सुप्रीम कोर्ट कमेटी की रिपोर्ट में चिंताजनक आंकड़े, छात्रों की मानसिक सेहत पर उठे सवाल
सर्वे में 24.3 लाख से ज्यादा छात्रों के जवाब सामने आए हैं. करीब 9% ने पिछले साल अक्सर या बहुत ज्यादा सुसाइड के विचार आने की बात कही, जबकि 34% ने कैंपस में खुद को किसी हद तक बाहरी महसूस किया.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: सर्वे में 24.3 लाख से ज्यादा छात्रों के जवाब सामने आए हैं. करीब 9% ने पिछले साल अक्सर या बहुत ज्यादा सुसाइड के विचार आने की बात कही, जबकि 34% ने कैंपस में खुद को किसी हद तक बाहरी महसूस किया.
कॉलेज और यूनिवर्सिटी की जिंदगी को अक्सर पढ़ाई, करियर और बेहतर भविष्य से जोड़कर देखा जाता है. लेकिन देशभर के छात्रों के बीच हुए एक बड़े सर्वे ने इस तस्वीर का दूसरा पहलू सामने रखा है. सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित नेशनल टास्क फोर्स के सर्वे में करीब 9 फीसदी छात्रों ने बताया कि पिछले एक साल में उन्हें अक्सर या बहुत ज्यादा आत्महत्या के विचार आए.
वहीं करीब 15 फीसदी छात्रों ने पिछले छह महीनों में लंबे समय तक तनाव, उदासी या बेचैनी महसूस करने की बात कही. सर्वे में 24.3 लाख से ज्यादा छात्रों के जवाब शामिल हैं. हालांकि, टास्क फोर्स ने साफ किया है कि मौजूदा सैंपल पूरे छात्र समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करता, इसलिए इन आंकड़ों को शुरुआती और अस्थायी निष्कर्ष के तौर पर देखा जाना चाहिए.
हर 10 में करीब एक छात्र ने बताई गंभीर परेशानी
सर्वे का सबसे ध्यान खींचने वाला आंकड़ा आत्महत्या से जुड़े विचारों का है. करीब 9 फीसदी छात्रों ने कहा कि पिछले एक साल में उन्हें अक्सर या बहुत ज्यादा ऐसे विचार आए. इसके अलावा करीब 15 फीसदी छात्रों ने बताया कि पिछले छह महीनों में वे कई हफ्तों तक लगातार बहुत ज्यादा परेशान, तनाव में, उदास या चिंतित रहे.
ये आंकड़े ऐसे समय सामने आए हैं जब उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्रों की मानसिक सेहत और आत्महत्या को लेकर देश में गंभीर चर्चा चल रही है. सुप्रीम कोर्ट ने इसी मुद्दे की पड़ताल और रोकथाम के उपाय सुझाने के लिए नेशनल टास्क फोर्स का गठन किया था.
34% छात्रों को कैंपस में लगा कि वो ‘बाहरी’ हैं
सर्वे ने सिर्फ मानसिक तनाव की तस्वीर नहीं दिखाई, बल्कि छात्रों के कैंपस अनुभव को लेकर भी अहम संकेत दिए हैं. करीब 34 फीसदी छात्रों ने अलग-अलग स्तर पर यह महसूस किया कि वो अपने कैंपस में एक ‘आउटसाइडर’ यानी बाहरी व्यक्ति की तरह हैं.
सर्वे में शामिल छात्रों में करीब 67 फीसदी SC, S और OBC वर्गों से थे. टास्क फोर्स पहले भी उच्च शिक्षा में सामाजिक भेदभाव और अलगाव जैसे मुद्दों की जांच कर चुकी है. ऐसे में कैंपस में अपनापन और समान व्यवहार का सवाल भी इस पूरी चर्चा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनता है.
पढ़ाई के साथ करियर और नौकरी की चिंता भी
छात्रों पर दबाव सिर्फ परीक्षा या नंबरों तक सीमित नहीं है. सर्वे में शैक्षणिक दबाव, नौकरी को लेकर अनिश्चितता और करियर चुनने की चिंता जैसी समस्याएं भी सामने आईं. अधिकारियों के अनुसार, शैक्षणिक विकल्पों को लेकर चिंताएं और रोजगार से संबंधित लगातार परेशानियां आम थीं.
ऐसे माहौल में कॉलेज और यूनिवर्सिटी में मिलने वाली मदद काफी महत्वपूर्ण हो जाती है. लेकिन सर्वे के मुताबिक करीब 32 फीसदी छात्रों ने कहा कि उनके संस्थान में काउंसलिंग की सुविधा ही उपलब्ध नहीं थी. वहीं 56 फीसदी छात्रों ने कहा कि उन्हें भरोसा है कि उनका प्रशासन गंभीर मामलों को निष्पक्ष तरीके से संभालेगा.
छात्रों ने किसे लेकर शिकायत की है?
अब तक 19 संस्थानों में 30 बैठकें हो चुकी हैं. दिल्ली-एनसीआर, तमिलनाडु, कर्नाटक, असम और पश्चिम बंगाल के संस्थानों को इसमें शामिल किया गया. छात्रों ने पढ़ाई, सामाजिक जीवन, मानसिक स्वास्थ्य और प्रशासन से जुड़ी कई समस्याएं बताईं. इनमें सख्त अटेंडेंस, ज्यादा शैक्षणिक और क्लिनिकल काम, लंबे ऑन-कॉल घंटे, मुश्किल प्लेसमेंट और शिक्षकों की कमी शामिल हैं. छात्रों ने व्यावहारिक प्रशिक्षण की कमी और पीएचडी गाइड के लापरवाह या जरूरत से ज्यादा नियंत्रण वाले रवैये की शिकायत भी की.
अब सवाल है- छात्रों को किस तरह मिले मदद?
टास्क फोर्स के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती इन संकेतों के आधार पर बेहतर सपोर्ट सिस्टम तैयार करने की है. इसमें संस्थानों में एक जैसी और बेहतर मानसिक स्वास्थ्य मदद, शिक्षकों की ट्रेनिंग, मानसिक स्वास्थ्य को लेकर झिझक कम करना, संकट की स्थिति में तुरंत प्रतिक्रिया देने की व्यवस्था और नियमित निगरानी जैसे कदम शामिल हो सकते हैं.
हालांकि, इन आंकड़ों को अंतिम तस्वीर मानना जल्दबाजी होगी. टास्क फोर्स ने खुद कहा है कि सर्वे के कई हिस्सों का विश्लेषण अभी जारी है और मौजूदा सैंपल प्रतिनिधि नहीं है. नेशनल टास्क फोर्स को अपनी अंतिम रिपोर्ट 31 अक्टूबर 2026 तक सुप्रीम कोर्ट को सौंपनी है.



