सूरत के टेक्सटाइल-एम्ब्रॉयडरी उद्योग पर संकट, AAP ने की हस्तक्षेप की मांग 

सूरत के जीवनरेखा समान टेक्सटाइल और एम्ब्रॉयडरी उद्योग पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं... उद्योग से जुड़े विवाद का सुखद समाधान...

4पीएम न्यूज नेटवर्कः सूरत की चमकती मिलों में अब मशीनें तो पूरी रफ्तार से चल रही हैं.. लेकिन उनको चलाने वाले मजदूरों के पांव अब गांव की तरफ लौट रहे हैं.. बता दें कि गांव चलो अभियान ने तूल पकड़ लिया है.. सूरत में शुरू हुआ यह आंदोलन अब अपने चरम पर पहुंच चुका है.. उत्तर प्रदेश और बिहार से आए लाखों मजदूर अब शहर छोड़कर अपने घरों की राह पकड़ रहे हैं.. 12 घंटे की कड़ी मेहनत, छुट्टी मांगने पर काटी जाने वाली सैलरी.. और नौकरी से निकाल दिए जाने का डर अब उन्हें बर्दाश्त नहीं हो रहा.. गुजरात में करीब 10 लाख मजदूरों ने इस मोर्चे को खोला है.. सूरत के टेक्सटाइल और एम्ब्रॉयडरी उद्योग में मजदूर और मिल-दुकान मालिक काम के घंटे, साप्ताहिक छुट्टी.. और बकाए वेतन को लेकर आमने-सामने खड़े हो गए हैं..

आपको बता दें कि इस तनाव के चलते उत्तर प्रदेश और बिहार के बड़ी संख्या में मजदूर गांव चलो आंदोलन के तहत अपने घर लौट रहे हैं.. मजदूरों का साफ आरोप है कि उनसे रोजाना 12 घंटे काम कराया जाता है.. जबकि श्रम कानूनों के अनुसार आठ घंटे की ड्यूटी तय होनी चाहिए.. और उसी के हिसाब से वेतन मिलना चाहिए.. हकीकत में ओवरटाइम का पैसा भी सही से नहीं मिलता.. कई जगह तो वीकली ऑफ तक नहीं दिया जाता.. जब कोई मजदूर बीमार पड़कर या परिवार की मजबूरी में छुट्टी मांगता है.. तो उसकी सैलरी काट ली जाती है.. कई बार तो सीधा नौकरी से निकाल दिया जाता है.. वहीं यह प्रताड़ना अब असहनीय हो चुकी है.. सूरत की चमकदार मिलों की चमक के पीछे मजदूरों की थकी हुई आंखें और टूटे हुए सपने छिपे हैं..

सूरत में एम्ब्रॉयडरी उद्योग के मालिकों.. और कारीगरों के बीच लंबे समय से चल रहे विवाद को सुलझाने के लिए सरकार की मध्यस्थता की मांग को लेकर आम आदमी पार्टी के प्रदेश संगठन मंत्री धर्मेश भंडेरी.. और सूरत शहर अध्यक्ष पंकज आंबलिया ने संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की.. मीडिया को संबोधित करते हुए दोनों नेताओं ने उद्योग की गंभीर स्थिति पर प्रकाश डाला.. और उन्होंने कहा कि सूरत का प्रमुख टेक्सटाइल और एम्ब्रॉयडरी क्षेत्र वर्तमान में गहरे संकट से गुजर रहा है.. मशीन मालिकों और कारीगरों के बीच पैदा हुए मतभेद तथा भेदभाव की स्थिति ने पूरे व्यवसाय को प्रभावित किया है.. सरकार को इस मुद्दे पर तुरंत हस्तक्षेप करके दोनों पक्षों के बीच सामंजस्य स्थापित करना चाहिए.. लेकिन अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है.. यह उद्योग गुजरात की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है.. और इसमें लाखों परिवारों की आजीविका जुड़ी हुई है..

एम्ब्रॉयडरी मशीन मालिकों को कई व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है.. टेक्सटाइल व्यापारियों से भुगतान तीन से सात महीने बाद मिलता है.. और कभी-कभी व्यापारी अपना कारोबार समेटकर गायब हो जाते हैं.. इसके बावजूद मशीन मालिक हर पंद्रह दिन में कारीगरों को वेतन देते हैं.. धागा कटिंग, रोल पॉलिश जैसे सभी सब-जॉबवर्क करने वालों को भी समय पर भुगतान किया जाता है.. ये मालिक लाखों-करोड़ों रुपये का जीएसटी नियमित रूप से भरते हैं.. और उद्योग को चालू रखने के लिए निरंतर प्रयास करते हैं.. इतनी जिम्मेदारी निभाने के बावजूद प्रशासन.. और पुलिस इस मुद्दे पर ध्यान नहीं दे रही है.. भाजपा सरकार की ओर से भी कोई सक्रिय रुख नहीं अपनाया जा रहा है.. जिससे मालिकों में निराशा बढ़ रही है..

वहीं हर संकट की घड़ी में मशीन मालिकों ने कारीगरों को परिवार की तरह संभाला है.. रहने-खाने की व्यवस्था से लेकर अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं.. सीजन के दौरान कारीगर तीस हजार से पचास हजार रुपये तक कमाई कर लेते हैं.. पुरानी व्यवस्था से कारीगरों को कोई विशेष शिकायत नहीं थी.. फिर भी कुछ तत्वों द्वारा उन्हें उकसाया जा रहा है.. जिससे तनाव बढ़ रहा है.. यह स्थिति पूरे उद्योग के लिए घातक साबित हो सकती है.. जब मालिक और कारीगर दोनों एक-दूसरे पर निर्भर हैं.. तब बाहरी हस्तक्षेप से माहौल बिगाड़ना किसी के हित में नहीं है.. सरकार को इस पहलू पर गंभीरता से विचार करना चाहिए..

 

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