चिराग से लगी आग, एनडीए सरकार पर आंच

- NDA के भीतर बढ़ती बेचैनी, सहयोगी दल ढूंढ रहे हैं एक्जिट का रास्ता
- मोदी की सरकार पर ढीली होती पकड़!
- उथल-पुथल भरे राजनीतिक माहौल में चिराग के बयान से राजनीतिक विस्फोट
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। चिराग पासवान का बयान तेजी से वायरल हो रहा है। बिल्कुल कोरोना वायरस की तरह इंटरनेट पर तैर रहे इस बयान ने एनडीए के भीतर की टूटन को सार्वजनिक कर देने का काम कर दिया है। उनका बयान भले ही पुराना बताया जा रहा हो लेकिन उस बयान के जरिये देश की राजनीति का तापमान चढ़ चुका है।
ज्ञानेश कुमार के एपिसोड से डैमेज कंट्रोल का रास्ता ढूंढने में नाकाम सरकार के रणनीतिकारों को चिराग पासवान के इस बयान ने बेचैन कर दिया है। चिराग पासवान ने सीधे अपनी ही सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया था। उन्होंने कहा था कि मुझे शर्म आती है कि मैं ऐसी सरकार का समर्थन कर रहा हूं जहां अपराध पूरी तरह बेलगाम हो चुका है। बात यहीं नहीं रुकी। पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी उन्होंने बेहद कड़ा हमला बोला और सरकार से समय रहते कार्रवाई की मांग की।
दबाव में पीएम मोदी सरकार पर खतरा!
तेजी से बदलते राजनीतिक हालातों में इस बात के साफ संकेत दिखायी दे रहे हैं कि केन्द्र सरकार सकते में है। काकरोच जनता पार्टी का सरकार पर हल्ले के बाद धमेन्द्र प्रधान का इस्तीफा हो चुका है और अब इस्तीफे का पूरा दबाव इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश कुमार के उपर है क्योंकि अब सरकार के सहयोगी दल भी हर मुद्दे पर चुप रहने के बजाय अपनी राजनीतिक लाइन सार्वजनिक कर रहे हैं। यही वह जगह है जहां सवाल पैदा होता है कि क्या यह सिर्फ मुद्दा आधारित असहमति है या गठबंधन के भीतर राजनीतिक दूरी बढ़ रही है फिलहाल जवाब साफ नहीं है लेकिन सवाल अब सार्वजनिक हो चुका है।
महत्तवपूर्ण है चिराग का बयान
चिराग का बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह विपक्ष में बैठकर सरकार को नहीं घेर रहे हैं। वह उसी गठबंधन का हिस्सा हैं जिसकी सरकार पर सवाल उठा रहे हैं। चुनाव आयोग के मामले में भी यही तस्वीर दिखाई दी। एनडीए के भीतर से ही आयोग से स्थिति स्पष्ट करने की मांग आई है। यानि एनडीए के भीतर असहमति के स्वर सार्वजनिक होने लगे हैं। सवाल अब यह है कि क्या यह अलग अलग घटनाएं हैं या सत्ता के गठबंधन के भीतर बढ़ती बेचैनी के संकेत क्योंकि राजनीति में गठबंधन सिर्फ सीटों से नहीं चलते वह भरोसे से चलते हैं और जब साथी ही पूछने लगें कि जवाब दीजिए तो सत्ता को जवाब देना ही पड़ता है।
अब जरा इस बयान को दिल्ली की राजनीति के साथ जोड़कर देखिए
यही चिराग कुछ दिन पहले मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर भी सवाल उठा चुके हैं। उनका कहना था कि अगर चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थान को लेकर लोगों के मन में सवाल उठ रहे हैं तो आयोग को अपनी स्थिति साफ करनी चाहिए। उनके मुताबिक सफाई राहुल गांधी को नहीं जनता को दी जानी चाहिए। बयानों के मामले में एनडीए नेताओं में चिराग अकेले नेता नहीं है। एसआईआर और चुनाव आयोग को लेकर एनडीए के भीतर से उपेंद्र कुशवाहा और टीडीपी की ओर से भी स्पष्टीकरण और पारदर्शिता की मांग सामने आई। यानी जिस मुद्दे पर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा था उसी मुद्दे पर सरकार के सहयोगी भी अब सार्वजनिक रूप से जवाब मांग रहे हैं।
एनडीए की ताकत सिर्फ सीटें नहीं सहयोगी दल भी हैं
एनडीए की ताकत सिर्फ बीजेपी की सीटों में नहीं बल्कि उसके सहयोगी दलों के साथ बने राजनीतिक समीकरण में भी है। ऐसे में सहयोगी दलों की सार्वजनिक असहमति को नजरअंदाज करना आसान नहीं। ज्ञानेश कुमार और एसआईआर के सवाल पर चिराग पासवान, उपेंद्र कुशवाहा और टीडीपी से जुड़े नेताओं की ओर से चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण की मांग सामने आई। चिराग ने साफ कहा कि चुनाव प्रक्रिया को लेकर लोगों के मन में संदेह पैदा होना समस्या है और आयोग को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। अब बिहार में वही चिराग अपनी गठबंधन सरकार की कानून व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं। दोनों घटनाओं के मुद्दे अलग हैं लेकिन राजनीति का सवाल एक है।




