शंकराचार्य-योगी विवाद ने लिया संवैधानिक मोड़, गणतंत्र दिवस पर सीएम का पलटवार, डिप्टी सीएम ने संभाला मोर्चा
प्रयागराज की पावन धरती, जहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम होता है लेकिन मौजूदा समय में तीर्थ क्षेत्र एक ऐसी वैचारिक जंग का गवाह बन रहा है जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: प्रयागराज की पावन धरती, जहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम होता है लेकिन मौजूदा समय में तीर्थ क्षेत्र एक ऐसी वैचारिक जंग का गवाह बन रहा है जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। एक तरफ हैं सनातनी परंपरा के रक्षक, ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती हैं, और दूसरी तरफ हैं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ।
वैसे तो दोनों के बीच रिश्ता तो संत और संत का होना चाहिए था, लेकिन आज बात संविधान, अधिकारों और प्रोटोकॉल तक आ पहुँची है। गणतंत्र दिवस के मौके पर जब पूरा देश तिरंगे को सलाम कर रहा था, तब यूपी के सियासी और धार्मिक गलियारों में एक नई बहस छिड़ गई। क्या कालिनेम वाले प्रकरण के बाद एक बार फिर से योगी आदित्यनाथ ने बिना नाम लिए शंकराचार्य पर निशाना साधा है? क्या संविधान की दुहाई देकर धर्म और राजनीति की लड़ाई लड़ी जा रही है ? और सबसे बड़ा सवाल कि क्यूं अचनाक डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने वापस गेंद सीएम योगी के पाले में डाल दी है।
प्रयागराज के कुंभ मेले में क्या कुछ शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी के साथ क्या कुछ हुआ, ये पूरे देश ने देखा है। सिर्फ इतनी सी बात पर कि वो पालकी से स्नान को जा रहे थे, उनको रोक लिया गया, उनके साथ अभ्रदता की गई। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल है कि साधु संतों की चोटी पकड़कर घसीटा जा रहा है और बटुकों के साथ मारपीट की जा रही है। हालांकि इस घटना के बाद शंकराचार्या जी खुद धरना दे रहे है और पूरे देश से रिएक्शन आ रहा है लेकिन प्रशासन मौन है और सीएम योगी शंकराचार्या जी को मनाने के बजाय उनको संविधान की सीख देते दिखाई दे रहे हैं। हालांकि सीएम योगी ने किसी का नाम नहीं लिया है लेकिन इसके बाद भी सोशल मीडिया और मीडिया में यह चर्चा है कि योगी जी का इशारा शंकराचार्या की ओर ही था।
सीएम योगी का साफ साफ कहना है कि- व्यवस्था से उपर खुद को मानना संविधान की अवमानना है। क्योंकि पिछले दिनों जब शंकराचार्य जी की ओर आरोप लगाए गए थे तो प्रयागराज प्रशासन का कहना था कि वो व्यवस्था को तोड़ रहे थे और खुद को नियमों से उपर मान रहे थे और अब जब सीएम योगी का गणतंत्र दिवस पर यही बयान आया है तो कहीं न कहीं इस पूरे मामले को शंकराचार्या जी से जोड़कर देखा जा रहा है। चार दिन पहले भी सीएम योगी ने शंकराचार्या का नाम लिए बिना कालिनेमि का जिक्र अपने एक भाषण में किया था, इसके बाद विवाद इतना बढ़ गया था कि शंकराचार्या जी के धरने की अवधि लगातार बढती ही जा रही है। अब सवाल उठता है कि आखिर शंकराचार्य नाराज क्यों हैं? विवाद की जड़ में कई मुद्दे हैं। शंकराचार्य का कहना है कि प्रशासन संतों के साथ भेदभाव कर रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की नीतियां सनातन धर्म की प्राचीन मर्यादाओं के खिलाफ जा रही हैं। बात यहाँ तक बढ़ गई कि उन्होंने महाकुंभ के शाही स्नान से दूरी बनाने तक का संकेत दे दिया।
हलांकि जब विवाद बढ़ा, तो सरकार के संकटमोचनों ने मोर्चा संभाला। उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम ने इस विवाद पर एक बेहद सधा हुआ बयान दिया। उन्होंने कहा कि शंकराचार्य जी हमारे पूज्य हैं, उनकी हर बात का सम्मान है।लेकिन साथ ही उन्होंने गेंद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पाले में डाल दी। दरअसल जब उनसे सवाल किया गया कि प्रशासन कोई कार्रवाई नहीं कर रहा है कोई पहल नहीं कर रहा है तो उनका जवाब था कि ये मामला सीएम योगी आदित्यनाथ देख रहे हैं।
डिप्टी सीएम ने संकेत दिया कि सरकार की अपनी तरफ से सारी कोशिशें जारी हैं लेकिन ऐसा कुछ प्रशाासन की ओर से कुछ होता नहीं दिख रहा है। क्योंकि एक दिन पहले ही स्वामी जी के धरना स्थल पर कुछ आराजक तत्व घुस आए थे और वो सीएम योगी का नारा लगाने लगे थे लेकिन बाद में उनको मौजूद लोगों ने किसी तरह से बाहर निकाला, इसके बाद पुलिस ने न सिर्फ सुरक्षा घेरा बढ़ाया है बल्कि खुद शंकराचार्या जी के शिष्यों डूयूटी को बढ़ा दिया है और इससे शंकराचार्या जी का धरना खत्म होने के बजाए बढ़ता ही जा रहा है।
अब सबसे बड़ी चुनौती है कि शंकराचार्य को मनाना। प्रशासन और सरकार की ओर से पूज्य शंकराचार्य से अपील की गई है कि वे अपने निर्णय पर पुनर्विचार करें और शाही स्नान में शामिल हों। सरकार की ओर से यह स्पष्ट करने की कोशिश की गई कि महाकुंभ की व्यवस्थाएं संविधान के दायरे में रहकर बनाई गई हैं ताकि करोड़ों श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके लेकिन जिस तरह से एक बहुत ही मामूली सी बात पर शंकराचार्या जी और उनके साथ के साधु संतों को अपमानित किया गया, ये अपने आप में एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। इस पूरे विवाद ने एक पुरानी बहस को फिर से जिंदा कर दिया है। क्या भारत जैसे देश में, जहाँ धर्म और संस्कृति रग-रग में बसी है, वहां प्रशासन को सिर्फ अपनी हठधर्मिता पर रहना चाहिए। या फिर परंपरा को प्राथमिकता मिलनी चाहिए?
ये सच है कि व्यवस्था संविधान से चलेगी लेकिन ये भी सच है कि तीर्थों की अपनी मर्यादा होती है जिसे नियमों से बांधा जा सकता। जब योगी कहते हैं कि संविधान सर्वाेपरि है, तो वे उन लोगों को जवाब दे रहे होते हैं जो व्यवस्था में दखल देना चाहते हैं। लेकिन जब शंकराचार्य कहते हैं कि धर्म की रक्षा के लिए परंपरा जरूरी है, तो वे सदियों पुरानी उस विरासत की बात कर रहे होते हैं जिसके आधार पर कुंभ का अस्तित्व है।
प्रयागराज में गंगा का पानी शांत बह रहा है, लेकिन सतह के नीचे हलचल तेज है। योगी आदित्यनाथ और शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के बीच का यह टकराव सिर्फ दो व्यक्तियों की लड़ाई नहीं है। यह आधुनिक शासन और प्राचीन परंपरा के बीच का संवाद है। क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आगे बढ़कर शंकराचार्य का आशीर्वाद लेंगे और विवाद को खत्म करेंगे? या फिर संविधान की दुहाई देकर परंपराओं को नए ढांचे में ढालने की कोशिश जारी रहेगी? महाकुंभ का अगला शाही स्नान ही इस सवाल का जवाब देगा। करोड़ों श्रद्धालुओं की उम्मीद है कि संगम के तट पर नफरत या अहंकार नहीं, बल्कि केवल विश्वास की धारा बहे।



