बुरा फंसे Modi के सबसे भरोसेमंद CM Himanta Biswa Sarma, दर्ज होंगी 100 FIR
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा इन दिनों अपने राजनीतिक करियर के सबसे कठिन दौर से गुजरते दिख रहे हैं...जो नेता कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे भरोसेमंद मुख्यमंत्रियों में गिने जाते थे...

4पीएम न्यूज नेटवर्क: असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा इन दिनों अपने राजनीतिक करियर के सबसे कठिन दौर से गुजरते दिख रहे हैं…जो नेता कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे भरोसेमंद मुख्यमंत्रियों में गिने जाते थे…
आज वही नेता देशभर में दर्ज हो रही FIR और सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर पहुंच चुके मामलों और विपक्ष के संगठित हमलों के बीच घिरते नजर आ रहे हैं…जिसके बाद सवाल अब सिर्फ एक बयान या एक शब्द का नहीं रहा…बल्कि ये सवाल बन चुका है कि…क्या बीजेपी के लिए हिमंता बिस्वा सरमा अब ताकत से ज़्यादा बोझ बनते जा रहे हैं?…..
आखिर पूरा मामला क्या है…तो पूरा विवाद उस वक्त शुरू हुआ जब असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने एक राजनीतिक बयान के दौरान मुस्लिम समुदाय के लिए मियां शब्द का इस्तेमाल किया…और कहा कि मियां मुसलमानों को जैसे परेशान कर सकते हो करो….रिक्शेवाले 5 रुपये मांगे तो 4 रुपये ही दो….हम आपके साथ हैं……मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के इसी बयान को लेकर अब देखभर में भारी बवाल मच गया है…क्योंकि, भले ही कुछ इलाकों में ये शब्द आम बोलचाल में इस्तेमाल होता हो…लेकिन जब इसे एक मुख्यमंत्री राजनीतिक मंच से…चुनावी और ध्रुवीकरण के संदर्भ में इस्तेमाल करे…तो मामला आम नहीं रह जाता…यही वजह है कि इस बयान को लेकर देशभर में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली….
और इस विवाद को और भड़काने वाला बयान तब सामने आया जब हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि…कांग्रेस को साफ करना चाहिए कि वो राज्य के लोगों के साथ है या मियाओं के साथ…इस बयान ने आग में घी डालने का काम किया…विपक्ष और सामाजिक संगठनों ने इसे खुला ध्रुवीकरण करार दिया…जिसके बाद सवाल ये उठने लगा कि क्या एक संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति इस तरह की भाषा का इस्तेमाल कर सकता है?…
जिसके बाद अब मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की मुश्किलें सिर्फ असम तक सीमित नहीं रहीं…जिस तरह से जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने उनके एक बयान के खिलाफ देशव्यापी कानूनी मोर्चा खोलने का ऐलान किया है…उसने साफ संकेत दे दिया है कि मामला अब राजनीतिक बयानबाज़ी से निकलकर संवैधानिक संकट की तरफ बढ़ रहा है…अहमदाबाद से लेकर उत्तर प्रदेश के कई शहरों तक FIR दर्ज हो चुकी हैं और 100 से ज्यादा FIR की तैयारी अपने आप में एक संदेश है कि…अब हिमंत बिस्वा सरमा को उनके शब्दों की कीमत चुकानी पड़ सकती है…
ये कोई साधारण विरोध नहीं है…जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने साफ कर दिया है कि उनका मकसद केवल कानूनी कार्रवाई नहीं..बल्कि ये बताना है कि ध्रुवीकरण की राजनीति को सामान्य मानकर स्वीकार नहीं किया जाएगा…जब किसी मुख्यमंत्री के खिलाफ देश के अलग-अलग हिस्सों में एक जैसे आरोपों पर शिकायतें दर्ज होने लगें…तो सवाल सिर्फ एक बयान का नहीं रहता…सवाल उस व्यक्ति की संवैधानिक मर्यादा और राजनीतिक भविष्य का हो जाता है…यही वजह है कि कांग्रेस के अल्पसंख्यक नेताओं से लेकर सामाजिक संगठनों तक ने इसे अपमानजनक और विभाजनकारी करार दिया…
जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने इसे सीधे तौर पर हेट स्पीच बताया है और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर दी है…याचिका में मांग की गई है कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के लिए सख्त दिशा-निर्देश तय हों…ताकि सत्ता के नशे में कोई भी व्यक्ति समाज को बांटने वाली भाषा का इस्तेमाल न कर सके…ये याचिका सिर्फ हिमंत बिस्वा सरमा के खिलाफ नहीं है…बल्कि उस राजनीति के खिलाफ है…जिसे बीजेपी बीते कुछ सालों से लगातार आगे बढ़ाती रही है…
जब किसी मुख्यमंत्री के बयान को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल होती है…तो ये सामान्य घटना नहीं होती…ये सीधा संकेत है कि मामला अब संवैधानिक मूल्यों बनाम सत्ताधारी राजनीति की लड़ाई बन चुका है…याचिकाकर्ताओं का कहना है कि हिमंत बिस्वा सरमा ने कोर्ट के पुराने फैसलों का गलत हवाला दिया और उसे अपने राजनीतिक एजेंडे के मुताबिक पेश किया…
वहीं कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने खुलकर आरोप लगाया है कि…मुख्यमंत्री जानबूझकर ऐसी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं…जिससे समाज में नफरत फैले और चुनावी ध्रुवीकरण मजबूत हो…ऐसे में अगर ये आरोप कोर्ट की कसौटी पर टिकता है…तो सवाल उठता है कि…क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसे मुख्यमंत्री को बचा पाएंगे…जिस पर हेट स्पीच जैसे गंभीर आरोप लग रहे हों?….
बीजेपी और उसके समर्थक इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई कहकर खारिज करने की कोशिश कर सकते हैं…लेकिन सच्चाई ये है कि 100 FIR का ऐलान प्रतीकात्मक नहीं होता…यह एक रणनीतिक कदम है…जिससे ये दिखाया जाए कि मुद्दा स्थानीय नहीं, राष्ट्रीय है…अलग-अलग राज्यों में दर्ज FIR का मतलब है कि…हिमंत बिस्वा सरमा को बार-बार कानूनी प्रक्रियाओं का सामना करना पड़ेगा…
इतिहास गवाह है कि जब किसी नेता पर लगातार कानूनी दबाव बढ़ता है…तो पार्टी नेतृत्व उसे बोझ के तौर पर देखने लगता है…प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की राजनीति डैमेज कंट्रोल पर टिकी रही है…ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बीजेपी उस मुख्यमंत्री को बचाएगी…जो पार्टी के लिए फायदे से ज्यादा नुकसान का सौदा बनता जा रहा हो?…
कांग्रेस ने इस मौके को सिर्फ बयानबाज़ी तक सीमित नहीं रखा…पार्टी ने whoishbs.com नाम से एक वेबसाइट लॉन्च की है…जिसमें मुख्यमंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार और अन्य आरोप दर्ज करने की सुविधा दी गई है…भले ही बीजेपी इसे राजनीतिक स्टंट कहे…लेकिन ये साफ है कि कांग्रेस अब हिमंत बिस्वा सरमा को टार्गेटेड तरीके से घेरने की रणनीति पर काम कर रही है…ये वही हिमंत बिस्वा सरमा हैं…जिन्हें कभी कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आने पर मास्टर स्ट्रैटेजिस्ट कहा गया था…लेकिन अब वही व्यक्ति बीजेपी के लिए सबसे बड़ा विवाद बनता जा रहा है…अब सवाल ये नहीं है कि आरोप सही हैं या गलत…सवाल ये है कि क्या बीजेपी इतनी सारी आग एक साथ संभाल पाएगी?…
दिल्ली में सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर द्वारा हिमंत बिस्वा सरमा के खिलाफ पुलिस शिकायत दर्ज कराना इस पूरे मामले को और गंभीर बना देता है…जब नागरिक समाज, वकील, सामाजिक संगठन और विपक्ष…सब एक ही मुद्दे पर एकजुट दिखें…तो ये सत्ता के लिए खतरे की घंटी होती है…बीजेपी अक्सर ही ये तर्क देती है कि ऐसे लोग अर्बन नक्सल या टुकड़े-टुकड़े गैंग हैं…लेकिन हर बार इस तरह के लेबल काम नहीं आते…खासकर तब, जब मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हो और एफआईआर देशभर में दर्ज हो रही हों…
गौरतलब है कि सीएम हिमंत बिस्वा सरमा को लंबे समय से पीएम मोदी का भरोसेमंद मुख्यमंत्री माना जाता रहा है…असम में बीजेपी को मजबूत करने से लेकर पूर्वोत्तर में पार्टी का विस्तार…हर जगह उनका नाम लिया जाता है…लेकिन राजनीति में कोई भी स्थायी नहीं होता…जैसे ही कोई नेता पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचाने लगता है…उसे किनारे करने में देर नहीं लगती…अगर सुप्रीम कोर्ट इस मामले में सख्त टिप्पणी करता है…या FIR के आधार पर कोई ठोस कानूनी कार्रवाई आगे बढ़ती है…तो बीजेपी के सामने साफ विकल्प होगा…या तो मुख्यमंत्री को बचाने की कोशिश करे और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना झेले….या फिर कुर्सी बदलकर नुकसान कम करे…
कुल मिलाकर…अब ये विवाद सिर्फ मियां शब्द तक सीमित नहीं है…ये उस राजनीति का प्रतीक है…जिसमें सत्ता में बैठे लोग सोचते हैं कि उन्हें जवाबदेह नहीं होना पड़ेगा…लेकिन जमीयत उलेमा-ए-हिंद की देशव्यापी कानूनी मुहिम…सुप्रीम कोर्ट की याचिका…कांग्रेस का संगठित हमला और सामाजिक कार्यकर्ताओं की सक्रियता…ये सब मिलकर ये संकेत दे रहे हैं कि सीएम हिमंत बिस्वा सरमा का राजनीतिक भविष्य अब पहले जैसा सुरक्षित नहीं रहा….अब असली सवाल यही है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बार फिर अपने मुख्यमंत्री को ढाल बनाकर बचा लेंगे?…या फिर समय आने पर बीजेपी वही करेगी जो वो अक्सर करती है….कुर्सी बदलेगी, ताकि पार्टी बची रहे?



