राजधानी को पाबंदियों के हवाले क्यों किया गया

- किसी प्रदर्शन में हिंसा हो तो कानून अपना काम करे : कोर्ट
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। यहां सवाल सिर्फ दिल्ली पुलिस की बैरिकेडिंग का नहीं है। सवाल उस सोच का है, जिसमें किसी विरोध की आशंका होते ही पूरे शहर को पाबंदियों के हवाले कर दिया जाता है। लोकतंत्र में सरकार के पास कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी जरूर है लेकिन क्या यह जिम्मेदारी नागरिकों के अधिकारों को कुचलने का खुला अधिकार भी दे देती है क्या शांतिपूर्ण प्रदर्शन की संभावना मात्र से मेट्रो रेल और इंटरनेट जैसी जरूरी सेवाओं को बाधित करना उचित ठहराया जा सकता है?
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों ने इसी बुनियादी सवाल को फिर सामने ला दिया है। सरकार और प्रशासन के सामने चुनौती साफ है कानून व्यवस्था भी बनाए रखनी है और संविधान से मिले अधिकारों की रक्षा भी करनी है। किसी प्रदर्शन में हिंसा हो तो कानून अपना काम करे लेकिन निहत्थे और शांतिपूर्ण लोगों को पहले से अपराधी मानकर पूरी राजधानी को घेरे में लेना किस लोकतांत्रिक व्यवस्था की पहचान है?
बैरिकेड लगाकर आवाज नहीं रोकी जा सकती!
दिल्ली में विरोध प्रदर्शन को रोकने के लिए अपनाए गए सख्त उपाय अब खुद सवालों के घेरे में हैं। जिस राजधानी में संसद बैठती है जहां देश के कानून बनते हैं और जहां संविधान की रक्षा की सबसे बड़ी कसौटी सामने आती है उसी राजधानी में प्रदर्शन की आशंका के बीच आम लोगों की आवाजाही और सार्वजनिक परिवहन पर व्यापक पाबंदियां चर्चा के केंद्र में आ गयी सरकार और प्रशासन का तर्क कानून-व्यवस्था बनाए रखना हो सकता है लेकिन सवाल यह है कि इसके लिए क्या पूरे शहर को असुविधा में डालना जरूरी था?
सुप्रीम कोर्ट की विशेष सुनवाई सरकार को निर्देश
आज सुप्रीम कोर्ट में विशेष सुनवाई हुई। मामला दिल्ली में विरोध प्रदर्शन के दौरान लगाई गई पाबंदियों, लोगों को हिरासत में लिए जाने और पहले दिए गए निर्देशों के उल्लंघन से जुड़ा था। सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि नागरिकों को अनावश्यक परेशानी नहीं होनी चाहिए और सार्वजनिक सेवाओं का संचालन सामान्य रूप से सुनिश्चित किया जाना चाहिए। अदालत ने दिल्ली में बैरिकेड हटाने, मेट्रो और रेल सेवाएं सामान्य रखने तथा इंटरनेट कनेक्टिविटी बहाल करने के निर्देश दिए। साथ ही, लोगों की स्वतंत्र आवाजाही में बाधा नहीं डालने और शांतिपूर्ण, निहत्थे प्रदर्शनकारियों को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में नहीं लेने पर जोर दिया।
सुप्रीम कोर्ट के आसपास धारा 163 के बोर्ड हटाने का निर्देश
रविवार की सुनवाई में अदालत ने अपने आसपास धारा 163 लागू होने से संबंधित बोर्ड हटाने का निर्देश भी दिया। यह निर्देश उस व्यापक बहस से जुड़ा है जिसमें सुरक्षा व्यवस्था और न्याय तक नागरिकों की पहुंच के बीच संतुलन बनाए रखने की जरूरत है। कानून के तहत निषेधाज्ञा लागू करने की व्यवस्था है। किसी संभावित खतरे या सार्वजनिक व्यवस्था की वास्तविक आशंका के मद्देनजर प्रशासन प्रतिबंध लगा सकता है। लेकिन ऐसे प्रतिबंधों का इस्तेमाल परिस्थितियों के मुताबिक होना चाहिए। वे अनिश्चितकालीन या हर स्थिति में लागू रहने वाली सामान्य व्यवस्था का विकल्प नहीं हो सकते। सुप्रीम कोर्ट के आसपास वकीलों, वादकारियों और दूसरे नागरिकों का आना-जाना भी जरूरी है। अदालत तक पहुंच बाधित होने या न्यायिक कामकाज में परेशानी पैदा होने पर उसका असर उन लोगों पर पड़ता है, जो अपने अधिकारों के लिए न्यायालय आए हैं। इसलिए सुरक्षा के इंतजामों को इस तरह लागू करना जरूरी है कि जरूरत पूरी हो, लेकिन न्याय तक पहुंच और नागरिकों की सामान्य गतिविधियां अनावश्यक रूप से बाधित न हों। अदालत के निर्देश इसी संतुलन की अहमियत को सामने लाते हैं।
प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए आम जनता को क्यों रोका?
दिल्ली में लगाई गई पाबंदियों पर सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि उद्देश्य केवल प्रदर्शन को नियंत्रित करना था तो उसका बोझ आम नागरिकों पर क्यों पड़ा मेट्रो किसी एक राजनीतिक दल की सुविधा नहीं है। रेल किसी एक संगठन की संपत्ति नहीं है। इंटरनेट किसी एक आंदोलन की जरूरत नहीं है। इन सेवाओं पर निर्भर लाखों लोगों का रोजमर्रा का जीवन चलता है। कोई कर्मचारी अपने कार्यालय पहुंचने के लिए मेट्रो का इस्तेमाल करता है। कोई विद्यार्थी परीक्षा देने जा रहा होता है। किसी को अस्पताल पहुंचना होता है तो किसी को जरूरी काम से दूसरे शहर की ट्रेन पकडऩी होती है। इन सभी लोगों को आंदोलन की राजनीति से अलग रखकर देखना जरूरी है। यदि प्रशासन को किसी खास इलाके में भीड़ बढऩे की आशंका थी तो वह यातायात का मार्ग बदल सकता था पुलिस बल तैनात कर सकता था प्रवेश और निकास को व्यवस्थित कर सकता था और प्रदर्शन स्थल के आसपास सुरक्षा के उचित इंतजाम कर सकता था। लेकिन सार्वजनिक परिवहन पर व्यापक रोक या इंटरनेट बंद करने जैसे कदमों का औचित्य भी उतनी ही गंभीरता से समझाया जाना चाहिए।




