आदिवासी एकता का महासम्मेलन, चैतर वसावा ने भरी हुंकार, अस्तित्व और अधिकार की लड़ाई तेज
मध्यप्रदेश के बुरहानपुर जिले के नेपानगर क्षेत्र के चैनपुरा गांव में आयोजित आदिवासी एकता परिषद के 33वें आदिवासी सांस्कृतिक एकता...

4पीएम न्यूज नेटवर्कः मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले के नेपानगर तहसील में स्थित चैनपुरा गांव में 13 से 15 जनवरी 2026 तक.. आदिवासी एकता परिषद द्वारा आयोजित 33वां आदिवासी सांस्कृतिक एकता महासम्मेलन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ.. इस महासम्मेलन में आम आदमी पार्टी के फायर ब्रांड नेता.. और गुजरात विधानसभा के युवा सदस्य चैतर वसावा को मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया था.. और उन्होंने महासम्मेलन को संबोधित करते हुए आदिवासी समाज की एकता.. अधिकारों, संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण पर जोरदार बातें रखी.. यह महासम्मेलन न केवल एक सांस्कृतिक आयोजन था.. बल्कि आदिवासी समाज के अस्तित्व, अस्मिता और अधिकारों की रक्षा के लिए एक वैचारिक आंदोलन का प्रतीक बना..
आदिवासी एकता परिषद की स्थापना 1992 में हुई थी.. पिछले 33 वर्षों से यह संगठन मानव मूल्यों की रक्षा, मानव मुक्ति, प्रकृति मुक्ति, आदिवासी अस्तित्व, अस्मिता, पहचान, अधिकार, इतिहास.. और संस्कृति के संरक्षण के लिए निरंतर प्रयासरत है.. परिषद का मुख्य उद्देश्य जैव विविधता और पर्यावरण को बचाना है.. जो समग्र सृष्टि की रक्षा से जुड़ा हुआ है.. इस संगठन ने आदिवासी समाज में जागरूकता फैलाने.. और उन्हें संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.. परिषद के प्रयासों से बोया गया बीज आज एक मजबूत वृक्ष बन चुका है.. जिसकी जड़ें इतनी गहरी हैं कि इसे कोई हिला नहीं सकता..
इस महासम्मेलन का आयोजन चैनपुरा गांव में किया गया.. जो नेपानगर से कुछ दूरी पर स्थित है.. तीन दिनों तक चले इस कार्यक्रम में मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान.. और अन्य राज्यों से हजारों आदिवासी प्रतिनिधि शामिल हुए.. अनुमान के अनुसार, लगभग 2 लाख से अधिक लोग इस आयोजन में भाग लेने पहुंचे.. महासम्मेलन का उद्घाटन 13 जनवरी को पारंपरिक आदिवासी नृत्य और गीतों के साथ हुआ.. इसमें आदिवासी समाज की महिलाएं, युवा और बुजुर्ग सभी ने उत्साहपूर्वक भाग लिया.. आयोजन स्थल पर बड़े-बड़े तंबू लगाए गए थे.. जहां सांस्कृतिक प्रदर्शन, चर्चाएं और भाषण आयोजित किए गए..
महासम्मेलन के पहले दिन, 13 जनवरी को विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए.. आदिवासी नृत्य, लोकगीत और नाटक के माध्यम से समाज की समृद्ध विरासत को प्रदर्शित किया गया.. इन कार्यक्रमों में आदिवासी समाज की पारंपरिक वेशभूषा, जैसे रंग-बिरंगे पगड़ी, साड़ियां और गहने पहने हुए कलाकारों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया.. यह आयोजन केवल मनोरंजन नहीं था.. बल्कि आने वाली पीढ़ियों को अपनी संस्कृति से जोड़ने का माध्यम बना.. आयोजकों ने बताया कि ऐसे कार्यक्रमों से आदिवासी युवा अपनी जड़ों से जुड़ते हैं.. और अपनी पहचान को मजबूत बनाते हैं..
दूसरे दिन, 14 जनवरी को महासम्मेलन में कई प्रमुख वक्ताओं ने अपनी बात रखी.. इनमें दादा का भाषण विशेष रूप से उल्लेखनीय था.. उन्होंने आदिवासी समाज की चुनौतियों पर प्रकाश डाला और कहा कि हमें अपनी संस्कृति और अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट होना चाहिए.. दादा ने अपने भाषण में आदिवासी इतिहास का जिक्र किया.. और बताया कि कैसे पुरखों ने संघर्ष किया.. और उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे शिक्षा और जागरूकता के माध्यम से समाज को आगे बढ़ाएं.. उनका भाषण प्रेरणादायक था.. और दर्शकों ने तालियों से स्वागत किया..
महासम्मेलन का मुख्य आकर्षण तीसरे दिन.. 15 जनवरी को चैतर वसावा का संबोधन था.. वसावा, जो गुजरात की डेडियापाडा विधानसभा से AAP के विधायक हैं.. उन्होंने आदिवासी समाज की समस्याओं पर खुलकर बात की.. और उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों जैसे गुरु भुवनजी, दलवाड़ा के क्रांति या रूप सिंह नायक ने सपना देखा था कि आदिवासी समाज को स्वतंत्रता मिलेगी.. और वे आत्मनिर्भर बनेंगे.. लेकिन देश की आजादी के बाद भी आदिवासी समाज को सच्ची स्वतंत्रता नहीं मिली.. और उन्होंने आरोप लगाया कि सत्ता में आए लोगों ने आदिवासी भूमि.. और संसाधनों पर कब्जा किया, जिससे समाज पिछड़ गया..
वसावा ने अपने भाषण में कहा कि आज भी आदिवासी समाज बेघर और बेरोजगार है.. हमारे जंगल, जमीन और जल पर दूसरे लोगों का कब्जा है.. हमें अपनी आवाज बुलंद करनी होगी और अपनी स्वतंत्रता वापस लेनी होगी.. उन्होंने आदिवासी समाज से अपील की कि वे संगठित हो.. और सरकार से अपने अधिकार मांगें.. वसावा ने पर्यावरण संरक्षण पर भी जोर दिया.. और कहा कि आदिवासी समाज प्रकृति का रक्षक है.. उनके भाषण से दर्शक उत्साहित हुए और “जय आदिवासी” के नारे गूंज उठे..
इस महासम्मेलन में अन्य प्रमुख वक्ताओं में मध्य प्रदेश के पूर्व मंत्री उमंग सिंघार, विधायक विक्रांत भूरिया और अन्य आदिवासी नेता शामिल थे.. उमंग सिंघार ने आदिवासी धर्म कोड की मांग उठाई.. और कहा कि आदिवासी समाज को अपनी अलग पहचान मिलनी चाहिए.. विक्रांत भूरिया ने संस्कृति संरक्षण पर जोर दिया और कहा कि हमें अपनी परंपराओं को बचाना है.. इन भाषणों से महासम्मेलन में एकता का संदेश मजबूत हुआ..
आदिवासी एकता परिषद का इतिहास गौरवपूर्ण है.. 1992 में स्थापित यह संगठन शुरुआत में छोटे स्तर पर काम करता था.. लेकिन आज यह एक बड़ा वैचारिक आंदोलन बन चुका है.. परिषद ने आदिवासी समाज में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के लिए कई अभियान चलाए हैं.. यह संगठन गांधीवादी सिद्धांतों पर आधारित है.. और अहिंसक तरीके से संघर्ष करता है.. परिषद के संस्थापक और कार्यकर्ताओं ने आदिवासी अधिकारों के लिए कई पदयात्राएं.. और आंदोलन किए हैं.. 1990 के दशक में परिषद ने भूमि अधिकारों के लिए संघर्ष किया.. जिससे हजारों आदिवासी परिवारों को जमीन मिली..
आपको बता दें कि परिषद की गतिविधियां मुख्य रूप से भूमि, जंगल.. और जल अधिकारों पर केंद्रित हैं.. यह संगठन आदिवासी समाज को संगठित करके सरकार से नीतियां बदलवाने में सफल रहा है.. 2012 में परिषद ने जन सत्याग्रह अभियान चलाया.. जिसमें हजारों लोग दिल्ली तक पदयात्रा करके पहुंचे.. इस अभियान से भूमि सुधार कानून में बदलाव हुए.. परिषद ने आदिवासी महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए भी कार्यक्रम चलाए हैं.. आज परिषद 12 राज्यों में सक्रिय है.. और लाखों सदस्यों का समर्थन प्राप्त है..
इस महासम्मेलन का महत्व इसलिए भी अधिक है.. क्योंकि आदिवासी समाज आज कई चुनौतियों का सामना कर रहा है.. विस्थापन, भूमि अधिग्रहण और पर्यावरण क्षरण जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं.. महासम्मेलन में इन मुद्दों पर चर्चा हुई.. और समाधान के लिए प्रस्ताव पारित किए गए.. आयोजकों ने मांग की कि सरकार आदिवासी क्षेत्रों में विकास कार्यों को प्राथमिकता दे.. और उनकी संस्कृति का सम्मान करे.. महासम्मेलन में जल-जंगल-जमीन की रक्षा पर विशेष जोर दिया गया..



