अपनी ही सरकार के खिलाफ CM Yogi ने खोला मोर्चा, बोले- हालात खराब…

राजनीति में जब बड़े नेता कुछ बोलते हैं...तो वो सिर्फ बयान नहीं होता...बल्कि एक संकेत होता है..

4पीएम न्यूज नेटवर्क: राजनीति में जब बड़े नेता कुछ बोलते हैं…तो वो सिर्फ बयान नहीं होता…बल्कि एक संकेत होता है….

हाल ही में सीएम योगी आदित्यनाथ ने दिल्ली के प्रदूषण को लेकर जो बयान दिया…उसने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी…उन्होंने मंच से साफ-साफ शब्दों में कहा कि…दिल्ली में दम घुटता है…आंखों में जलन होती है….सांस लेने में दिक्कत होती है, ऐसा लगता है जैसे गैस चेंबर में हों…

सीएम योगी के इस बयान के बाजद अब सवाल ये है कि….ये बयान किसके खिलाफ जाता है?….क्योंकि, देखिए…..दिल्ली में इस समय भाजपा की सरकार है….केंद्र में भी भाजपा की सरकार है….पार्टी खुद इसे ट्रिपल इंजन सरकार कहती है….ऐसे में अगर भाजपा का ही एक बड़ा मुख्यमंत्री ये कहे कि दिल्ली गैस चेंबर बन गई है…तो क्या ये सिर्फ चिंता है या फिर इसके पीछे कोई राजनीतिक संदेश भी छिपा है?….

क्योंकि, राजनीति में शब्दों का चुनाव बहुत सोच-समझकर किया जाता है….सीएम योगी जैसे अनुभवी नेता अगर इतने कड़े शब्द इस्तेमाल करते हैं…तो ये मानना थोड़ा मुश्किल हो जाता है कि ये सिर्फ एक आम बयान हो….विपक्ष को तो इससे मौका मिल गया कि वो कह सके कि….देखिए, आपकी ही पार्टी का मुख्यमंत्री आपकी नाकामी गिना रहा है….कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने एक्स पर लिखा कि….अब इसके बाद दिल्ली की ‘डबल इंजन’ सरकार पर क्या ही बोला जाये?!

वहीं अब इसे शंकराचार्य विवाद से जोड़कर देखिए…हाल के दिनों में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और भाजपा नेताओं के बीच बयानबाजी चर्चा में रही…इसी दौरान केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि…सनातन मूल्यों का अपमान करने वालों की सत्ता में वापसी नामुमकिन है…संतों के आशीर्वाद से ही गद्दी मिलती है…ये बयान साफ संकेत देता है कि भाजपा अपने को संत समाज से जोड़कर देखती है…दूसरी ओर उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने शंकराचार्य को भगवान समान बताया…इससे ये संदेश गया कि पार्टी के कुछ नेता संत समाज को सर्वोच्च सम्मान देकर राजनीतिक समर्थन मजबूत करना चाहते हैं…

लेकिन ठीक इसी समय यूपी विधानसभा में सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा कि…सपा को पूजना है तो पूजें…हर कोई शंकराचार्य नहीं हो सकता….ये बयान सीधे-सीधे विपक्ष पर हमला था…लेकिन इसके मायने इससे बड़े भी निकाले जा रहे हैं…एक तरफ पार्टी के बड़े नेता कह रहे हैं कि संतों के आशीर्वाद से ही सत्ता मिलती है…लेकिन दूसरी तरफ सीएम योगी कह रहे हैं कि…हर कोई शंकराचार्य नहीं हो सकता…क्या ये धार्मिक नेतृत्व की राजनीति पर अंदरूनी मतभेद का संकेत है?……

अगर हम इन दोनों घटनाओं…यानी दिल्ली के प्रदूषण पर सीएम योगी का बयान और शंकराचार्य विवाद…दोनों को जोड़कर देखें…तो तस्वीर थोड़ी अलग दिखती है…ऐसा लगता है कि भाजपा के अंदर दो तरह की सोच चल रही है….पहली सोच ये है कि संत समाज और धार्मिक नेतृत्व को राजनीति के केंद्र में रखा जाए…ताकि सनातन और हिंदुत्व की राजनीति को और मजबूती मिले…जबकि दूसरी सोच ये हो सकती है कि सरकार चलाने और प्रशासनिक जिम्मेदारियों को धार्मिक विमर्श से अलग रखा जाए…सीएम योगी का लहजा कभी-कभी इस दूसरी सोच की तरफ झुकता दिखाई देता है…

ऐसे में ये भी याद रखना चाहिए कि सीएम योगी खुद एक धार्मिक पृष्ठभूमि से आते हैं…वो गोरखनाथ मठ से जुड़े रहे हैं…ऐसे में अगर वो कहते हैं कि हर कोई शंकराचार्य नहीं हो सकता…तो इसे सिर्फ विपक्ष पर तंज मानना आसान नहीं है…इसमें धार्मिक पदों की गरिमा का संकेत भी दिखता है…ऐसे में अब सवाल उठता है कि…क्या दिल्ली दरबार यानी केंद्रीय नेतृत्व और सीएम योगी के बीच अंदर ही अंदर तनातनी है?…

भाजपा में शीर्ष नेतृत्व के तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी को देखा जाता है…ऐसे में अगर कोई बड़ा मुख्यमंत्री सार्वजनिक मंच से ऐसे बयान देता है…जो पार्टी की सरकार पर सवाल खड़े करें…तो चर्चा तो होगी ही…क्योंकि, राजनीति में बड़े नेता अक्सर अपनी अलग पहचान भी बनाते हैं….मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भाजपा के अंदर एक मजबूत और स्वतंत्र छवि वाले नेता के रूप में देखा जाता है…उनका कद सिर्फ उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं माना जाता…

वहीं इस पूरे विवाद को लेकर कुछ विश्लेषक ये भी मानते हैं कि…सीएम योगी अपने को एक ऐसे नेता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं…जो सच्चाई बोलने से नहीं डरता…चाहे अपनी ही पार्टी क्यों न हो…दिल्ली के प्रदूषण पर बयान शायद इसी छवि को मजबूत करता है…लेकिन दूसरी तरफ ये भी सवाल है कि अगर सब कुछ पार्टी के अंदर ठीक है…तो ऐसे बयान क्यों सामने आते हैं जो असहजता पैदा करें?….दिल्ली के प्रदूषण की बात करने तक तो ठीक था…लेकिन, सीएम योगी ने जिस तरह दिल्ली की प्रदूषित हवा की तुलना गोरखपुर से कर दी…ऐसे में सवाल उठा कि सीएम योगी रहते तो लखनऊ में हैं….उन्होंने लखनऊ के AQI की बात न करके गोरखपुर की बात क्यों की?…क्या सीएम योगी अपने इस बयान से पीएम मोदी की ओर कोई इशारा करना चाहते थे?….

जैसा कि हमने पहले भी देखा कि…शंकराचार्य के मुद्दे पर भाजपा दो खेमों में बंटी नजर आई…एक खेमे ने संत समाज को सर्वोच्च बताते हुए बयान दिए…दूसरे खेमे की तरफ से संयमित और सीमित टिप्पणी आई…इससे ये संदेश गया कि भाजपा के अंदर रणनीति को लेकर एकता नहीं है…ऐसे में सवाल उठा कि…अगर भाजपा के अंदर विचारों में अंतर है…तो क्या ये आगे चलकर चुनावों में बड़ी राजनीतिक दरार बन सकता है?…

फिलहाल, संगठनात्मक स्तर पर कोई खुली बगावत नहीं दिखती…भाजपा एक अनुशासित पार्टी मानी जाती है….लेकिन राजनीति में दरारें पहले शब्दों में दिखती हैं…फिर रणनीति में, और अंत में फैसलों में…दिल्ली के प्रदूषण वाला बयान विपक्ष के लिए हथियार बन गया….अब विपक्ष कह सकता है कि आपकी ट्रिपल इंजन सरकार है…फिर भी हालात गैस चेंबर जैसे हैं….इससे भाजपा की छवि पर असर पड़ सकता है…

दूसरी तरफ, संत राजनीति का सवाल भाजपा के कोर वोटर से जुड़ा है…अगर वहां भी असहमति के संकेत मिलते हैं, तो यह पार्टी के लिए चिंता का विषय हो सकता है…जनता के मन में सवाल उठ रहा है कि…क्या भाजपा के अंदर सब कुछ ठीक है?…या फिर बड़े नेताओं के बीच अलग-अलग राजनीतिक सोच चल रही है?…

सीएम योगी आदित्यनाथ का कद और लोकप्रियता भाजपा के लिए ताकत भी है और चुनौती भी….ताकत इसलिए क्योंकि वो मजबूत जनाधार वाले नेता हैं और चुनौती इसलिए कि मजबूत नेता अपनी अलग राजनीतिक दिशा भी तय कर सकते हैं…यानी अगर आने वाले समय में ऐसे बयान और बढ़ते हैं..तो भाजपा के अंदर खेमेबाजी की चर्चा और तेज हो सकती है….हालांकि, फिलहाल ये कहना जल्दबाजी होगी कि भाजपा में बड़ी टूट हो गई है…लेकिन इतना जरूर है कि हाल के बयानों ने मनभेद की चर्चा को हवा दी है….

क्योंकि, राजनीति में संकेतों को समझना जरूरी होता है…दिल्ली के प्रदूषण पर बयान और शंकराचार्य विवाद…दोनों को अलग-अलग देखने पर वे नॉर्मल लग सकते हैं….लेकिन जब इन्हें जोड़कर देखा जाता है…तो एक नई कहानी सामने आती है…ये कहानी भाजपा के अंदर संभावित वैचारिक खिंचाव की हो सकती है…

जहां एक तरफ संतों के आशीर्वाद की राजनीति है…तो दूसरी तरफ प्रशासनिक सख्ती और स्वतंत्र छवि की राजनीति…अब ऐसे में आने वाले समय में ये साफ होगा कि…ये सिर्फ बयानबाजी थी या फिर भाजपा के अंदर किसी बड़ी राजनीतिक बदलाव की शुरुआत…लेकिन, अभी के लिए इतना जरूर कहा जा सकता है कि सियासत में उठी ये हलचल यूं ही नहीं है…इसके पीछे कुछ न कुछ जरूर पक रहा है..

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