यूपी SIR में कथित धांधली: मुस्लिम घरों में दर्ज हिंदू वोटर्स, बुलंदशहर में एक मकान पर 56 और गोरखपुर में 233 नाम

देश में जब से एसआईआर की प्रक्रिया शुरु हुई है तक से गरीबों, दलितों, पिछड़़ों और मुस्लिमों के वोट काटे जाने की अफवाह है। अभी एक दिन पहले राजस्थान से एक बीएलओ का वीडियो वायरल हुआ था,

4पीएम न्यूज नेटवर्क: देश में एसआईआर शुरु कराने से पहले ज्ञानेश जी और उनका विभाग चीख चीख कर दावा पेश करता था कि एसआईआर वोटर लिस्ट को दुरुस्त करने के लिए है लेकिन यूपी से बड़ी खबर निकल कर सामने आई है कि एसआईआर में वोटर लिस्ट में मुस्लिम घरों में हिंदुओं के वोट जोड़ दिए जा रहे हैं।

मामला सामने आने के बाद हड़कंप मच गया है। एक ओर जहां चुनाव अयोग ने जांच शुरु की है तो वहीं दूसरी ओर योगी बाबा के अपने शहर में भी वोटों में घालमेल का भी बड़ा दावा सामने आया है ऐसे में दोनों मामलों को लेकर चुनाव आयोग बुरी तरह से फंस गया है।

देश में जब से एसआईआर की प्रक्रिया शुरु हुई है तक से गरीबों, दलितों, पिछड़़ों और मुस्लिमों के वोट काटे जाने की अफवाह है। अभी एक दिन पहले राजस्थान से एक बीएलओ का वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें बीएलाओ ये साफ तौर पर कहता हुआ दिखाई दिया था कि उस पर प्रेेशर बनाया जा रहा है कि मुस्लिमों के 470 वोटों को काट दिया जाए, इसके लिए बीएलओ ने आत्महत्या करने तक की धमकी दे डाली थी। वीडियो वायरल होने के बाद हंगामा मचा हुआ है, दावा किया जा रहा है कि मुस्लिमों को वोट काटने के लिए पूरे देश में इस तरह से हथकंड़े अपनाए जा रहे हैं।

यूपी से भी इस तरह से एक खबर निकल कर सामने आई है। बुलंदशहर में एक मुस्लिम मकान पर अचानक कहीं से 56 वोट ऐड कर दिए गए हैं। दावा किया जा हा है कि सगीर खान का एक सीधा-सादा मकान है। लेकिन जब नई वोटर लिस्ट आई, तो सगीर खान के पैरों तले जमीन खिसक गई। उनके घर के पते पर एक-दो नहीं, बल्कि 56 वोटर्स के नाम दर्ज कर दिए गए! और दिलचस्प बात देखिए कि इन 56 में से अधिकांश वो हिंदू भाई-बहन हैं, जो न तो सगीर खान को जानते हैं और न ही कभी उस मोहल्ले में रहे हैं।

सवाल यह है कि जब बीएलओ घर-घर जाकर सर्वे करने का दावा करते हैं, तो उन्हें ये 56 लोग सगीर खान के घर में कहाँ सोते हुए दिखे? क्या चुनाव आयोग के कर्मचारी को दिख नहीं रहा था ? या फिर जानबूझकर एक समुदाय के घर में दूसरे समुदाय के वोटर्स को डालकर कोई बड़ा सोशल इंजीनियरिंग का खेल खेला जा रहा है? यह सिर्फ एक गलती नहीं, यह चुनाव आयोग की उस लापरवाही का सबूत है जिसको अक्सर चुनाव अयोग छिपाने की कोशिश करता है। बुलंदशहर की घटना एक इत्तेफाक थी, तो जरा मुख्यमंत्री के गढ़ गोरखपुर का हाल सुन लीजिए। गोरखपुर के एक वार्ड में मकान नंबर 260 पर नजर डालिए। यहाँ के वोटर लिस्ट के मुताबिक, इस एक अकेले मकान में 233 वोटर्स रहते हैं!

सवाल यह है कि क्या यह एक घर है या फिर कोई मोहल्ला, जहां एक ही घर में 233 लोग रह रहे हैं। सवाल यह है कि एक ही पते पर इतने सारे नाम कैसे चढ़ गए? क्या चुनाव आयोग के पास इतना भी कॉमन सेंस नहीं है कि एक सामान्य मकान में इतने लोग नहीं रह सकते? सवाल यह खड़ा हो रहा है कि जब सीएम सिटी यानि गोरखपुर जैसे वीआईपी जिले में अगर ऐसी धांधली हो रही है, तो समझ लीजिए कि पूरे यूपी के बाकी जिलों का क्या हाल होगा। यह साफ तौर पर इशारा करता है कि वोटर लिस्ट को अपडेट नहीं, बल्कि हेरफेर किया जा रहा है।

मामला तब उजागर हुआ जब शिकारपुर तहसील के पहासू कस्बे के पठान टोला क्षेत्र के कई निवासियों ने आरोप लगाया कि उनके पते पर ऐसे मतदाताओं के नाम दर्ज किए जा रहे हैं, जिन्हें वे पहचानते तक नहीं हैं। इस मामले में स्थानीय निवासी सगीर खान ने प्रशासन को एक लिखित शिकायत दी है। उन्होंने दावा किया कि पिछले महीने एसआईआर प्रक्रिया शुरू होने से पहले मतदाता सूची सही थी, लेकिन ड्राफ्ट मतदाता सूची के प्रकाशन के बाद उसमें कई त्रुटियां सामने आई हैं। सगीर खान ने बताया कि छह से अधिक मुस्लिम परिवारों के पते पर 56 हिंदू मतदाताओं का पंजीकरण दिखाया गया है। उन्होंने कहा, “इस इलाके में कम से कम आठ घरों में पंजीकृत मतदाताओं की संख्या में अचानक बढ़ोतरी देखी गई है।

मेरे घर, जिसका मकान नंबर 125 है, में ही कम से कम सात नए नाम जोड़े गए हैं, और ये सभी हिंदू समुदाय से हैं। इसी तरह, इलाके के आठ अन्य घरों में भी मतदाताओं की संख्या में असामान्य वृद्धि हुई है। कुल मिलाकर, हमारे क्षेत्र से लगभग 56 नए मतदाताओं के नाम सूची में जोड़े गए हैं। द वायर ने लिखा, मामला सामने आने के बाद शिकारपुर के एसडीएम अरुण कुमार ने कहा कि मसौदा मतदाता सूची में कुछ विसंगतियां पाई गई हैं। उन्होंने बताया कि 307 मामलों में फॉर्म-8 के माध्यम से सुधार की प्रक्रिया चल रही है और सत्यापन पूरा होने के बाद सभी वास्तविक शिकायतों का निस्तारण किया जाएगा।

वैसे तो बिहार एसआईआर कराने के बाद चुनाव आयोग ने दावा किया कि उन्होंने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन किया है ताकि लिस्ट साफ-सुथरी हो सके। इस सफाई के नाम पर उत्तर प्रदेश में 2.89 करोड़ लोगों के नाम लिस्ट से काट दिए गए। आयोग कहता है कि ये लोग या तो मर चुके हैं, या शिफ्ट हो गए हैं, या फर्जी थे। लेकिन इस पर पेंच फंसा हुआ है, क्योंकि इतनी बडी संख्या में वोटों का कटना हजम नहीं हो रहा है और यही वजह है कि जब खािमयां सामने आ रही हैं तो सवाल उठ रहे है। विपक्ष बिहार से लेकर यूपी तक और खासतौर से राजस्थान के मामले सामने आने के बाद खुले तौर पर यह कहने लगा है कि चुन-चुनकर उन लोगों के नाम काटे गए जो सत्ता पक्ष के खिलाफ वोट कर सकते थे। एक तरफ करोड़ों असली वोटर्स के नाम काट दिए गए, और दूसरी तरफ एक-एक घर में सैकड़ों फर्जी नाम भर दिए गए। चुनाव आयोग जो फुल फेयर लिस्ट बनाने का दावा कर रहा था वो असल में वो वोटर लिस्ट में भयंकर गड़बड़ियों का हिमालय बना चुका है।

वैसे तो चुनाव आयोग कहता है कि हमारी प्रक्रिया पारदर्शी है। लेकिन जब सगीर खान के घर में 56 लोग घुस जाते हैं और गोरखपुर में 233 नाम एक ही घर पर मिलते हैं, तो आयोग की पारदर्शिता के दावे शून्य हो जाते हैं। लेकिन सवाल यह है कि ऐसी नौबत आई ही क्यों? देश में सिर्फ और सिर्फ इसलिए एसआईआर कराया जा रहा है कि ताकि वोटर लिस्ट दुरुस्त हो जाए और जिस तरह का केस बुलंदशहर और गोरखपुर से समाने आया है वो पूरी एसआईआर प्रक्रिया पर सवाल उठाता है। इसी तरह का एक मामला सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग भी है। जिसमें बिहार में एसआईआर कराने के बाद भी कई खामियां पाई गई हैं।

द रिपोर्ट्स कलेक्टिव ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें दावा किया गया था कि एक एसआईआर के बाद भी 14 लाख से ज्यादा मतदाता फर्जी हैं लेकिन चुनाव आयोग ने अपने पुराने साफ्टवेयर के खराब होने का हवाला देते हुए पूरे मामले पर कन्नी काट ली थी लेकिन सवाल बड़ा खड़ा हुआ था कि चुनाव आयोग यही कर कह कर वोटर लिस्ट दुरुस्त कर रहा है कि फर्जी और गलत वोटर्स को हटाना है और वोटर लिस्ट दुरुस्त करनी है। लेकिन जिस तरह से राजस्थान के बाद यूपी में मामला सामने आया है, ऐसे में एसआईआर की प्रक्रिया सवालों के घरे में हैं।

हलांकि अभी समय है सारी समस्याएं सही हो जाएंगी लेकिन अगर ये खामी फाइनल वोटर लिस्ट आने के बाद हुई तो भयंकर पूरा चुनाव प्रभावित होगा और अगर गलत वोटर लिस्ट से चुनाव होगा तो चुनाव पर सवाल खड़ा होगा। ऐसे में चुनाव आयोग को नींद से जागना होगा। उन्हें जवाब देना होगा कि करोड़ों के बजट और आधुनिक टेक्नोलॉजी के बावजूद ऐसी बचकानी और खतरनाक गलतियां कैसे हो रही हैं? आयोग को ये याद रखना चाहिए कि वो किसी पार्टी का गुलाम नहीं, बल्कि इस देश के संविधान का रक्षक है।

Related Articles

Back to top button