एक कचौड़ी, दो समोसे और “मर्दों का क्या भरोसा”… दिल्ली में क्यों वायरल हुआ ये नारा?

दिल्ली में महिला सुरक्षा को लेकर हो रहे प्रदर्शनों में एक नारा खूब चर्चा में है एक कचौरी, दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा?

4पीएम न्यूज नेटवर्क: दिल्ली में महिला सुरक्षा को लेकर हो रहे प्रदर्शनों में एक नारा खूब चर्चा में है एक कचौरी, दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा? मजाकिया अंदाज वाला ये नारा सुरक्षा और आजादी से जुड़े सवाल उठा रहा है.

5 मुख्य बातें

दिल्ली की छात्राओं सुरक्षा के लिए प्रदर्शन कर रही हैं, जो चर्चा में है

2022 में 31,516 रेप केस दर्ज हुए, 30,454 में आरोपी जान पहचान का था

2024 में नाबालिग लड़कियों के 97% रेप मामलों में आरोपी परिचित था

आखिर दिल्ली की छात्राओं ने ‘मर्दों का क्या भरोसा’ नारा क्यों चुना?

क्या सुरक्षा के नाम पर लड़कियों की आजादी रोकना सही रास्ता है?

दिल्ली की सड़कों पर इन दिनों एक ऐसा नारा चर्चा में है, जो सुनने में हल्का-फुल्का लगता है, लेकिन उसके पीछे सवाल बेहद गंभीर है- ‘एक कचौड़ी, दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा?’ दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्राओं के प्रदर्शनों में इस तरह के नारों के जरिए महिलाओं की सुरक्षा, आजादी और रोजमर्रा के डर को सामने रखा जा रहा है.

यह विरोध प्रदर्शन साउथ दिल्ली के आस्था कुंज पार्क में 17 साल की लड़की के साथ हुए कथित गैंगरेप के बाद तेज हुआ. 23 सितंबर को करीब 200 छात्रों ने प्रदर्शन किया था और इसके बाद भी छात्राओं के मार्च जारी रहे. इस प्रदर्शन की खास बात सिर्फ नारे नहीं हैं, बल्कि नारे लगाने का अंदाज भी है.

मजाकिया अंदाज में गंभीर संदेश दिए

‘हम औरतें आजाद हैं’, ‘रातों पर भी हक है हमारा’ और ‘रैपिस्ट को अंदर करो, लड़कियों को नहीं’ जैसे संदेशों के साथ छात्राएं यह सवाल उठा रही हैं कि महिलाओं को सुरक्षित रखने का मतलब उनकी आवाजाही पर रोक लगाना क्यों हो. यानी बात सिर्फ एक घटना की नहीं, बल्कि उस डर की है जो लड़कियों को सड़क, कॉलेज के आसपास, पब्लिक ट्रांसपोर्ट और रात में बाहर निकलते समय महसूस होता है.

जिस घटना के बाद दिल्ली में शुरू हुआ प्रदर्शन

हाल के प्रदर्शनों में छात्राओं ने अंधेरी सड़कों, पीछा किए जाने और सुरक्षा को लेकर रोजमर्रा की चिंताओं का भी जिक्र किया. 21 सितंबर 2026 को दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के आस्था कुंज पार्क में 17 साल की एक लड़की के साथ कथित सामूहिक दुष्कर्म का मामला सामने आया. पुलिस के मुताबिक, आरोपियों ने खुद को पुलिसकर्मी बताया, लड़की और उसके दोस्त को धमकाया और इसके बाद लड़की के साथ दुष्कर्म किया.

लड़कियों की सुरक्षा पर उठने लगे फिर सवाल

मामले में तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है और लड़की ने जेल में हुई पहचान परेड के दौरान तीनों की पहचान की है. पुलिस ने मामले में पॉक्सो कानून और भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराओं के तहत कार्रवाई की है. यह घटना इसलिए भी चर्चा में आई क्योंकि पार्क कॉलेजों के आसपास के इलाके में है.

रिपोर्टों के मुताबिक, यह स्थान लेडी श्रीराम कॉलेज से करीब दो किलोमीटर दूर है. घटना के बाद छात्राओं ने सवाल उठाया कि अगर कॉलेज और यूनिवर्सिटी के आसपास के इलाके में ही लड़कियां खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करतीं, तो शहर में उनकी सुरक्षा का भरोसा कैसे बनेगा.

हर दिन 1,228 केस: 2023 में महिलाओं के खिलाफ 4.48 लाख अपराध दर्ज हुए. घर में भी खतरा: पति/रिश्तेदारों की क्रूरता के 1.34 लाख केस दर्ज हुए. 88 हजार से ज्यादा अपहरण: 2023 में महिलाओं के 88,605 अपहरण के मामले दर्ज हुए. रेप के 29,670 केस: महिलाओं के खिलाफ 83,891 छेड़छाड़/गरिमा भंग के मामले भी दर्ज हुए. ऑनलाइन भी खतरा: साइबर स्टॉकिंग, बुलिंग और ऑनलाइन यौन उत्पीड़न भी महिलाओं के लिए बड़ी चुनौती है.

हाल की घटनाओं ने डर और गुस्सा दोनों बढ़ाया

दिल्ली में महिला सुरक्षा को लेकर प्रदर्शन के दौरान एक और घटना का भी जिक्र हुआ. हाल ही में हिंदू कॉलेज की दो छात्राओं ने आरोप लगाया कि कुछ युवकों ने उनका पीछा किया, अश्लील टिप्पणियां कीं और उन्हें वाहन में खींचने की कोशिश की. पुलिस ने इस मामले में दो छात्रों को गिरफ्तार किया और वाहन को जब्त किया. मामले की जांच जारी है.

20 दिन में दिल्ली में रेप के 13 मामले सामने आए

इन घटनाओं के बीच दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्राओं के प्रदर्शन लगातार बढ़े. 29 सितंबर को सैकड़ों छात्रों ने मार्च किया, जिसमें मिरांडा हाउस, गार्गी कॉलेज, लेडी श्रीराम कॉलेज और दूसरे संस्थानों के छात्र शामिल हुए.

प्रदर्शनकारियों ने महिलाओं के लिए सुरक्षित सार्वजनिक जगह, बेहतर पुलिस व्यवस्था और सुरक्षा के साथ आजादी की मांग की. सितंबर की शुरुआत से दिल्ली-एनसीआर में रेप और यौन हमले के कम से कम 13 मामले सामने आने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले का खुद संज्ञान लिया है.

सुप्रीम कोर्ट ने मामले का खुद संज्ञान लिया

इनमें महिलाओं के साथ-साथ नाबालिगों से जुड़े मामले भी शामिल हैं. आस्था कुंज पार्क में 17 साल की लड़की से कथित गैंगरेप और चलती स्लीपर बस में नाबालिग से कथित यौन हमले जैसे मामलों का भी जिक्र हुआ.

कोर्ट ने कहा कि पार्क, सड़क, बस और मेट्रो जैसी सार्वजनिक जगहें खराब रोशनी, सीसीटीवी की कमी या पुलिस गश्त न होने के कारण असुरक्षित नहीं होनी चाहिए. अदालत ने सुरक्षा व्यवस्था, निगरानी और अधिकारियों की जवाबदेही पर भी जोर दिया है.

आंकड़े बताते हैं, आरोपी अक्सर जान-पहचान का होता है-

2021: भारत में 31,677 रेप केस दर्ज हुए.

2022: देश में 31,516 रेप केस दर्ज हुए.

2022: 30,454 मामलों में आरोपी पीड़िता का जान-पहचान वाला था.

2024: नाबालिग लड़कियों से जुड़े रेप मामलों में 97% मामलों में आरोपी जान-पहचान का व्यक्ति था.

2020-24: 16-18 साल की लड़कियों से जुड़े 94,503 रेप मामले दर्ज हुए.

अनजान से ज्यादा जान पहचान वालों से ज्यादा खतरा

यह आंकड़ा एक आम धारणा को चुनौती देता है कि यौन हिंसा का खतरा हमेशा किसी अनजान व्यक्ति से ही होता है. एनसीआरबी के आंकड़ों पर आधारित हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में नाबालिग लड़कियों से जुड़े 97% रेप मामलों में आरोपी पीड़िता का जान-पहचान वाला था.

इसमें दोस्त, रिश्तेदार, पड़ोसी, परिवार के सदस्य और शादी का झांसा देने वाले लोग शामिल थे. यानी ‘मर्दों पर भरोसा नहीं’ जैसे नारे को केवल अनजान पुरुषों के संदर्भ में देखना आंकड़ों की पूरी तस्वीर नहीं दिखाता. वास्तविकता यह भी है कि कई मामलों में आरोपी पीड़िता के सामाजिक दायरे में मौजूद व्यक्ति होता है.

बच्चों के खिलाफ अपराध का आंकड़ा भी बड़ा सवाल

बच्चियों के खिलाफ यौन अपराध के आंकड़े भी गंभीर तस्वीर दिखाते हैं. एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार, 2015 में 18 साल से कम उम्र की लड़कियों के रेप के 10,934 मामले दर्ज हुए थे. 2024 में यह संख्या बढ़कर 43,675 हो गई. यानी करीब एक दशक में यह आंकड़ा लगभग चार गुना हो गया.

2020 से 2024 के बीच नाबालिग लड़कियों से जुड़े करीब 1.83 लाख रेप मामले दर्ज हुए. इनमें 16 से 18 साल की लड़कियों के 94,503 मामले और 12 से 16 साल की उम्र की लड़कियों के 70,442 मामले थे. दोनों आयु वर्ग मिलाकर कुल आंकड़े का बड़ा हिस्सा बनते हैं.

लेकिन यहां सिर्फ मामलों की संख्या नहीं, न्याय की रफ्तार भी सवाल है. 2024 में बच्चियों से जुड़े रेप मामलों में दोषसिद्धि दर करीब 30% थी, जबकि 86% मामले लंबित थे. इसका मतलब यह नहीं कि लंबित मामलों में आरोपी दोषी हैं या बरी हो चुके हैं. कई मामलों में जांच और सुनवाई चलती रहती है.

घर और रिश्तों के अंदर भी हिंसा

महिलाओं के खिलाफ हिंसा की पूरी तस्वीर सिर्फ पुलिस में दर्ज रेप मामलों से नहीं समझी जा सकती. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन के अनुसार, दुनिया में करीब 31.6% महिलाएं अपने जीवन में पार्टनर की हिंसा या गैर-पार्टनर यौन हिंसा का सामना कर चुकी हैं.

भारत के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के 2019-21 आंकड़ों में कभी पार्टनर के साथ रह चुकी 15 से 49 साल की महिलाओं में 29.3% ने जीवन में पार्टनर से शारीरिक या यौन हिंसा का अनुभव बताया. पिछले 12 महीनों की बात करें तो यह आंकड़ा 24% था.

डर का असर सिर्फ डर तक नहीं रहता

यौन उत्पीड़न का असर किसी घटना के तुरंत बाद खत्म नहीं हो जाता. शोध में पाया गया है कि अनजान लोगों की ओर से होने वाला यौन उत्पीड़न महिलाओं में यौन हिंसा के डर और खुद को असुरक्षित महसूस करने से जुड़ा हो सकता है. इसका असर उनकी आवाजाही और रोजमर्रा के फैसलों पर भी पड़ सकता है.

यही वजह है कि दिल्ली के प्रदर्शन में छात्राएं केवल ‘सुरक्षा’ की मांग नहीं कर रहीं, बल्कि बिना डर के पढ़ने, काम करने और रात में भी आने-जाने की आजादी की बात कर रही हैं. दिल्ली के उपराज्यपाल की ओर से भी महिला कॉलेजों के आसपास अंधेरी जगहों, खराब रोशनी, असुरक्षित पार्क और आखिरी छोर तक परिवहन जैसी समस्याओं पर अधिकारियों के साथ बैठक की गई है.

तो फिर मर्दों का क्या भरोसा क्यों?

इस नारे को दिल्ली की छात्राओं के विरोध की भाषा के तौर पर देखना चाहिए. इसमें व्यंग्य है, सोशल मीडिया वाली भाषा है, लेकिन उसके पीछे महिलाओं के सुरक्षा अनुभव और गुस्से की बात है. छात्राएं यह सवाल उठा रही हैं कि अगर अपराध के डर की वजह से लड़कियों को ही रात में बाहर निकलने, अकेले सफर करने या अपनी पसंद के कपड़े पहनने से रोका जाए, तो जिम्मेदारी किसकी बनती है?

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