आईटीबीपी के डीजी शत्रुजीत कपूर ने नारवाणे के आरोपों पर लगा दी मोहर

सीमा पर चीन से आमना-सामना तो फिर दिल्ली में चुप्पी क्यों?

  • गलवान से असफिला तक चीन सीमा पर क्या-क्या बदला देश को कितना बताया गया?
  • नारवणे के संस्मरण से लेकर आईटीबीपी डीजी के खुलासे तक चीन सीमा पर सरकार की रणनीति फिर सवालों के घेरे में!

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। गलवान में 20 भारतीय सैनिकों की शहादत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को भरोसा दिलाया था कि जवानों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। लेकिन छह साल बाद अरुणाचल प्रदेश के असफिला-ताकसिंग क्षेत्र से आ रही खबरें एक नया सवाल खड़ा कर रही हैं। अगर सीमा पर सब कुछ सामान्य है तो भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच आमने सामने की स्थिति अब भी क्यों बनी हुई है। यह सवाल किसी विपक्षी नेता की प्रेस कॉन्फ्रें स से नहीं बल्कि आईटीबीपी के महानिदेशक शत्रुजीत कपूर के बयान के बाद उठा है। अलवर में आईटीबीपी के जवानों को संबोधित करते हुए कपूर ने कहा कि अरुणाचल प्रदेश में कई स्थानों पर चीनी सैनिकों के साथ फेसऑफ की स्थिति बनी हुई है। इस पूरे एपीसोड के बाद देश में राजनीतिक माहौल गर्म हो गया है और कांग्रेस हमलावर है। देश की अन्य राजनीतिक पार्टियां भी सरकार से सवाल कर रही है। गौरतलब है कि इसी विषय पर देश में कंट्रोवर्सी उस समय चरम पर थी पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की लिखी पुस्तक को सार्वजनिक मंच पर आने से रोका गया था। एक बार फिर चीन को लेकर देश की राजनीतिक महौल गर्म हो चुका है। राष्ट्रीय सुरक्षा पर सवाल उठाना सैनिकों के शौर्य पर सवाल उठाना नहीं है। उलटे सीमाओं पर डटे जवानों के सम्मान का तकाजा है कि देश को वास्तविक स्थिति के बारे में स्पष्ट और तथ्यपरक जानकारी मिले। सरकार को जवाब देना होगा कि असफिला में क्या हुआ क्या बदला और आगे की रणनीति क्या है।

अब दिल्ली को स्पष्ट करना होगा कि असफिला में आगे क्या?

आईटीबीपी के डीजी का बयान इतना जरूर बताता है कि अरुणाचल में सीमा पर आमने सामने की स्थिति बनी हुई है और उसका समाधान अभी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं हुआ है। सरकार को इस स्थिति पर देश को भरोसे में लेना चाहिए। सीमा पर तनाव की प्रकृति सैन्य वार्ताओं की प्रगति और गश्ती गतिविधियों पर संभावित असर के बारे में यथासंभव स्पष्ट जानकारी दी जानी चाहिए। साथ ही आधुनिक उपकरणों और विशेष प्रशिक्षण की जरूरतों पर भी समयबद्ध कार्रवाई होनी चाहिए।

असफिला में आमने-सामने सैनिक, आखिर मामला क्या है?

अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबानसिरी जिले में असफिला-ताकसिंग क्षेत्र लंबे समय से संवेदनशील सीमा क्षेत्र माना जाता है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक जुलाई के अंतिम दिनों में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच गश्त के दौरान आमना सामना हुआ। इसके बाद चीनी सैनिकों की गतिविधियों और क्षेत्र में तंबू लगाए जाने की खबरें के बीच भारत ने भी अपने सैनिकों की गश्त और तैनाती को बढ़ा दिया। अब एक बार फिर आईटीबीपी प्रमुख ने कहा है कि अरुणाचल में कई स्थानों पर फेसऑफ की स्थिति बनी हुई है। उन्होंने यह भी बताया कि शौर्य कमांडो टीमों ने इन परिस्थितियों में अच्छा प्रदर्शन किया। हालांकि उन्होंने सार्वजनिक बयान में हर स्थान, घटना की अवधि या सैन्य तैनाती का विस्तृत ब्योरा नहीं दिया। यही वह जानकारी है जिसे लेकर सरकार से स्पष्टता मांगी जा रही है। कितने स्थानों पर गतिरोध है? क्या दोनों पक्षों की गश्त प्रभावित हुई है? स्थानीय कमांडरों के बीच बातचीत से कितना समाधान निकला? और क्या मौजूदा तैनाती से पहले जैसी स्थिति बहाल हो पाई है। इन सवालों का जवाब सैन्य गोपनीयता का उल्लंघन किए बिना भी दिया जा सकता है।

डीजी का बयान सरकार के पास जवाब क्या है?

शत्रुजीत कपूर का बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सीमा की सुरक्षा में तैनात बल के शीर्ष अधिकारी की ओर से आया है। उन्होंने केवल तनाव की बात नहीं की बल्कि शौर्य कमांडो टीमों के प्रदर्शन और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में लडऩे की क्षमता मजबूत करने पर भी जोर दिया। आईटीबीटी चीन से लगी लगभग 3,488 किलोमीटर लंबी एलएसी की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कपूर ने बताया कि बल को आधुनिक युद्ध की बदलती जरूरतों के मुताबिक तैयार करना होगा। उन्होंने ड्रोन, एंटी-ड्रोन प्रणाली, विशेष प्रशिक्षण और आधुनिक उपकरणों की जरूरत पर भी बल दिया। यह बयान दो स्तरों पर महत्वपूर्ण है। पहला, सीमा पर वास्तविक परिस्थितियां कितनी चुनौतीपूर्ण हैं। दूसरा उन परिस्थितियों से निपटने के लिए सुरक्षा बलों को किस तरह की तैयारी चाहिए। चीन ने पिछले वर्षों में अपनी सेना सीमा अवसंरचना और निगरानी क्षमता का विस्तार किया है। ऐसे में भारत को भी आधुनिक तकनीक बेहतर संचार निगरानी उपकरण और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में विशेष प्रशिक्षण पर ध्यान देना होगा।

आदेश किसने दिए थे, जिम्मेदारी किसकी थी?

पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे के संस्मरण को लेकर फरवरी 2026 में संसद में तीखी बहस हुई। राहुल गांधी ने अप्रकाशित संस्मरण के विवरणों का हवाला देते हुए आरोप लगाया था कि 2020 के चीन संकट के दौरान सैन्य नेतृत्व को राजनीतिक निर्देशों का इंतजार करना पड़ा। विवाद का केंद्र वह जवाब बना जिसे राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री की ओर से सेना प्रमुख को दिया गया निर्देश बताया जो उचित समझो, वो करो। इस प्रकरण ने एक बड़ा राजनीतिक प्रश्न खड़ा किया जब सीमा पर गंभीर सैन्य संकट पैदा होता है तो राजनीतिक नेतृत्व और सैन्य कमान के बीच निर्णय लेने की प्रक्रिया कैसी होनी चाहिए।

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