मुस्लिम होने का पता चला तो पुलिस की पिटाई और बढ़ी!
राहुल गांधी ने 4PM पत्रकारों को बुलाकर जाना दिल का हाल, संघर्ष को किया सलाम

- दिल्ली पुलिस की हैवानियत मुस्लिम पता चलने के बाद बढ़ गयी पत्रकारों की पिटाई
- शाहीन-नफीसा से मिले राहुल गांधी पूछा दर्द का हाल 4PM की लड़ाई को मिला बड़ा मुकाम
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। कभी कभी मुलाकात सिर्फ मुलाकात नहीं होती वह महीनों से चल रही लड़ाई के बीच अचानक आई ऐसी रोशनी होती है जिसमें पीछे छूटी पूरी कहानी फिर दिखाई देने लगती है। जी हां 4PM की पत्रकार शाहीन और नफीसा लिए आज का दिन कुछ ऐसा ही रहा। आज उनसे जन-जन की आवाज बन चुके नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने मुलाकात कर पूरी घटना को जाना और उनका हौसला बड़ाया। राहुल गांधी ने मुलाकात के इन क्षणों को देश की जनता के साथ वीडियो बना कर शेयर भी किया। आज का दिन निश्चित तौर पर 4PM के लिए विशेष दिन है क्योंकि आज रिपोर्टिंग के दौरान जिस घटनाक्रम ने दोनों पत्रकारों को दिल्ली पुलिस के सामने खड़ा कर दिया था उसी घटना की पीड़ा और संघर्ष की कहानी नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने जानी। आज की मुलाकात को उस महत्वपूर्ण पड़ाव के तौर पर देखा जा रहा है जो 3 सितंबर को दिल्ली के साकेत थाने से शुरू हुआ और उसके बाद लगातार देशभर में चर्चा का विषय बना। क्योंकि उस दिन सिर्फ दो पत्रकारों के साथ बदसलूकी का मामला नहीं उठा था। सवाल उठा था क्या सवाल पूछने वाले पत्रकार को रोका जा सकता है और उससे भी गंभीर सवाल क्या किसी पत्रकार की धार्मिक पहचान सामने आने के बाद उसके साथ व्यवहार बदल सकता है।
राहुल गांधी की मुलाकात ने 4PM की लड़ाई को नयी ऊर्जा प्रदान की : संजय शर्मा
राहुल गांधी की मुलाकात से 4PM के भीतर स्वाभाविक तौर पर खुशी और गर्व का माहौल है। लेकिन संस्थान के संपादक संजय शर्मा के लिए यह भावनात्मक क्षण भी है। शाहीन और नफीसा के साथ हुई घटना के बाद उन्होंने जिस तरह संस्थान के स्तर पर दोनों के लिए न्याय की लड़ाई लड़ी वह कबीले तारीफ भी है और काबीले नजीर भी है। घटना का पता चलते ही वह फौरन दिल्ली पहुंचे और संघर्ष की कमान अपने हाथों में ले ली। उन्होंने हर उस स्तर पर अपनी बात रखी जो दिल्ली सरकार तक पहंचे। उन्होंने इस पूरे उत्पीड़न को अपनी लड़ाई माना। आज राहुल गांधी की मुलाकात को वह उस संघर्ष के एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में देखते हैं। संजय शर्मा ने कहा है कि वह हमेशा पत्रकारों के हित के साथ खड़े रहे हैं और शाहीन तथा नफीसा की लड़ाई संस्थान हर स्तर पर और हर संभव सीमा तक तब तक लड़ेगा जब तक उन्हें न्याय नहीं मिल जाता। उनके लिए यह मुलाकात सिर्फ सम्मान का क्षण नहीं है। यह उन दोनों पत्रकारों के साहस की पहचान है और उस पत्रकारिता की भी जो दबाव के बीच सवाल पूछने से पीछे नहीं हटती। मीडिया संस्थानों की जिंदगी में ऐसे क्षण कम आते हैं जब किसी पत्रकार के व्यक्तिगत संघर्ष को देश के बड़े सार्वजनिक मंच पर पहचान मिलती है। शाहीन और नफीसा के लिए आज का दिन भी वैसा ही है।
राहुल की मुलाकात पत्रकारिता का सवाल भी
इस मुलाकात को सिर्फ राजनीतिक चश्मे से देखना पूरी कहानी को छोटा कर देगा क्योंकि राहुल गांधी का नेता प्रतिपक्ष होना राजनीतिक तथ्य है लेकिन शाहीन और नफीसा से उनकी मुलाकात का दूसरा पहलू पत्रकारिता से जुड़ा है। एक पत्रकार जब किसी मुख्यमंत्री से सवाल पूछता है तो वह किसी पार्टी का प्रतिनिधि नहीं होता। वह सवाल पूछता है क्योंकि जनता के पास सवाल हैं। यही लोकतांत्रिक पत्रकारिता का मूल है। और अगर किसी पत्रकार के साथ पुलिस की कार्रवाई को लेकर विवाद पैदा होता है तो सवाल सिर्फ उस पत्रकार के लिए नहीं रह जाता। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से 4PM के पत्रकार नफीसा/शाहीन की मुलाकात उनके आफिस में हुई जहां उन्होंने दोनों पत्रकारों की रूदाद बहुत इत्मीनान के साथ सुनी। उन्होंने पत्रकारों से कहा कि वह इस पूरे प्रकरण को देखेंगे। आधे घंटे से ज्यादा समय तक चली इस मुलाकात में राहुल गांधी ने दोनों पत्रकारों से तमाम सवाल पूछे जैसे कि किस हास्पिटल का उदघाटन था? एसएचओ कौन था। जिस महिला पुलिसकर्मी ने पत्रकारों के साथ अभ्रदता की उस महिला अधिकारी का नाम क्या था। उन्होंने पूछा कि पुलिस ने आप को मारा कैसे? उन्होंने पत्रकारों से पूछा कि मारपीट का प्रूव क्या है? उन्होंने शाहीन/नफीसा से यह भी पूछा कि आप का केस कौन लड़ रहा है। राहुल गांधी बहुत ही आत्मीयता से दोनों पत्रकारों से मिले और शाबाशी दी। शहीन/नफीसा ने राहुल गांधी को बताया कि वह बस यह चाहती है कि जिस तरह से उन्होंने सरकार से यह पूछा है कि छात्रों पर पैलेट गन चलाने का आदेश किसने दिया तो वह यह भी पूछे कि हम दोनों के साथ उत्पीडऩ करने का आदेश, थाने में मारने का आदेश, धर्म पूछ कर सजा बड़ा देने का आदेश किसने दिया? दोनों पत्रकार राहुल गांधी को अपनी अपबीती सुनाते समय कई बार भावुक हुई।
आज की खुशी के साथ कल की लड़ाई बाकी है
वह कहते हैं कि 3 सितंबर को शाहीन/नफीसा के शरीर पर चोट के निशान थे आज उनके साथ खड़े होने वाला एक बड़ा राजनीतिक चेहरा सामने है। उस दिन सवाल था हमारे साथ ऐसा क्यों हुआ आज सवाल थोड़ा आगे बढ़ चुका है क्या पत्रकारों को सुरक्षित तरीके से सवाल पूछने का अधिकार मिलेगा और यही फर्क किसी घटना को बड़े मुद्दे में बदल देता है। वह कहते हैं कि जंग अभी बाकी है न्याय का सवाल अभी भी बाकी है। उनकी मांग है कि किसके खिलाफ क्या कार्रवाई होगी? आरोपों की जांच कहां तक पहुंचेगी? क्या सीसीटीवी और अन्य साक्ष्यों की निष्पक्ष जांच होगी? क्या पत्रकारों की शिकायतों पर उचित कार्रवाई होगी के साथ सबस जरूरी है कि क्या भविष्य में किसी पत्रकार को सिर्फ इसलिए निशाना नहीं बनाया जाएगा क्योंकि उसका नाम धर्म या सवाल किसी को पसंद नहीं आया? इन सवालों के जवाब अभी बाकी हैं। इसलिए आज की खुशी के साथ कल की लड़ाई भी सामने है।
धार्मिक पहचान उजागर होने के बाद बढ़ा उत्पीड़न
शहीन और नफीसा ने जो बात पब्लिक प्लेटफार्म पर बताई वहीं बात उन्होंने आज राहुल गांधी के साथ भी शेयर की। दोनों के आरोप दिल्ली पुलिस पर बहुत ही संगीन इतने संगीन कि आरोपियों को ताउम्र जेल में डाला दिया जाए वह भी कम। शाहीन/नफीसा ने राहुल गांधी से पूरी घटना के बारे में बताते हुए कहा कि उन्हें हैरानी तब हुई जब साकेत थाने के पुलिसकर्मियों को पता चला कि वह मुस्लिम है। यह पता चलते हुए उनके साथ व्यवहार बदल गया और उत्पीडऩ के तरीके। भाषा शैली बेहद बेहूदा रहीं। राहुल गांधी ने दोनों पत्रकारों का उत्साह बढ़ाते हुए उनकी बहादुरी की तारीफ की और कहा कि देश को आप पर गर्व है कि आप ने न सिर्फ सहा बल्कि उसका डट कर मुकाबला किया और पूरे देश को बताया कि दिल्ली पुलिस सरकार के इशारे पर किस तरह का कार्य करती है। अब राहुल गांधी की मुलाकात इस पूरी कहानी में आज का दिन नया अध्याय लेकर आया है। राहुल गांधी ने शाहीन और नफीसा से मुलाकात की नेता प्रतिपक्ष ने दोनों का हाल जाना उनकी बात सुनी उनके संघर्ष की सराहना की और उनका हौसला बढ़ाया शाहीन और नफीसा के लिए आज की मुलाकात उस लंबे घटनाक्रम के बीच सबसे अलग क्षण रहा। क्योंकि 3 सितंबर को वह पुलिस हिरासत और मारपीट की बात कर रही थीं। आज वे देश के नेता प्रतिपक्ष के सामने बैठकर अपनी कहानी सुना रही थीं। यानी रास्ता लंबा था साकेत से बाहर निकलने से लेकर थाने की कहानी तक शिकायत से लेकर सार्वजनिक बहस तक और अब नेता प्रतिपक्ष के कार्यालय तक एक लड़ाई ने एक लंबा सफर तय किया है।




