आखिर कांग्रेस ने क्यों छेड़ा निजी संस्थानों में आरक्ष का मुद्दा

नई दिल्ली। कांग्रेस बीतते समय के साथ ‘जितनी आबादी, उतना हक’ वाले दशकों पुराने नारे को और मुखर करती जा रही है. कांग्रेस ने अब दलितों, आदिवासियों और पिछड़े तबके के लिए निजी शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की मांग की है. दिलचस्प बात ये है कि करीब दो दशक पहले इस विषय पर संवैधानिक समर्थन हासिल होते हुए भी कांग्रेस ही की सरकार ने इस मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया था.
राज्यसभा सांसद जयराम रमेश ने अब इसे संसदीय समिति के एक सुझाव के बहाने फिर से बहस में ला दिया है.कांग्रेस ने संसदीय समिति के उस सुझाव का समर्थन किया है जिसमें निजी संस्थानों में भी सामाजिक दायरे के हिसाब से आरक्षण के प्रावधान को लागू करने की बात की गई है. संविधान के अनुच्छेद 15(5) के तहत ये सुझाव दिया गया है.
अनुच्छेद 15(5) की कहानी भी काफी दिलचस्प है. साल 2005 था. कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार के पहले कार्यकाल की बात है. सरकार नई-नई बनी ही थी, कि संसद में 93वां संविधान संशोधन लाया गया. सरकार ने संशोधन कर संविधान में अनुच्छेद 15(5) जोड़ा. इस संवैधानिक संशोधन के तहत ये प्रावधान कर दिया गया कि सरकार सभी शिक्षण संस्थानों में आरक्षण लागू कर सकेगी.
ध्यान दें, ये सभी शिक्षण संस्थानों पर लागू होने वाला संशोधन था. चाहे वो पब्लिक हों या फिर प्राइवेट. अगले साल – 2006 में सरकार एक केंद्रीय शिक्षण संस्थान (नामांकन में आरक्षण) कानून लेकर आई. इसके तरत यूपीए की सरकार ने सरकारी संस्थानों में आरक्षण लागू कर दिया. पर यूपीए सरकार कभी भी निजी संस्थानों में आरक्षण लागू करने को लेकर कानून लेकर नहीं आई.
साल 2008 में सुप्रीम कोर्ठ ने अपने एक फैसले में 2006 के कानून पर मुहर लगाया था. कांग्रेस भी इस दफा अपने रुख के समर्थन में उस फैसले का जिक्र कर रही है. इस कहानी में और भी कुछ सिरे हैं. जैसे साल 2014. जिस साल यूपीए की सरकार जा रही थी. सुप्रीम कोर्ट ने ‘प्रामती एजुकेशनल और कल्चरल ट्रस्ट बनाम भारत राज्य’ मामले में अनुच्छेद 15(5) के प्रावधान को सही ठहराया था.
इसका मतलब ये था कि ओबीसी, एससी और एसटी समुदाय को संवैधानिक दायरे में ही निजी शिक्षण संस्थानों में आरक्षण दी जा सकती थी. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ही का एक और फैसला है. 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने टीएमए पाई मामले में ये कहा था कि प्राइवेट प्लेयर्स के पास शिक्षण संस्थान स्थापित करने का मौलिक अधिकार है. साथ ही, वे उसकी नामांकन प्रक्रिया भी तय करने को लेकर स्वतंत्र हैं.
दरअसल, कांग्रेस सांसद दिग्विजय सिंह की अगुवाई वाली शिक्षा पर बनी संसदीय समिति ने एक कानून लाकर निजी संस्थानों में आरक्षण का सुझाव दिया है. जिसके बाद, कांग्रेस ने बिना किसी देरी के इस सुझाव का समर्थन कर दिया है. कांग्रेस पिछले लोकसभा चुनाव में भी अपने घोषणापत्र में ये वादा कर चुकी थी कि सरकार बनने की दिशा में वो निजी शिक्षण संस्थानों में आरक्षण लागू करेगी.
इस विषय को समझने वाले कई जानकारों की राय है कि महज अनुच्छेद 15(5) होने से ये लागू नहीं होगा. इसके लिए सरकार को एक अलग से कानून लाना होगा. संविधान में 15(5) के तहत महज प्रावधान किया गया है, लागू करने के लिए सरकार को कानून लाना होगा. एक और बात, जिस रफ्तार से निजी शिक्षण संस्थान बढ़े हैं, और वहां प्रतिनिधित्व की खाई और चौड़ी हुई है, ये विवाद और गहरा सकता है.

Related Articles

Back to top button