मेयर पद के लिए कुछ भी? ‘चांद-मंगल तक कब्जा कर लेगी BJP’ | उद्धव गुट का तीखा हमला

मेयर पद को लेकर महाराष्ट्र की सियासत गरमा गई है... उद्धव ठाकरे गुट ने BJP और महायुति पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि..

4पीएम न्यूज नेटवर्कः महाराष्ट्र की राजनीति इन दिनों काफी गर्म है.. हाल ही में हुए स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजों ने सत्ता पक्ष.. और विपक्ष के बीच तनाव बढ़ा दिया है.. मुंबई में बीजेपी की रितु तावड़े के महापौर बनने के बाद शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) गुट.. यानी UBT ने बीजेपी और मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के गुट पर जमकर हमला बोला है.. शिवसेना UBT के मुखपत्र सामना में एक संपादकीय लिखा गया है.. जिसमें सत्ता के दुरुपयोग, धनबल, दलबदल और नैतिकता पर सवाल उठाए गए है.. इस संपादकीय में बीजेपी को चांद.. और मंगल ग्रह पर भी महापौर बिठाने की क्षमता वाला बताया गया है.. अगर उनके पास सत्ता, पैसा और पुलिस हो.. साथ ही मुंबई में मराठी अस्मिता की जीत का श्रेय शिवसेना को दिया गया है.. वहीं यह घटना महाराष्ट्र की राजनीति में नई हलचल पैदा कर रही है..

महाराष्ट्र में जनवरी 2026 में बृहन्मुंबई महानगरपालिका.. और अन्य 28 स्थानीय निकायों के चुनाव हुए थे.. ये चुनाव लंबे समय से लंबित थे.. और कोविड-19, आरक्षण मुद्दों और अन्य कारणों से टलते रहे.. आखिरकार 15 जनवरी 2026 को मतदान हुआ.. और 16-17 जनवरी को नतीजे आए.. महायुति गठबंधन, जिसमें बीजेपी, शिवसेना (शिंदे गुट) और अन्य शामिल हैं.. जिसने बड़ी जीत हासिल की.. BMC में महायुति को बहुमत मिला.. जिसमें बीजेपी ने 89 वार्ड जीते.. और शिंदे गुट की शिवसेना ने 29 वार्ड जीते.. कुल मिलाकर महायुति के पास 118 से ज्यादा सीटें है.. वहीं, शिवसेना UBT और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना गठबंधन को करीब 105 सीटें मिली.. लेकिन वे बहुमत से चूक गए.. वहीं अन्य निकायों में भी बीजेपी ने 11 में से 10 महापौर पद जीते.. यह जीत महायुति के लिए बड़ी सफलता है.. लेकिन विपक्ष इसे सत्ता के दुरुपयोग का नतीजा बता रहा है..

BMC चुनावों के बाद महापौर चुनाव 11 फरवरी 2026 को होना तय था.. लेकिन शिवसेना UBT ने उम्मीदवार नहीं उतारा.. जिससे चुनाव निर्विरोध हो गया.. बीजेपी ने रितु तावड़े को महापौर पद के लिए नामित किया.. रितु तावड़े घाटकोपर से दो बार की पार्षद हैं.. और बीजेपी में 2012 में कांग्रेस से शामिल हुई थीं.. वे शिक्षा समिति की पूर्व अध्यक्ष भी रह चुकी हैं.. उप-महापौर पद के लिए शिंदे गुट की शिवसेना ने संजय शंकर घाडी को नामित किया.. यह बीजेपी की मुंबई में 40 साल बाद पहली महापौर है.. ठाकरे परिवार का BMC पर 25 साल का दबदबा खत्म हो गया.. शिवसेना UBT के सांसद संजय राउत ने कहा कि बीजेपी को मराठी चेहरे को चुनना पड़ा.. क्योंकि मराठी लोगों का समर्थन UBT और MNS को था..

आपको बता दें कि शिवसेना UBT का मुखपत्र सामना महाराष्ट्र की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.. चुनाव नतीजों के बाद सामना में एक तीखा संपादकीय प्रकाशित हुआ.. जिसमें बीजेपी और शिंदे गुट पर जमकर निशाना साधा गया.. संपादकीय में लिखा है कि प्रशासकों का मनमाना शासन खत्म होकर जनप्रतिनिधियों का शासन आया है.. लेकिन यह मुख्यमंत्री की मर्जी पर निर्भर है.. बीजेपी के 10 महापौर बनने पर कटाक्ष करते हुए कहा गया कि अगर सत्ता.. पैसा और पुलिस हो तो बीजेपी चांद और मंगल पर भी महापौर बिठा सकती है.. लेख में उदाहरण दिया गया कि बीजेपी ढोल पीट सकती है कि देखो, हमने चांद और मंगल पर हिंदू-मराठी महापौर बिठाए हैं.. यह व्यंग्य बीजेपी की सत्ता के दम पर जीत को लक्ष्य करता है..

सामना ने रितु तावड़े के महापौर बनने को मराठी अस्मिता की जीत बताया.. लेख में लिखा है कि बीजेपी को मुंबई के मराठी-हिंदू चरित्र को स्वीकार करना पड़ा.. शिवसेना के आंदोलन और मराठी पहचान की लड़ाई के दबाव में बीजेपी को अपनी इच्छा के विरुद्ध मराठी चेहरा चुनना पड़ा.. इसका श्रेय शिवसेना को दिया गया.. संपादकीय कहता है कि शिवसेना ने मराठी पहचान के मुद्दे पर जंग छेड़ दी.. इसलिए भाजपा को महापौर पद के लिए एक मराठी चेहरा चुनना पड़ा.. वहीं यह दावा शिवसेना UBT की रणनीति को रेखांकित करता है.. जो मराठी मानुष की पहचान पर जोर देती है..

जानकारी के मुताबिक सामना ने रितु तावड़े के एक पुराने बयान पर भी हमला किया.. जिसमें उन्होंने बांग्लादेशियों पर टिप्पणी की थी.. संपादकीय में पूछा गया कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस रुख से सहमत हैं.. लेख में भारत द्वारा बांग्लादेश को दी जाने वाली आर्थिक मदद.. और वहां हिंदुओं पर हो रहे हमलों का जिक्र किया गया.. इसे विरोधाभासी बताया गया.. साथ ही, मीरा-भायंदर में अमराठी महापौर बनाए जाने को मराठी जनता की अनदेखी कहा गया.. जो बीजेपी की नीतियों में असंगति को उजागर करता है..

वहीं संपादकीय का एक बड़ा हिस्सा दलबदल पर केंद्रित है.. नासिक और कल्याण-डोंबिवली में दलबदल को नैतिक पतन का उदाहरण बताया गया.. लेख में लिखा है कि चुनाव चिह्न की स्याही सूखने से पहले ही विधायक.. और नगरसेवक पाला बदल रहे हैं.. मनसे और शिवसेना UBT से चुने गए प्रतिनिधियों के शिंदे गुट में जाने को गद्दारी कहा गया.. मालेगांव में AIMIM से गठबंधन की कोशिश पर सवाल उठाए गए.. संपादकीय कहता है कि सत्ता के लिए हिंदुत्व और सिद्धांतों से समझौता किया जा रहा है.. ठेके, निधि और समितियों के लालच में जनप्रतिनिधि जनता के वोट से विश्वासघात कर रहे हैं..

जानकारी के अनुसार सामना ने महाराष्ट्र का खजाना खाली होने के बावजूद छोटे चुनावों में करोड़ों रुपये खर्च करने पर सवाल उठाया.. सरकारी निधि के भेदभावपूर्ण वितरण को अलोकतांत्रिक बताया गया.. लेख के अंत में कहा गया कि महाराष्ट्र की राजनीतिक संस्कृति का गहरा पतन हो चुका है.. और इसके लिए सत्ताधारी जिम्मेदार हैं.. यह हिस्सा राज्य की आर्थिक स्थिति और राजनीतिक नैतिकता पर गंभीर सवाल उठाता है..

शिवसेना UBT चुनावों में हार के बावजूद मराठी अस्मिता.. और हिंदुत्व के मुद्दे पर जोर दे रही है.. संजय राउत ने कहा कि बीजेपी को मराठी महापौर चुनना पड़ा.. क्योंकि मराठी लोगों का समर्थन UBT और MNS को था.. वे चुनावों में EVM गड़बड़ी, वोटर लिस्ट में अनियमितता और सत्ता के दुरुपयोग का आरोप लगाते हैं.. UBT का कहना है कि महायुति की जीत असली नहीं है.. बल्कि सत्ता के दम पर है.. उद्धव ठाकरे ने भी कहा कि शिवसेना को खत्म नहीं किया जा सकता है..

 

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