जमुई केस में 3 नाबालिग आरोपी, बिहार में बच्चों के अपराधी बनने की वजह क्या?
बिहार में जुवेनाइल क्राइम काफी ज्यादा है. अभी जमुई मामले में भी 3 आरोपी नाबालिग हैं.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: बिहार में जुवेनाइल क्राइम काफी ज्यादा है. अभी जमुई मामले में भी 3 आरोपी नाबालिग हैं.
बिहार के जमुई में सड़क किनारे नाबालिग लड़की और उसके दोस्त के साथ छेड़खानी और बदसलूकी का वीडियो खूब वायरल हो रहा है. इस मामले में पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए 3 नाबालिग आरोपियों को गिरफ्तार किया है.
बिहार में आए दिन किशोरों द्वारा किए जाने वाले अपराधों की संख्या बढ़ती जा रही है. एनसीआरबी का डेटा बताता है कि जुवेनाइल क्राइम के मामलों में बिहार सबसे ऊपर है. यहां सवाल यह उठता है कि आखिर बिहार में बच्चे इतने अपराधी क्यों बन रहे हैं. इसके पीछे की वजह क्या है.
NCRB की ‘क्राइम इन इंडिया 2024’ रिपोर्ट के अनुसार, बिहार में साल 2024 में किशोरों से जुड़े अपराध के 5,037 केस दर्ज किए गए, जो पूरे देश में सबसे ज्यादा हैं. इसी रिपोर्ट में राज्य में हिंसक अपराध के 1,07,303 मामले दर्ज हुए हैं, जबकि 2023 में ऐसे 52,165 मामले थे. यानी एक साल में इनमें करीब 105% का उछाल आया.
किशोर अपराध बढ़ने की वजहें क्या हैं?
किशोर अपराध बढ़ने के पीछे कई सोशल और फैमिली से जुड़े कारण जिम्मेदार हैं. ‘Juvenile Delinquency and the Problems in Rehabilitation and Social Re-integration in the Light of COVID-19’ नाम के रिसर्च पेपर में बताया गया है कि बच्चे के आसपास का बदलता माहौल, घर की आर्थिक हालत, फैमिली स्ट्रक्चर और पढ़ाई की कमी इसकी बड़ी वजहें हैं.
गरीबी के कारण जब माता-पिता बच्चों की जरूरतें पूरी नहीं कर पाते, तो कई बच्चे घर या बाहर से पैसे चुराने लगते हैं. रिसर्च में चेताया गया है कि यही आदत आगे चलकर बड़े अपराध में बदल सकती है.
बदलती लाइफस्टाइल और सोशल माहौल का असर भी बच्चों के बिहेवियर पर साफ दिखता है. किशोरावस्था में बच्चे दोस्तों की टोली, कपड़े, खान-पान और आजादी को लेकर जल्दी प्रभावित हो जाते हैं. ऐसे समय में अगर माता-पिता ध्यान न दें या सही दिशा न दिखाएं, तो बच्चे गलत रास्ते पर जा सकते हैं.
रिसर्च के मुताबिक, समाज और कल्चर में तेजी से हो रहे बदलावों के बीच बच्चों के लिए सही-गलत का फर्क समझना मुश्किल हो जाता है. इससे उनके नशे, चोरी, लूट और हत्या जैसे अपराधों की तरफ बढ़ने का रिस्क बना रहता है.
सोशल मीडिया और इंटरनेट की भूमिका
DW की रिपोर्ट के अनुसार, इंटरनेट तक आसान पहुंच का भी किशोरों और युवाओं पर गलत असर पड़ रहा है. एक्सपर्ट बताते हैं कि सोशल मीडिया और दूसरे प्लेटफॉर्म पर हर तरह का कंटेंट मौजूद है और कुछ भी सर्च करने पर मिल जाता है. उनके मुताबिक, कई मामलों में आरोपियों ने वहीं से तरीका सीखकर अपराध को अंजाम दिया. यही वजह है कि साइबर क्राइम में भी किशोरों की भागीदारी बढ़ी है.
बच्चे फर्जी प्रोफाइल बनाने और ऑनलाइन ब्लैकमेलिंग जैसे अपराधों में भी शामिल पाए जा रहे हैं, जबकि टेक्नोलॉजी की उन्हें गहरी समझ नहीं होती. अक्सर वे किसी न किसी आपराधिक गैंग के चंगुल में फंस जाते हैं.
छोटे अपराधों से शुरुआत करने वाले कई किशोर आगे चलकर रेप और हत्या जैसे गंभीर अपराधों तक पहुंच रहे हैं. कुछ कम उम्र के अपराधी तो सोशल मीडिया पर अपने कृत्यों का बखान और महिमामंडन करते भी नजर आए हैं.
बाल सुधार गृहों की खराब व्यवस्था
कानून तोड़ने के आरोप में पकड़े गए 18 साल से कम उम्र के बच्चों को देखभाल और सुरक्षा के लिए बाल सुधार गृहों में रखा जाता है. जब तक जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (JJB) उनके केस पर फैसला नहीं सुना देता, तब तक वे इन्हीं गृहों में रहते हैं. यहां अनाथ, बेसहारा, भटके हुए और हिंसा या दुर्व्यवहार के शिकार नाबालिग लड़के-लड़कियों को भी आश्रय दिया जाता है.
इन गृहों का मकसद बच्चों को सुधारना, पढ़ाना-लिखाना, उनकी काउंसलिंग करना और उन्हें दोबारा समाज की मेनस्ट्रीम से जोड़ना है, लेकिन कमजोर व्यवस्था के कारण यहां से बच्चों के फरार होने की घटनाएं बार-बार सामने आती हैं.
ये गृह कुप्रबंधन, क्षमता से ज्यादा बच्चों और कमजोर सिक्योरिटी इंतजामों से जूझ रहे हैं. बिहार के मुजफ्फरपु में मई 2026 में नरौली बाल गृह से 10 बच्चे भाग निकले थे. इससे पहले दरभंगा, भागलपुर, मोतिहारी, खगड़िया, सासाराम, जहानाबाद और कटिहार के बाल गृहों से भी ऐसी घटनाएं सामने आ चुकी हैं.



