ट्रंप की हार के बाद बीजेपी सरकार पर उठे सवाल, जाएगी मोदी की कुर्सी
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने टोपी के पहले ट्रुथ सोशल पर एक लाल बेसबॉल टोपी की तस्वीर शेयर की थी, जिस पर VETO लिखा था.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: मोदी के माय फ्रेंड डोनाल्ड ट्रम्प दिनों करारी हार का स्वाद चख रहे हैं। वहीं आपको बता दें कि ट्रम्प को मिली इस हार की चर्चा न सिर्फ अमेरिका बल्कि अन्य देशों में भी हो रही है। खासकर भारत में हो रही है। क्योंकि चुनाव में मिली हार की गूंज भारत में जोर-शोर से सिनाई दे रही है।
बीजेपी मंडली इसका बचाव कर रही है वहीं विपक्ष का यह कहना है कि ट्रम्प के बाद अब मोदी को हार का मजा चखाना है। अमेरिका का तो पता नहीं पर लोगों का ऐसा मानना है कि भारत में साहब के सत्ता की जान EVM,SIR और वोट चोरी जैसे तोते में है। खैर बात करें अगर अमेरिका की तो आपको बता दें कि तो मिडटर्म चुनाव में मिली हार के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पूरी तरह से बौखला गए हैं। और अब वो वीटो की बता करने लगे हैं।
उन्होंने चिरपरिचित अंदाज में रिजोल्यूट डेस्क पर एक बड़ी लाल टोपी रखी, जिस पर VETO लिखा हुआ था. यह टोपी तब सामने आई, जब ट्रंप पत्रकारों से बात कर रहे थे. उस समय वे एक आदेश पर साइन कर रहे थे. ओवल ऑफिस में ब्रीफिंग के दौरान डेस्क पर लाल टोपी रखने को मतलब ये है कि ट्रंप डेमोक्रेट्स के विधायी एजेंडे का मुकाबला करने के लिए अपने संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करने को तैयार हैं. 3 नवंबर के मिडटर्म चुनावों में जीत के बाद, डेमोक्रेट्स के पास अब अधिक शक्तियां आ गई हैं.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने टोपी के पहले ट्रुथ सोशल पर एक लाल बेसबॉल टोपी की तस्वीर शेयर की थी, जिस पर VETO लिखा था. इसके बाद उन्होंने फॉक्स न्यूज को बताया कि राष्ट्रपति का वीटो अधिकार अमेरिकी राष्ट्रपति के पास मौजूद सबसे शक्तिशाली अधिकारों में से एक है. ट्रंप ने कहा कि जैसा कि आप जानते हैं, ऐसा पहले भी कई बार हो चुका है. यह वीटो की शक्ति है. यह राष्ट्रपति के पास मौजूद सबसे मजबूत अधिकारों में से एक है. डेमोक्रेट्स अगर कोई बेतुका सा फैसला करेंगे तो मैं उन पर वीटो लगा दूंगा.
डेमोक्रेट्स की जीत ने अमेरिका में सत्ता के संतुलन को काफी बदल दिया है, क्योंकि पार्टी ने हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट दोनों पर कंट्रोल हासिल कर लिया है. इस बदलाव से उम्मीद है कि कांग्रेस अब जांच, सुनवाई और समन के जरिए ट्रंप प्रशासन की कड़ी निगरानी करेगी. साथ ही, डेमोक्रेट्स उनके न्यायिक और कैबिनेट नामांकनों को रोकने की कोशिश भी कर सकते हैं.
जैसा की हमने पहले ही आपको बताया कि डेमोक्रेटिक पार्टी को हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट दोनों ही जगहों पर बहुमत मिल गया है. ऐसे में राष्ट्रपति ट्रंप के खिलाफ महाभियोग लाने की चर्चा भी शुरू हो गई है. इस साल की शुरुआत में ट्रंप ने ये कहा भी था कि अगर हम मिडटर्म चुनाव नहीं जीतते हैं, तो वो यानी डेमोक्रेट्स मुझे महाभियोग के जरिए पद से हटाने का कोई न कोई बहाना ढूंढ लेंगे. अब सवाल उठता है कि क्या ऐसा हो सकता है, क्या तीसरी बार भी ट्रंप के खिलाफ महाभियोग चलाया जा सकता है? पहले भी राष्ट्रपति ट्रंप के खिलाफ दो बार महाभियोग का प्रस्ताव लाया जा चुका है.
हालांकि दोनों ही बार वह आरोपों से बरी हो गए थे. पहली बार साल 2019 में ट्रंप के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव लाया गया था. हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने महाभियोग के दो आरोपों को मंजूरी दी थी. ट्रंप पर पहला आरोप सत्ता के दुरुपयोग का लगा था, जिसमें कहा गया था कि उन्होंने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की जांच करने के लिए यूक्रेन से मदद मांगी थी.
वहीं अगर बात की जाए अमेरिका में महाभियोग की प्रक्रिया के बारे में तो आपको बगता दें कि अमेरिका का संविधान हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स को महाभियोग यानी इंपीचमेंट की पावर देता है, जिसका मतलब है कि लोअर हाउस जीतने वाली पार्टी को क्रॉस-पार्टी सपोर्ट की जरूरत के बिना इंपीचमेंट की कोशिश शुरू करने की इजाजत मिल जाती है. इंपीचमेंट की कोशिश हाउस कमेटी, जो अक्सर ज्यूडिशियरी कमेटी होती है, राष्ट्रपति के गलत काम के आरोप में जांच से शुरू करती है. यह कमेटी गवाहों को समन भेज सकती है, जिसमें शायद खुद राष्ट्रपति भी शामिल हो सकते हैं.
अमेरिका के संविधान में महाभियोग के लिए तीन कैटेगरी तय की गई है, देशद्रोह, रिश्वत और ‘बड़े अपराध और गलत काम’. अगर कोई कमेटी यह तय करती है कि इसके लिए काफी आधार हैं, तो वह पूरे सदन में विचार के लिए इंपीचमेंट के फॉर्मल आर्टिकल का ड्राफ्ट बनाती है. दरअसल, महाभियोग के लिए हाउस में किसी भी एक आर्टिकल पर सिंपल मेजॉरिटी वोट की जरूरत होती है. अगर मंजूरी मिल जाती है, तो राष्ट्रपति पर फॉर्मली इंपीचमेंट लगाया जाता है और फिर मामला ट्रायल के लिए सीनेट में जाता है.
वहीं आपको बता दें कि चुनावी नतीजों के सामने आने के बाद अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भी कहीं न कहीं ट्रम्प से दूरी बनाते हुए नजर आ रहे हैं। तभी तो उन्होंने मिडटर्म चुनाव में अपनी पार्टी की हार के लिए सीधे तौर पर ईरान युद्ध को ज़िम्मेदार ठहराया. उनके इस बयान को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से दूरी बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.
ऐसे में माना जा रहा है कि वेंस 2028 के राष्ट्रपति चुनाव में उतरने की तैयारी कर सकते हैं. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर क़रीब 600 शब्दों के एक बेहद नपे-तुले बयान में उपराष्ट्रपति ने स्वीकार किया कि 2024 में ट्रंप को वोट देने वाले मतदाताओं ने मिडटर्म चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी का साथ छोड़ दिया. उन्होंने लिखा, “हमारी हार की वजह युद्ध है.
महाभियोग जब आएगा तब देखा जाएगा लेकिन अभी के मौजूदा माहौल की अगर बात की जाए तो दोस्तों आपको बता दें कि अमेरिकी चुनावी नतीजों के सामने आने के बाद भारत का सियासी पारा गर्म है और लगातार मोदी पर प्रहार किया जा रहा है।
इसी कड़ी में मध्यावधि चुनाव में सत्तारूढ़ रिपब्लिकन पार्टी की हार को कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने अमेरिकी लोकतंत्र के लिए असाधारण और ऐतिहासिक बताया है. उन्होंने कहा कि चुनाव में प्रतिनिधि सभा और सीनेट दोनों में बहुमत गंवाने के बावजूद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप विदेश नीति के मामलों में पहले की तरह फैसले लेने के लिए स्वतंत्र रहेंगे. हालांकि, उन्होंने उम्मीद जताई कि चुनाव परिणामों से अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों के खिलाफ नस्लभेदी माहौल में कमी आएगी.
थरूर ने कहा कि अमेरिकी चुनाव के नतीजों से भारत-अमेरिका संबंधों में बड़े बदलाव की उम्मीद करना सही नहीं है. अमेरिकी संविधान राष्ट्रपति को विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों में व्यापक अधिकार देता है. कांग्रेस यानी अमेरिकी संसद बजट और सरकारी खर्च को नियंत्रित कर सकती है.
राष्ट्रपति किसी प्रस्ताव पर वीटो लगा सकते हैं, लेकिन संसद निर्धारित प्रक्रिया के तहत इसे खारिज भी कर सकती है. उन्होंने कहा कि बड़े सैन्य अभियान में होने वाले खर्च को संसद सीमित या नियंत्रित कर सकती है. हालांकि, विदेश नीति के दूसरे मामलों में राष्ट्रपति को काफी स्वतंत्रता है. किसी सैन्य कार्रवाई के शुरुआती 60 दिनों तक उन्हें कांग्रेस की मंजूरी की जरूरत भी नहीं होती. ऐसे में रूस से तेल खरीद पर टैरिफ और प्रतिबंध, ईरान युद्ध या यूक्रेन को लेकर ट्रंप की नीतियों पर मध्यावधि चुनाव का सीधा असर नहीं पड़ेगा.
साथ ही थरूर ने कहा कि दोनों सदनों में बहुमत गंवाने के बाद ट्रंप अब ‘लेम डक प्रेसिडेंट’ की स्थिति में आ गए हैं. इसका अर्थ है कि उनके लिए नए कानून पारित कराना मुश्किल होगा. अमेरिका में राजदूतों की नियुक्ति के लिए सीनेट की मंजूरी जरूरी होती है. सीनेट में डेमोक्रेट्स के नियंत्रण के कारण ट्रंप की पसंद के राजदूतों की नियुक्तियों में भी बाधा आ सकती है.
हालांकि, विदेश नीति के मामलों में उनके अधिकार बने रहेंगे. इसलिए भारत को उसी ट्रंप प्रशासन के साथ काम करना होगा, जिसके साथ वह पहले से बातचीत करता रहा है. इसके साथ ही एसआईआर के दौरान फॉर्म-6 को घोषणा पत्र से अलग करने के फैसले पर थरूर ने चुनाव आयोग की आलोचना की. उन्होंने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में कई प्रशासनिक और प्रक्रियागत गड़बड़ियां हुईं.
कुछ फैसलों पर आयोग के दो अन्य चुनाव आयुक्तों ने भी आपत्ति जताई थी. उनके मुताबिक, फॉर्म-6 में नया घोषणा पत्र जोड़ना नियमों और कानूनों के अनुरूप नहीं था. थरूर ने आरोप लगाया कि फॉर्म-7 के हजारों आवेदन एक साथ भरने की अनुमति दी गई. पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों में इनके आधार पर बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए गए और केवल संदेह के आधार पर लोगों को मतदान के अधिकार से वंचित किया गया.
इसी के साथ कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने अमेरिका के मध्यावधि चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को मतदाताओं से मिले झटके को नॉकडाउन पंच बताया. 3 नवंबर को हुए चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी ने प्रतिनिधि सभा और सीनेट, दोनों में बहुमत हासिल कर लिया है. इससे ट्रंप के लिए अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाना मुश्किल हो सकता है. चुनाव में महंगाई, बढ़ती जीवनयापन लागत, टैरिफ नीतियों और ईरान युद्ध को लेकर मतदाताओं की नाराजगी प्रमुख मुद्दे रहे.
तिवारी ने इस नतीजे को इजरायल और अमेरिका की ओर से ईरान के खिलाफ जारी आक्रामकता पर संभावित रोक से भी जोड़ा है. कांग्रेस नेता ने ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा की जीत को दक्षिण अमेरिका में दक्षिणपंथी राजनीति के बढ़ते प्रभाव को रोकने की दिशा में अहम बताया. ब्राजील के 25 अक्टूबर को हुए दूसरे दौर के चुनाव में लूला दोबारा राष्ट्रपति चुने गए.
इसके साथ ही तिवारी ने रूस-यूक्रेन युद्ध के लंबे समय से जारी गतिरोध और यूरोप में गुस्से तथा विरोध प्रदर्शनों का जिक्र किया. उन्होंने भारत की स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि देश आंतरिक राजनीतिक संघर्ष में उलझा हुआ है. वहीं, चीन पर उन्होंने कहा कि वह धीरे-धीरे अपनी क्षमता और ताकत बढ़ा रहा है. वहीं इस मामले पर वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने रिएक्शन दिया है. उन्होंने एक्स पर लिखा कि अमेरिका के मिडटर्म चुनावों से भारत के लिए कई सबक मिलते हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी मोदी की तरह मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैला रहे थे. वे प्रवासियों के मुद्दे का डर दिखा रहे थे. अमेरिकी मतदाताओं ने इसे पूरी तरह से खारिज कर दिया है.
प्रशांत भूषण ने आगे लिखा कि पीएम मोदी की तरह ट्रंप भी नेतन्याहू के बहुत करीब थे. जनता ने ट्रंप और नेतन्याहू, दोनों को ही नकार दिया है. मोदी की तरह ट्रंप भी झूठ और दुष्प्रचार के सहारे चल रहे थे. इसे भी हार का सामना करना पड़ा है. अब हालात फिर से उसी मोड़ पर आ गए हैं. अब मोदी की बारी है. चुनाव भले ही अमेरिका में हुए हों हार भले ही ट्रम्प की हुई हो लेकिन लोग जिक्र मोदी का भी कर रहे हैं। मौजूदा मोदी सरकार पर सवाल खड़े कर रहे हैं साथ ही मोदी सरकार को और इस नफरती राजनीति को जड़ से उखाड़ फेंकने की बात कर रहे हैं।



