दो आयुक्तों के ऐतराज के बाद भी ज्ञानेश कुमार ने की मनमानी! अब देंगे इस्तीफा?
देश में SIR प्रक्रिया भले ही तीनों चुनाव आयुक्तों की देखरेख में हुआ लेकिन संधू और जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार इसे लेकर आधिकारिक तौर पर आपत्ति जताई।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: एक बार फिर साबित हो गया कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयोग भाजपा के इशारों पर ही चलता है।
या यूँ कह लें कि ज्ञानेश कुमार ने मोदी-शाह की गुलामी का ठेका ले रखा है। तभी तो देश में बिना किसी रोक टोक के वोटरों के नाम कटवाए जा रहे हैं और सत्ता का सुख भोग रहे सत्ताधारी लोग हाथ पर हाथ धरे तमाशा देख रहे हैं।
इसी बीच एक ऐसी खबर सामने आ गई जिसने जनता की आँखें खोल दी। दरअसल हम बात कर रहे है SIR को लेकर हुए खुलासे के बारे में। देश भर में हुए SIR के तहत 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से 13 करोड़ से ज्यादा नाम हटा दिए गए हैं।
इसे लेकर चुनाव आयोग की आलोचना भी हुई और सवाल उठा कि यह कैसे तय किया जा रहा है कि कौन वोट देगा और कौन नहीं। लेकिन चुनाव आयोग और सत्ताधारी दल के नेताओ ने इसका एक जवाब न दिया।
पर इसी बीच ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की जांच-पड़ताल में इसे लेकर अहम जानकारियां सामने आई हैं। तो चलिए दोस्तों आपको सिलसिलेवार तरीके से इस पूरे मामले के बारे में बताते हैं।
दरअसल चुनाव आयोग में तीन सदस्य होते हैं। इनमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी शामिल हैं। लेकिन जो जांच में पता चला है वो आपको बेहद चौंका देगा.
इस जांच में पता चला है कि इस प्रक्रिया के दौरान चुनाव आयोग के भीतर ही इसे लेकर सवाल उठाए गए। ये सवाल तीन में से दो चुनाव आयुक्तों ने उठाए थे। इनके नाम हैं सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी।
देश में SIR प्रक्रिया भले ही तीनों चुनाव आयुक्तों की देखरेख में हुआ लेकिन संधू और जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार इसे लेकर आधिकारिक तौर पर आपत्ति जताई।
इसमें एक ही दिन में चार बार इन फैसलों और आदेशों को लेकर आपत्ति दर्ज कराई गई थी। वहीं संधू और जोशी के मुताबिक, ये फैसले उनकी जानकारी के बिना लिए गए थे। चुनाव आयुक्तों की ये आपत्तियां चुनाव आयोग के मुख्य काम से जुड़ी थीं।
जैसे- नए वोटर का रजिस्ट्रेशन, वोटर लिस्ट से नाम हटाना और फिर से जोड़ना, एसआईआर प्रक्रिया में वोटर का नाम बहाल करने के आदेशों के खिलाफ अपील करना और पूरी वोटर लिस्ट की सुरक्षा। लेकिन आपको जानकार हैरानी होगी कि इन सभी आपत्तियों की कॉपी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भी भेजी गई थीं।
कुछ आपत्तियां डिप्टी चुनाव आयुक्तों को भी भेजी गई थीं।लेकिन इन लोगों ने ऐसी आपत्तियों पर ध्यान ही नहीं दिया। ऐसी ही एक लिखित आपत्ति में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने शिकायत की कि चुनाव आयोग ने दो आयुक्तों की लिखित सलाह के खिलाफ काम किया और दावा किया कि यह कदम ‘अनाधिकृत और गैर-कानूनी’ था।
वहीं इसके बाद, 9 सितंबर को मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों की बैठक हुई। चार महीनों में यह उनकी पहली बैठक थी। वहीं अब ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने इस मामले की पड़ताल के दौरान सभी आपत्तियों को देखा और नई दिल्ली, कोलकाता, गोवा और मुंबई में कई अफसरों से बात की। इसका मकसद यह समझना था कि देश में निष्पक्ष चुनाव कराने की संवैधानिक जिम्मेदारी संभालने वाले इस संस्थान के भीतर क्या चल रहा था?
यह बात और भी अहम इसलिए है क्योंकि इन तीनों चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति एनडीए सरकार ने ही की थी। इनकी नियुक्ति 2023 के कानून के तहत प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृह मंत्री और विपक्ष के नेता वाले एक सलेक्शन पैनल ने की थी।
चुनाव आयोग के अंदर पहले भी अफसरों के बीच मतभेद हुए हैं, लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है जब दो चुनाव आयुक्तों ने लिखित में सीधे चुनाव प्रक्रिया के सबसे ज़रूरी हिस्सों पर सवाल उठाए हैं। खैर भाजपा राज है इसमें कुछ भी हो सकता है।
लेकिन मतभेद की इस खबर के सामने आने के बाद सियासी गलियारों में भूंचाल सा आ गया। नेताओं की लगातार प्रतिक्रिया सामने आने लगी है। इसी बीच इस मामले पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया देते हुए सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा है कि इस रिपोर्ट का सीधा मतलब यह है कि चुनाव आयुक्त अपना काम सही से नहीं कर रहे हैं.
अखिलेश यादव ने लिखा, “यह एक बेहद गंभीर समाचार है कि पिछले 10 महीनों में 2 चुनाव आयुक्तों ने निर्वाचन आयोग के गलत निर्णयों पर 14 बार अपनी आपत्ति दर्ज कराई है. इसका सीधा मतलब ये है कि सभी चुनाव आयुक्त अपना सही काम नहीं कर पा रहे हैं. एक स्वतंत्र निकाय के सदस्यों को अगर न्यायपूर्ण कार्य करने की स्वतंत्रता नहीं है या उनकी कोई सुनवाई नहीं है तो ये लोकतंत्र के लिए बेहद घातक और खतरनाक हालात हैं.”
न सिर्फ अखिलेश यादव ने बल्कि शिवसेना UBT नेता संजय राउत ने भी जोरदार हमला बोला। न सिर्फ ज्ञानेश कुमार को बल्कि मोदी और शाह को भी लपेटे में लिया। संजय राउत ने दावा किया, “ज्ञानेश कुमार जैसा भ्रष्ट न कोई पैदा हुआ है और न ही होगा. आज का अखबार पढ़ा तो आश्चर्य नहीं हुआ. इंडियन एक्सप्रेस ने ECI पर बड़ा हाइड्रोजन बम डाला है.”
संजय राउत ने दावा किया कि बीजेपी ज्ञानेश कुमार की क्रिमिनल कांस्पीरेसी से हर चुनाव जीतती आई है. ज्ञानेश कुमार ने अपराध किया है, देशद्रोह किया है. चुनाव आयोग पूरी तरह से गृह मंत्रालय के अंतर्गत आता है और यह पूरा अमित शाह के इशारे पर हुआ है. पीएम को कैबिनेट से निकाल देना चाहिए. यह समाज और विश्व के लिए बहुत खतरनाक है. ज्ञानेश कुमार को बर्खास्त करके कानूनी कारवाई होना चाहिए.
मुख्य चुनाव आयुक्त जैसे लोग कुर्सी पर बैठने लायक नहीं हैं। और यही वजह है कि विपक्ष अक्सर ऐसे लोगों के खिलाफ आवाज उठाता है तो उसे देशविरोधी बता दिया जाता है।
मार्च, 2024 में जब सुखबीर सिंह संधू और ज्ञानेश कुमार को चुनाव आयुक्त बनाया गया था, तब कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने नियुक्ति प्रक्रिया पर अपनी असहमति दर्ज कराई थी। फरवरी, 2025 में लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भी ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त बनाए जाने और विवेक जोशी की चुनाव आयुक्त के रूप में नियुक्ति पर असहमति दर्ज कराई थी।
हालांकि, भारतीय निर्वाचन आयोग के सूत्रों ने दावा किया है कि एसआईआर प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी नहीं है. सभी आयुक्तों की सहमति से ही सारे फैसले लिए गए हैं. लेकिन इस रिपोर्ट ने चुनाव आयोग और बीजेपी सरकार दोनों को कड़घरे में लेकर खड़ा कर दिया है। अब देखना ये होगा कि किस तरह से इस मामले से चुनाव आयोग और बो निपटती है।



