेदारी किसकी थी.. भुगतान किस आधार पर किया गया.. और अगर ऑडिट में भी वित्तीय अनियमितताएं दर्ज हुई हैं.. तो संबंधित अधिकारियों और ठेकेदारों से जवाब क्यों नहीं मांगा गया..
आपको बता दें कि वित्तीय अनुशासन बनाए रखने के लिए ऑडिट सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्थाओं में से एक है.. ऑडिट का उद्देश्य केवल हिसाब-किताब दर्ज करना नहीं.. बल्कि गड़बड़ी मिलने पर जिम्मेदारी तय करना.. और सरकारी धन की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी है.. रिपोर्ट में ऐसे मामलों का उल्लेख है.. जहां कई ऑडिट रिपोर्टों में गंभीर कमियां.. और अनियमितताएं सामने आईं.. लेकिन उनके आधार पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई.. यदि लगातार रिपोर्टों में एक जैसी गंभीर आपत्तियां दर्ज होती रहें.. और उसके बावजूद व्यवस्था में सुधार न हो.. तो यह प्रशासनिक जवाबदेही पर बड़ा सवाल खड़ा करता है.. आखिर ऑडिट रिपोर्ट तैयार होने के बाद उसकी समीक्षा कौन करेगा.. उस पर कार्रवाई की निगरानी कौन करेगा.. और अगर किसी अधिकारी या ठेकेदार की लापरवाही सामने आती है.. तो कार्रवाई की जिम्मेदारी किसकी होगी..
यहां एक और गंभीर सवाल ठेकेदारों से जुड़ा है.. अगर किसी ठेकेदार द्वारा किया गया काम निर्धारित गुणवत्ता के अनुरूप नहीं पाया जाता.. निर्माण कार्य समय से पहले खराब हो जाता है.. या सरकारी नियमों का उल्लंघन सामने आता है.. तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए.. लेकिन अगर खराब प्रदर्शन करने वाले ठेकेदारों को ब्लैकलिस्ट करने के बजाय बार-बार नए टेंडर.. और कॉन्ट्रैक्ट मिलते रहें.. तो इससे पूरी व्यवस्था पर सवाल उठता है.. आखिर ठेकेदारों के चयन की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है.. क्या पुराने काम की गुणवत्ता को नए टेंडर से पहले देखा जाता है.. क्या जिम्मेदारी तय करने के लिए कोई प्रभावी तंत्र मौजूद है.. और यदि किसी ठेकेदार से सरकारी धन की वसूली बनती है.. तो वह रकम वास्तव में वसूल क्यों नहीं की जाती..



