UPSC में OBC क्रीमी लेयर को लेकर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, केंद्र की याचिका खारिज
UPSC सिविल सेवा परीक्षा और OBC आरक्षण से जुड़े क्रीमी लेयर के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में चल रही कानूनी बहस के बीच एक महत्वपूर्ण फैसला सामने आया है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: UPSC सिविल सेवा परीक्षा और OBC आरक्षण से जुड़े क्रीमी लेयर के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में चल रही कानूनी बहस के बीच एक महत्वपूर्ण फैसला सामने आया है।
सुप्रीम कोर्ट ने 6 नवंबर 2026 को केंद्र सरकार की याचिका पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए OBC क्रीमी लेयर से संबंधित 11 मार्च 2026 के फैसले के लागू होने की सीमा तय कर दी है।
इस मामले का सीधा संबंध उन अभ्यर्थियों से है, जो UPSC सिविल सेवा परीक्षा में OBC नॉन-क्रीमी लेयर (OBC-NCL) श्रेणी के तहत आरक्षण का लाभ प्राप्त करना चाहते हैं। अदालत के फैसले से यह स्पष्ट हुआ है कि माता-पिता की सैलरी को अकेले आधार बनाकर किसी अभ्यर्थी को क्रीमी लेयर में शामिल नहीं किया जा सकता।
क्या है सुप्रीम कोर्ट का पूरा फैसला?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि 11 मार्च 2026 को दिए गए उसके फैसले के आधार पर पहले से पूरी हो चुकी नियुक्तियों को दोबारा नहीं खोला जाएगा। हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि यह फैसला UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2025 की सेवा आवंटन प्रक्रिया पर लागू होगा, क्योंकि फैसला आने के समय यह प्रक्रिया पूरी नहीं हुई थी।
इससे पहले केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर अनुरोध किया था कि मार्च में दिए गए फैसले को पिछली नियुक्तियों और चयन प्रक्रियाओं पर लागू न किया जाए। सरकार का तर्क था कि ऐसा करने से प्रशासनिक समस्याएं पैदा हो सकती हैं और पहले से पूरी हो चुकी नियुक्तियों, कैडर आवंटन तथा वरिष्ठता पर असर पड़ सकता है।
क्या था OBC क्रीमी लेयर का पूरा विवाद?
OBC आरक्षण व्यवस्था में क्रीमी लेयर का प्रावधान उन अपेक्षाकृत संपन्न और सामाजिक रूप से आगे बढ़े वर्गों को आरक्षण के लाभ से बाहर रखने के लिए किया गया है, जो निर्धारित मानदंडों के अंतर्गत आते हैं।
इस विवाद का मुख्य मुद्दा उन अभ्यर्थियों से जुड़ा था जिनके माता-पिता सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) या निजी कंपनियों में नौकरी करते हैं।
कई अभ्यर्थियों का कहना था कि उनके माता-पिता की सैलरी को आधार बनाकर उन्हें OBC नॉन-क्रीमी लेयर के लाभ से वंचित किया जा रहा है, जबकि सरकारी कर्मचारियों के बच्चों के मामले में पद और सेवा श्रेणी जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखा जाता है।
इसी आधार पर सवाल उठाया गया कि क्या PSU और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चों के लिए अलग मानदंड अपनाना समानता के सिद्धांत के अनुरूप है?
11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 को अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा था कि OBC क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल माता-पिता की सैलरी के आधार पर नहीं किया जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया था कि PSU और निजी क्षेत्र में कार्यरत माता-पिता के बच्चों को केवल उनके वेतन के आधार पर आरक्षण से बाहर करना उचित नहीं है। इसके लिए माता-पिता के पद और अन्य लागू मानदंडों पर भी विचार करना आवश्यक है।
अदालत ने यह भी माना कि समान परिस्थितियों में रहने वाले अभ्यर्थियों के साथ अलग-अलग व्यवहार करना समानता के संवैधानिक सिद्धांत के विपरीत हो सकता है।
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में क्या मांग रखी थी?
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया था कि मार्च 2026 के फैसले को पिछली नियुक्तियों और पहले से पूरी हो चुकी चयन प्रक्रियाओं पर पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू न किया जाए।
सरकार ने यह भी कहा था कि PSU और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के पदों की सरकारी पदों के साथ समानता निर्धारित करने के लिए एक व्यवस्थित व्यवस्था तैयार करने में समय की आवश्यकता है।
इसके अतिरिक्त, सरकार ने UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2025 के तहत चयनित 958 अभ्यर्थियों की सेवा आवंटन प्रक्रिया को लेकर भी निर्देश मांगे थे।
UPSC अभ्यर्थियों पर क्या पड़ेगा असर?
इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू UPSC CSE 2025 की सेवा आवंटन प्रक्रिया से जुड़ा है।
पहले से पूरी हो चुकी नियुक्तियों को केवल इस फैसले के आधार पर दोबारा नहीं खोला जाएगा।
UPSC CSE 2025 की लंबित सेवा आवंटन प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट का 11 मार्च वाला फैसला लागू होगा।
OBC क्रीमी लेयर निर्धारित करने में केवल माता-पिता की सैलरी को एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता।
PSU और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के पदों की समानता तथा अन्य निर्धारित मानदंडों पर विचार करना महत्वपूर्ण होगा।
OBC अभ्यर्थियों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
UPSC जैसी प्रतिष्ठित परीक्षाओं में आरक्षण और पात्रता से जुड़े नियम अभ्यर्थियों के भविष्य पर सीधा प्रभाव डालते हैं। ऐसे में क्रीमी लेयर निर्धारित करने के मानदंडों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला महत्वपूर्ण है।
विशेष रूप से उन अभ्यर्थियों के लिए यह मामला अहम है, जिनके माता-पिता PSU या निजी क्षेत्र में कार्यरत हैं और जिनकी OBC नॉन-क्रीमी लेयर स्थिति को लेकर विवाद रहा है।
हालांकि, इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक OBC अभ्यर्थी को स्वतः नॉन-क्रीमी लेयर का लाभ मिल जाएगा। इसके लिए संबंधित नियमों और पात्रता की शर्तों का पूरा होना आवश्यक है।



