सदन में विपक्ष का हल्लाबोल, कुर्सी से चिल्लाने लगे Om Birla
बीते कल का दिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक बार फिर ये सवाल छोड़ गया कि क्या संसद सच में जनप्रतिनिधियों की आवाज की जगह रह गई है...या अब वो केवल सत्ता की घबराहट को ढकने का मंच बन चुकी है...

4पीएम न्यूज नेटवर्क: बीते कल का दिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक बार फिर ये सवाल छोड़ गया कि क्या संसद सच में जनप्रतिनिधियों की आवाज की जगह रह गई है…या अब वो केवल सत्ता की घबराहट को ढकने का मंच बन चुकी है…लोकसभा की कार्यवाही शुरू होते ही जो दृश्य सामने आया…उसने न सिर्फ सियासी हलकों को झकझोर दिया…बल्कि आम जनता को भी सोचने पर मजबूर कर दिया कि…आखिर विपक्ष को अपनी बात कहने से रोका क्यों जा रहा है…
इस बार बजट सत्र पर चर्चा के दौरान सदन में विपक्ष काफी ज्यादा आक्रमक नजर आ रहा है…पहले ही दिन से बेरोजगारी, युवाओं की नौकरियां, किसानों की परेशानी और बजट में राहत की कमी समेत आम आदमी की अनदेखी जैसे मुद्दों पर सरकार को घेर रहा है और जवाब मांग जा रहा है…लेकिन, सरकार की ओर से इन मुद्दों पर जवाब देने की बजाए कांग्रेस को कोसने का काम किया जा रहा है…पीएम मोदी की ओर से भी राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पेश करने के दौरान देखा गया कि…कैसे वो बेरोजगारी, युवाओं की नौकरियां और बाकी जरूरी मुद्दों पर बात करने की बजाए…कांग्रेस को कोसते नजर आए….
लेकिन, बीते कल बजट सत्र के दौरान संसद के भीतर जो कुछ हुआ…वो सिर्फ एक हंगामा नहीं…बल्कि भारतीय लोकतंत्र की हालत पर एक बड़ा सवाल था…लोकसभा की कार्यवाही जैसे ही शुरू हुई, विपक्षी सांसद अपनी सीटों से उठ खड़े हुए…हाथों में पोस्टर थे, आंखों में गुस्सा था और आवाज में साफ संदेश…जय संविधान…ये नारा किसी पार्टी का नहीं था…ये उस संविधान की याद दिलाने की कोशिश थी…जिसके भरोसे देश चलता है और संसद की गरिमा टिकी है…
दरअसल, विपक्ष का कहना साफ था कि सरकार लगातार संसद को चर्चा से दूर रख रही है…जरूरी मुद्दों पर बहस नहीं होने दी जा रही…सवाल पूछने पर जवाब नहीं मिलते और जब आवाज उठाई जाती है…तो उसे हंगामा कहकर दबा दिया जाता है…इसी के विरोध में विपक्ष ने सदन के भीतर उतरकर पोस्टर लहराए और संविधान के समर्थन में नारे लगाए…
इसके बाद स्पीकर ओम बिरला ने सांसदों से पूछा कि आप हंगामा शांत करेंगे तो चर्चा हो पाएगी…स्पीकर ने कहा कि मैं इस तरह का सदन नहीं चला सकता…इसके बाद लोकसभा को 12 बजे तक के लिए स्थगित कर दिया गया… कल राज्यसभा से राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव भारी हंगामे के बीच पारित हुआ…प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण के दौरान विपक्षी दलों ने जोरदार नारेबाजी की और बाद में राज्यसभा से वॉकआउट कर लिया…जय संविधान का नारा जैसे-जैसे तेज होता गया…वैसे-वैसे स्पीकर ओम बिरला की बेचैनी भी बढ़ती गई…वो कुर्सी पर बैठे-बैठे लगातार विपक्ष को शांत रहने की अपील करते रहे…लेकिन सवाल ये था कि जब सरकार सुनने को तैयार ही नहीं…तब विपक्ष चुप क्यों रहे?…विपक्ष का कहना था कि सदन में शांति तब होती है…जब सरकार जवाब देती है…
कुछ ही मिनटों में माहौल गरमा गया…विपक्षी सांसद वेल में खड़े रहे और नारे लगाते रहे…स्पीकर की ओर से भले ही बार-बार टोका जा रहा था…लेकिन विपक्ष का कहना था कि संविधान बचाने की बात करना अगर हंगामा है…तो वो ये हंगामा करते रहेंगे…क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा हंगामा तब होता है…जब जनता की आवाज को दबाया जाता है…स्पीकर ओम बिरला का गुस्सा धीरे-धीरे साफ दिखने लगा…उनकी आवाज ऊंची होने लगी…शब्द सख़्त हो गए…वो विपक्ष पर सदन की कार्यवाही बाधित करने का आरोप लगाने लगे…लेकिन विपक्ष का जवाब भी उतना ही सीधा था कि…जब चर्चा ही नहीं करानी…तो कार्यवाही किस बात की?
इस पूरे घटनाक्रम में एक अजीब मोड़ तब सामने आया…जब स्पीकर ने अपनी नाराजगी विदेश मंत्री एस. जयशंकर पर निकाल दी और कहा कि आप उनसे यानी विपक्ष से बात मत करिए…विपक्ष को टोकते-टोकते स्पीकर ओम बिड़ला ने विदेश मंत्री को बोलने से मना कर दिया…जिसके बाद सदन में मौजूद सांसदों को ये समझ में नहीं आया कि हंगामे के बीच विदेश मंत्री को क्यों टोका जा रहा है…विपक्ष का कहना था कि ये सत्ता के भीतर की घबराहट को दिखाता है…वहीं विपक्ष नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को बोलने का मौका न मिलने से नाराज दिखाई दिया…राहुल गांधी लगातार सोशल मीडिया और मीडिया बाइट्स के जरिए पीएम मोदी पर तंज कर रहे हैं और सरकार को विपक्ष की आवाज दबाने का आरोप लगा रहे हैं….
विपक्ष के मुताबिक, स्पीकर का व्यवहार निष्पक्ष नहीं था…उनका कहना था कि स्पीकर का काम सत्ता और विपक्ष के बीच संतुलन बनाए रखना होता है…न कि सरकार की ढाल बनना…लेकिन 6 फरवरी को स्पीकर का रवैया सत्ता पक्ष के ज़्यादा करीब दिखा…जैसे-जैसे समय बीतता गया…नारे और तेज होते गए…जय संविधान, लोकतंत्र बचाओ, तानाशाही नहीं चलेगी के नारे लगे…..विपक्ष का कहना था कि ये नारे किसी राजनीतिक फायदे के लिए नहीं, बल्कि देश के लोकतांत्रिक ढांचे को बचाने के लिए हैं…
लेकिन, स्थिति उस वक्त और गंभीर हो गई…जब स्पीकर ओम बिरला विपक्ष को शांत कराने में असफल रहे…बार-बार की चेतावनी और अपील के बावजूद जब विपक्ष पीछे नहीं हटा…तो स्पीकर ओम बिड़ला कुर्सी से ही चिल्लाने लगें और सदन की चर्चा को स्थगित कर दिया…ये पल संसद के इतिहास में बहुत ही दुर्लभ और चिंताजनक माना जा रहा है…विपक्ष ने इसे जवाबदेही से भागना बताया…उनका कहना था कि जब सदन में सवाल गूंज रहे हों…तब स्पीकर का यूं सदन स्थगित करना लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है…
मिली जानकारी के मुताबिक, विपक्षी सांसदों ने साफ कहा कि वो डरने वाले नहीं हैं…अगर संविधान की बात करने पर उन्हें डांटा जाएगा…तो भी वो पीछे नहीं हटेंगे…उनका कहना था कि जय संविधान कहना उनका अधिकार है और इस अधिकार को कोई नहीं छीन सकता…इस घटना के बाद सत्ता पक्ष ने हमेशा की तरह विपक्ष पर आरोप लगाया कि…वो संसद नहीं चलने देना चाहता…लेकिन विपक्ष ने पलटवार करते हुए कहा कि संसद सरकार की निजी जागीर नहीं है…ये देश की जनता का मंच है…जहां सवाल पूछना गुनाह नहीं होना चाहिए…
वहीं राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 6 फरवरी की घटना ने विपक्ष की नई रणनीति को साफ कर दिया है…विपक्ष अब सिर्फ़ बयानबाज़ी तक सीमित नहीं रहना चाहता…बल्कि वो हर मंच पर सरकार को घेरने के मूड में है…चाहे वो सड़क हो या संसद… जय संविधान का नारा आने वाले दिनों में और ज़्यादा सुनाई दे सकता है…विपक्ष का मानना है कि ये नारा जनता से जुड़ता है…क्योंकि संविधान ही आम आदमी को अधिकार देता है और जब इन्हीं अधिकारों पर सवाल उठते हैं…तो आवाज उठाना जरूरी हो जाता है…ये सवाल भी उठ रहा है कि आखिर संविधान के नाम से सरकार और स्पीकर को इतनी परेशानी क्यों हो रही है?…क्या संविधान की याद दिलाना सत्ता के लिए असहज हो गया है?…या फिर डर ये है कि जनता इस मुद्दे पर एकजुट हो सकती है?…
सदन में हुई ये घटना ये दिखाती है कि संसद में शोर तब होता है…जब संवाद बंद कर दिया जाता है….अगर सरकार खुलकर बहस करे…सवालों के जवाब दे….तो शायद नारे लगाने की नौबत ही न आए…विपक्ष ने ये साफ संदेश दे दिया है कि वो चुप नहीं बैठेगा…चाहे कुर्सी छोड़ी जाए, माइक बंद किया जाए या कार्यवाही स्थगित हो…संविधान की बात होती रहेगी…क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ी कुर्सी किसी नेता की नहीं होती…सबसे ऊंचा स्थान संविधान का होता है…और शायद यही बात बीते कल सदन में सबसे ज़्यादा गूंजी…



