परिसीमन के चक्रव्यूह में फंस गयी मोदी सत्ता

- एनडीए सरकार की उलटी गिनती शुरू
- एलओपी राहुल गांधी की भविष्यवाणी, दक्षिण की सियासत और नायडू की नाराजगी के कयासों से दिल्ली में हलचल
- एक विधेयक दांव पर सरकार का सियासी गणित
- संजय राउत के एक बयान से दिल्ली में हलचल
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। संसद में बहुमत की ताकत दिखाने वाली मोदी सरकार के सामने अब एक ऐसा सियासी सवाल खड़ा हो रहा है जिसका जवाब दिल्ली की सत्ता के गलियारों में नहीं बल्कि दक्षिण भारत की राजनीतिक करवट से निकल रहा है। प्रस्तावित परिसीमन विधेयक सत्ता के लिए महज सीटों की संख्या बढ़ाने का मामला नहीं रह गया है।
यह दक्षिण भारतीय राज्यों की राजनीतिक हिस्सेदारी केंद्र और राज्यों के रिश्तों तथा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के भीतर भरोसे की परीक्षा बनता जा रहा है। अप्रैल में संविधान संशोधन से जुड़ा प्रस्तावित विधेयक लोकसभा में जरूरी दो तिहाई समर्थन नहीं जुटा पाया था। अब अक्टूबर के अंत तक इसे फिर लाने की चर्चाओं के बीच सरकार विपक्षी दलों से समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही है।
राहुल गांधी की भविष्यवाणि और बदलती राजनीतिक परिस्थतियां
राहुल गांधी लगातार मोदी सरकार के भविष्य को लेकर राजनीतिक दावे कर रहे हैं। ऐसे में परिसीमन का विवाद विपक्ष को नया मुद्दा दे रहा है। दक्षिण के दलों को आशंका है कि आबादी के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण उनके राजनीतिक प्रभाव को कमजोर किये जाने की राजनीतिक साजिश चल रही है। इसलिए दक्षिण की राजनीतिक पार्टियां अपने मन मुटाव को भुलाकर एक हो रही है। इनमें वह राजनीतक दल भी शामिल हैं जो सरकार को सपोर्ट कर रहे हैं। इस पूरे मुद्दे पर सरकार का पक्ष है कि प्रस्तावित व्यवस्था में दक्षिणी राज्यों की सीटें भी बढ़ेंगी और उनकी कुल हिस्सेदारी लगभग बरकरार रखी जा सकती है। इसी टकराव के बीच चंद्रबाबू नायडू और दूसरे क्षेत्रीय नेताओं की अगली चाल पर नजरें टिकी हैं।
अपनी ढपली अपना राग
मोदी सरकार के सहयोगियों के सामने भी अपनी-अपनी राजनीतिक मजबूरियां है तो दूसरी तरफ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के भीतर क्षेत्रीय सहयोगियों की भूमिका पर भी नजरें टिकी हैं। चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार जैसे नेताओं का राजनीतिक महत्व इस बात से भी जुड़ा है कि केंद्र की राजनीति में उनके दलों का समर्थन कितना निर्णायक रहता है। वहीं परिसीमन बिल पर सरकार के पक्ष में अभी नंबर नहीं जुट रहे। करीब 36 सांसदों की कमी है। वाईएसआरसीपी और बीजेडी के भी राहुल गांधी के साथ जाने की संभावना बढ़ गई है। जगन के सुर बदल चुके हैं। बीजेडी भी बीजेपी से दूरी बना सकती है।
अप्रैल में अटक गया था परिसीमन का दांव अब नए ड्राफ्ट की तैयारी
परिसीमन विधेयक को लेकर केंद्र सरकार की मुश्किलें अप्रैल 2026 में ही सामने आ गई थीं। सरकार ने लोकसभा में परिसीमन विधेयक 2026 और इससे जुड़ा संविधान (131वां संशोधन) विधेयक पेश किया था। हालांकि संविधान संशोधन के लिए जरूरी दो तिहाई समर्थन नहीं मिलने के कारण 17 अप्रैल को यह प्रस्ताव पारित नहीं हो सका। इस घटनाक्रम ने साफ कर दिया कि लोकसभा की सीटों के पुनर्गठन का मुद्दा महज संवैधानिक प्रक्रिया नहीं बल्कि देश के राजनीतिक संतुलन से जुड़ा बड़ा सवाल बन चुका है। विधेयक को लेकर दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताएं सरकार के सामने बड़ी चुनौती हैं। इन राज्यों को आशंका है कि यदि परिसीमन में आबादी को प्रमुख आधार बनाया गया तो जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने के बावजूद संसद में उनका राजनीतिक प्रभाव कमजोर पड़ सकता है। दूसरी ओर केंद्र सरकार की ओर से पहले पेश किए गए प्रस्ताव में लोकसभा की कुल सीटें बढ़ाकर 816 करने और दक्षिणी राज्यों की सीटें भी बढ़ाने की बात कही गई थी।
राहुल लौटेंगे सत्ता बदलेगी : संजय राउत
शिवसेना (यूबीटी) के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद संजय राउत ने प्रेस कांफ्रेंस कर कहा है कि राहुल गांधी को वियतनाम दौरे से वापस आने दीजिए आप देखेंगे कि रिजीम चेंज हो जाएगा आप देखते रहिए। राउत का यह बयान महज एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं है इसके पीछे विपक्ष की बड़ी रणनीति का संकेत छिपा है। खास बात यह है कि हाल के दिनों में सत्ता परिवर्तन को लेकर विपक्षी नेताओं की बयानबाजी लगातार चर्चा में रही है। राहुल गांधी चुनावी प्रक्रिया और लोकतांत्रिक संस्थाओं से जुड़े सवालों पर सरकार को घेरते रहे हैं वहीं इंडिया गठबंधन भी अपने विरोध प्रदर्शनों के जरिए राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है।
विपक्ष की नई गोलबंदी मोदी के कुनबे में बेचैनी
भारतीय राजनीति का पहिया दिलचस्प मोड़ पर खड़ा है। एक दौर था जब विपक्षी दलों की राजनीति का बड़ा हिस्सा कांग्रेस के विरोध के इर्द-गिर्द घूमता था। क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस से मुकाबले के लिए अपने अपने राज्यों में मजबूत हुयी कई दलों ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने के नाम पर राजनीतिक जमीन तैयार की। लेकिन आज तस्वीर में बदलाव के संकेत दिखाई दे रहे हैं। राहुल गांधी अब केवल कांग्रेस के नेता नहीं बल्कि विपक्षी एकजुटता की बहस के केंद्र में भी नजर आ रहे हैं। उद्धव ठाकरे, शरद पवार, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव जैसे नेताओं के साथ विपक्षी राजनीति में तालमेल की संभावनाएं इस चर्चा को हवा दे रही हैं। तमिलनाडु के नेता विजय थलपति का नाम भी राष्ट्रीय राजनीतिक समीकरणों के संदर्भ में चर्चा में है। इन सभी नेताओं ने राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने का औपचारिक समर्थन कर देने के बाद राहुल के पक्ष में महौल बन चुका है। राहुल गांधी की राजनीतिक यात्रा में आलोचना चुनावी हार संगठनात्मक चुनौतियां और नेतृत्व पर सवाल लगातार रहे हैं। मगर अब विपक्षी राजनीति के केंद्र में उनके बने रहने को कांग्रेस के लिए एक अवसर के रूप में देखा जा रहा है। संसद से लेकर चुनावी मुद्दों तक राहुल गांधी लगातार सरकार को घेर रहे हैं। यह बदलाव केवल किसी एक नेता को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाने की कहानी नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या विपक्ष अपने क्षेत्रीय हितों और नेतृत्व संबंधी मतभेदों से ऊपर उठकर कोई साझा राजनीतिक एजेंडा तैयार कर सकता है? यदि ऐसा होता है तो मुकाबला सिर्फ बीजेपी बनाम कांग्रेस नहीं रहेगा बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता और विपक्ष के बीच व्यापक राजनीतिक टक्कर का रूप ले सकता है।




