• इस वर्ष सरकार के लिए हल्ला बोलेगा विपक्ष
  • बीजेपी के लिए यह साल चुनौती है तो विपक्ष के लिए उम्मीद का सूरज
  • 2026 में पांच राज्यों में चुनाव, क्या रूकेगा मोदी का अजेय रथ
  • नए साल की मुबारकबाद के साथ राजनीति ने यह कह दिया है कि खेल अब नई पिच पर होगा

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। साल का पहला दिन और राजनीति ने सुबह होते ही अधिकारों के सवाल की आवाज दे दी है। 2026 का सूरज पक्ष विपक्ष दोनों के लिए नई चुनौतियों लेकर उगा है। सिर्फ कैलेंडर नहीं बदला है बल्कि 26 में राजनीतिक पिच भी बदलने वाली है इस बात का एलान विपक्ष ने कर दिया है। राहुल गांधी ने कहा है कि 2026 आम नागरिकों के अधिकारों की रक्षा का साल बने। गौरतलब है कि इस वर्ष पश्चिम बंगाल समेत चार अन्य राज्यों में आम चुनाव होना है। बीजेपी लंबे समय से बंगाल में कमल खिलाने की प्रेक्टिस कर रही है। लेकिन हर बार ममता बनर्जी अजेय बनकर बीजेपी के सपनों को पूरा नहीं होने दे रही इस बार क्या होगा? यह बड़ा सवाल है।

पांच राज्यों में चुनाव

2026 में जिन पांच राज्य पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव होने हैं वह नए साल के पहले दिन ही राजनीति के नक्शे पर चमकने लगे हैं। यह चुनाव बीजेपी के लिए सिर्फ सत्ता बचाने की लड़ाई नहीं होंगे बल्कि यह तय करेंगे कि क्या मोदी का अजेय समझा जाने वाला रथ अब भी उसी रफ्तार से दौड़ रहा है या कहीं पहियों के नीचे सवालों की कीलें चुभने लगी हैं। नया साल है इसलिए यह कहानी निराशा से नहीं शुरू होती। यह कहानी शुरू होती है उम्मीद से विपक्ष की उम्मीद मतदाता की उम्मीद और लोकतंत्र की उम्मीद।

असम में सत्ता के साथ सवालों का बोझ?

असम में बीजेपी सत्ता में है लेकिन सवालों से मुक्त नहीं। नागरिकता पहचान और सामाजिक संतुलन यह वह मुद्दे है जो नए साल में भी हवा में तैर रहे हैं। विपक्ष के लिए असम में वह मौका है कि वह डर की राजनीति के मुकाबले भरोसे की राजनीति रख सके। अगर असम में माहौल बदला तो यह संकेत होगा कि 2026 सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं परिणाम देने वाला साल है।

राहुल ने शुभकामना के साथ चुनौती पेश की

राहुल गांधी का बयान नए साल की पहली राजनीतिक दस्तक बन गया है। 2026 अधिकारों का सवाल होगा यह कोई औपचारिक शुभकामना नहीं बल्कि सीधे सीधे सत्ता को दी गई चुनौती है। यह बयान ऐसे वक्त आया है जब विपक्ष लंबे समय बाद एक साथ सांस लेता दिख रहा है और सत्ता के भीतर आत्मविश्वास के साथ साथ बेचैनी भी साफ महसूस की जा सकती है। राहुल गांधी का यह वाक्य सिर्फ कांग्रेस की लाइन नहीं है यह विपक्षी राजनीति का साझा उद्घोष बनता जा रहा है। और यहीं से नए साल की राजनीति की खुशबू बदल जाती है। अब मुद्दा सिर्फ चुनाव जीतने का नहीं बल्कि संविधान, संघीय ढांचा और नागरिक अधिकारों की रक्षा का बताया जा रहा है। इसी बयान के समानांतर, ममता बनर्जी की उम्मीदें भी नए साल की रोशनी में और साफ दिखाई देती हैं। दिल्ली से लेकर कोलकाता तक यह संदेश जाने लगा है कि विपक्ष अब सिर्फ प्रतिक्रिया नहीं बल्कि पहल करेगा।

तमिलनाडु बन रहा है अधिकारों की राजनीति का मजबूत किला

राहुल गांधी के अधिकारों के सवाल वाले बयान की सबसे मजबूत जमीन तमिलनाडु है। यहां केंद्र बनाम राज्य की राजनीति पुरानी है लेकिन आज भी असरदार। बीजेपी यहां विस्तार चाहती है लेकिन द्रविड़ राजनीति आज भी अपने आत्मसम्मान के साथ खड़ी है। तमिलनाडु विपक्ष को यह भरोसा देता है कि राष्ट्रीय राजनीति क्षेत्रीय ताकतों के बिना अधूरी है।

केरल विचारधारा की जिंदा प्रयोगशाला

केरल में नया साल महज कैलेंडर का बदलना नहीं होता यहां यह सवालों बहसों और वैचारिक मंथन के साथ दस्तक देता है। यह वह राज्य है जहां वोटर नारों के शोर में नहीं बल्कि नीतियों की कसौटी पर फैसले करता है, राजनीति भावनाओं से नहीं तर्क से चलती है। और यही इसे भारत की विचारधारा की जिंदा प्रयोगशाला बनाती है। यहां वामपंथ कोई जड़ विचार नहीं बल्कि बदलते समय के साथ संवाद करता दर्शन है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक न्याय और विकेंद्रीकरण यह सिर्फ वादे नहीं बल्कि जमीनी अनुभव हैं। शायद यही वजह है कि केरल में सत्ता का बदलाव भी किसी उथल पुथल के बिना लोकतांत्रिक सहजता से होता है। सत्ता में बैठी सरकार को भी पता है कि यहां सवाल पूछे जाएंगे और जवाब देने ही होंगे। बीजेपी के लिए केरल कल भी कठिन था और आज भी कठिन चुनौती बना हुआ है।

पश्चिम बंगाल में उम्मीदें भी कांपती हैं और सत्ता भी

अगर 2026 की राजनीति में किसी राज्य में थ्रिल, सस्पेंस और हल्का-सा हॉरर है तो वह पश्चिम बंगाल है। यहां चुनाव सिर्फ वोट का नहीं वजूद का सवाल बन जाता है। ममता बनर्जी नए साल में भी संघर्ष का प्रतीक बनी हुई हैं। एक ओर केंद्रीय एजेंसियों की जांच दूसरी ओर दिल्ली से लगातार दबाव लेकिन ममता का राजनीतिक संदेश साफ है बंगाल अपने फैसले खुद करेगा। यही बात उन्हें विपक्ष की उम्मीदों का केंद्र बनाती है। बीजेपी पूरी ताकत झोंकने की तैयारी में है लेकिन समस्या वही पुरानी है ममता के सामने खड़ा करने लायक चेहरा अब भी अधूरा है। संगठन है, संसाधन हैं, प्रचार है, लेकिन बंगाल की मिट्टी से उठी आवाज नहीं। बंगाल में सिहरन है, हिंसा की आशंका, टकराव का डर, और चुनावी रातों की बेचैनी।

पुडुचेरी छोटा राज्य, बड़ा संदेश

पुडुचेरी भले ही नक्शे पर छोटा दिखता हो लेकिन राजनीति के लिहाज से यह अक्सर बड़े संकेत दे जाता है। यहां सत्ता किसी मजबूत बहुमत की नहीं बल्कि नाज़ुक संतुलन की मोहताज रहती है। गठबंधन की राजनीति टूटते बनते समीकरण और अचानक बदलती वफादारियां पुडुचेरी की सियासत को अस्थिर भी बनाती हैं और बेहद अहम भी। यही वह प्रयोगशाला है जहां यह साफ दिखता है कि अगर गठबंधन में भरोसा कमजोर पड़ा तो सरकार कितनी जल्दी ढह सकती है। 2026 के बड़े राजनीतिक खेल से पहले पुडुचेरी एक ट्रेलर की तरह है। यह चेतावनी भी देता है और संकेत भी कि आने वाले चुनावों में संख्या से ज़्यादा अहम तालमेल होगा। बीजेपी के लिए पुडुचेरी यह सबक देता है कि सत्ता जोड़ तोड़ से मिल सकती है लेकिन टिकेगी तभी जब सहयोगी संतुष्ट हों। वहीं विपक्ष के लिए यह उम्मीद है कि बिखरी हुई ताकतें अगर एक मंच पर आ गयी तो छोटे राज्य भी बड़े नैरेटिव गढ़ सकते हैं। पुडुचेरी याद दिलाता है कि लोकतंत्र में आकार मायने नहीं रखता राजनीतिक संदेश अक्सर सबसे छोटे मंच से सबसे जोरदार आता है। बीजेपी नए साल में सत्ता में है लेकिन पहले जैसी निश्चिंत नहीं। सहयोगियों की नाराजग़ी राज्यों में अलग अलग मूड और भीतर की खामोश असहजता ये सब चुनौती बन चुके हैं। विपक्ष के पास सत्ता नहीं है लेकिन अब उसके पास भाषा है मुद्दें हैं और दिशा है। राहुल गांधी का बयान और ममता बनर्जी की जमीन दोनों मिलकर विपक्ष के लिए 2026 की पिच तैयार कर रहे हैं। विपक्ष सिर्फ विरोध नहीं विकल्प बने सत्ता सवालों से भागे नहीं जवाब दे और मतदाता महसूस करे कि अधिकार अभी जिंदा हैं। नए साल की मुबारकबाद के साथ राजनीति ने कह दिया है कि खेल अब नई पिच पर होगा।

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