सुशासन का टैग, नहीं सुनाई देती नाबालिगों की चीख!

योगी के यूपी से रेखा गुप्ता की दिल्ली तक सवाल दर सवाल

रेप दर रेप से सहम उठा दिल्ली से जमुई तक का इलाका

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। सुशासन का टैग चमक रहा हो और उसी टैग के नीचे किसी छह साल की बच्ची की चीख दब जाए तो सवाल उठेगा ही। अगर राजधानी दिल्ली में मंदिर से दर्शन करके निकली 17 साल की किशोरी को कुछ लोग खुद को पुलिसकर्मी बताकर दुष्कर्म करें तो सवाल सिर्फ उन आरोपियों से नहीं होगा बल्कि सवाल उस सुरक्षा व्यवस्था से भी होगा जिसके भरोसे राजधानी की सडक़ें और सार्वजनिक जगहें छोड़ी जाती हैं।
दिल्ली के कालकाजी मंदिर के पास आस्था कुंज पार्क में सामने आयी घटना में पुलिस के मुताबिक तीन लोगों ने खुद को पुलिसकर्मी बताया किशोरी और उसके दोस्त को धमकाया और फिर उसके साथ दुष्कर्म किया। मामले में एक आरोपी आसिफ को पुलिस ने मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार करने की बात कही है जबकि दो अन्य की तलाश जारी है।

 

योगी के राज में बलात्कार

वहीं उत्तर प्रदेश के सीतापुर की तस्वीर देखिए यहां छह साल की मासूम के साथ दुष्कर्म का मामला सामने आया है। पुलिस के मुताबिक बच्ची को बहला फुसलाकर गन्नेे के खेत में ले जाया गया और उसके साथ रेप हुआ। घटना के बाद मुकदमा दर्ज हुआ टीमें बनीं और पुलिस ने आरोपी अवधराम उर्फ भोलेशंकर को मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार करने में कामयाबी हासिल की। दोनों घटनाओं का भूगोल अलग है एक देश की राजधानी में दूसरी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाके में घटित घटना है। एक पीडि़ता 17 साल की है तो दूसरी महज छह साल की एक मामले में आरोपियों ने पुलिस होने का झूठा दावा करके भरोसे को हथियार बनाया दूसरे में बच्ची को बहला फुसलाकर खेत तक ले जाया गया। दोनों घटनाएं एक ही सवाल को सामने खड़ा कर रही है कि आखिरकार बच्चियों की सुरक्षा आखिर किसके भरोसे है?

यूपी में गन्ने के खेत बने सुरक्षित पनागाह

दिल्ली हो या फिर यूपी दोनों जगह बीजेपी की सरकारें हैं और महिला सुरक्षा के बड़े बड़े दावे राजनीतिक मंचों से किये गये लेकिन बेटियों की इस्तमत बचाने में अभी तक सभी सरकारे विफल रही। ?चलती बस में बालत्कार के बाद कड़े कानून बने आरोपियों को फांसी के फंदे तक पहुचाने की सभी सीढिय़ां दुरूस्त की गयी। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि अपराधियों को अभी भी इस प्रकार की घटनाओं को अंजाम देने में खौफ नहीं हो रहा। बताइये खुद को पुलिस बता कर रेप किया जाना कोई मामूली घटना नही होतीं वही यूपी में गन्नेे के खेत नाबालिगों के रेप की सुरक्षित पनागाह लंबे अरसे से बने हुए है। एक दो नहीं न जाने कितने रेप गन्नेे के खेतों में हो चुके हैंं कुछ प्रकाश में आते हैं और कुछ वहीं खेतों में दब जाते हैं। लेकिन सीतापुर की ताजा वारदार वास्तव में दिल दहला देने वाली है। वह भी तब जब यूपी में चुनावी बिगुल बज चुका हो और सावर्जनिक मंचों से महिला सुरक्षा पर बड़े बड़े दावे किये जा रहे हो। दिल्ली में हो या लखनऊ में, चुनावी राजनीति में कानून-व्यवस्था और महिलाओं की सुरक्षा हमेशा बड़े दावों का हिस्सा रही है। सरकारें अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई तेज पुलिस कार्रवाई और कानून का राज अपनी उपलब्धियों में गिनाती हैं। लेकिन किसी सरकार के लिए असली परीक्षा प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताए गए एनकाउंटर से पहले शुरू होती है।

सुशासन मतलब महिलाएं सुरक्षित घर लौंटे

दिल्ली में एक आरोपी की गिरफ्तारी और बाकी दो की तलाश जारी और यूपी में अपराधी को लंगड़ा कर गिरफ्तार किया जाने के बाद एक सवाल बचता है कि क्या डर अपराधी के मन में पैदा हुआ या फिर अपराध होने के बाद पुलिस सक्रिय हुई यही वह जगह है जहां सुशासन शब्द सिर्फ राजनीतिक नारा नहीं रह जाता वह एक कसौटी बन जाता है। क्योंकि किसी बच्ची के लिए सुशासन का मतलब यह नहीं कि अपराध के बाद आरोपी को पकड़ लिया गया। उसके लिए सुशासन का पहला मतलब है वह सुरक्षित घर से निकले सुरक्षित लौटे और रास्ते में उसे किसी वर्दी किसी दबंगई या किसी सुनसान जगह से डरना न पड़े। और यही वजह है कि दिल्ली और सीतापुर की यह दोनों घटनाएं अलग अलग एफआईआर होते हुए भी एक बड़े सवाल में बदल जाती हैं।

दिल्ली में सवाल सिर्फ रेप का नहीं

कालकाजी मंदिर कोई सामान्य सुनसान इलाका नहीं है। यह दिल्ली का प्रमुख धार्मिक स्थल है आसपास भीड़ रहती है और मंदिर तथा इस्कॉन मंदिर के आसपास लोगों की आवाजाही रहती है। इसके बावजूद पास के पार्क में किशोरी के साथ गैंगरेप की घटना सामने आना बड़े सवाल पैदा करती है मीडिया और जानकारों ने इस घटना को सुरक्षा व्यवस्था के लिहाज से गंभीर सवालों से जोड़ा है। किसी अपराधी द्वारा पुलिसकर्मी होने का दावा करना केवल पीडि़त को डराने की कोशिश नहीं है। इससे पुलिस की संस्थागत पहचान का दुरुपयोग भी होता है। अगर कोई व्यक्ति सिर्फ यह कहकर किसी किशोर या किशोरी को डरा सकता है कि वह पुलिसकर्मी है तो सवाल यह है कि आम नागरिक वास्तविक पुलिस और फर्जी पुलिस में फर्क कैसे करेगा यह सवाल खास तौर पर नाबालिगों के मामले में और गंभीर हो जाता है।

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