अंतराष्ट्रीय अखबार में छपी ट्रेड डील की सच्चाई, बंद कमरे में कैसे हुई डील?

एक तरफ जहां सरकार और गोदी मीडिया मोदी की यूएस से हुई डील को बड़ी उपलब्धि बताने में लगी है वहीं इस बीच अंतराष्ट्रीय मीडिया ने हमारे विश्वगुरु मोदी जी का बैंड बजा कर रख दिया।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: एक तरफ जहां सरकार और गोदी मीडिया मोदी की यूएस से हुई डील को बड़ी उपलब्धि बताने में लगी है वहीं इस बीच अंतराष्ट्रीय मीडिया ने हमारे विश्वगुरु मोदी जी का बैंड बजा कर रख दिया।

उसने न सिर्फ मोदी की ट्रंप से हुई डील को लेकर बड़ा खुलासा किया है बल्कि विपक्ष की आवाज को भी वर्ल्ड लेवल पर उठाया है। पिछले दिनों जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत से हुआ डाल को लेकर खुलासा किया तो मोदी जी इसे भारत की उप्लब्धी बताने में लग गए।

उनके मंत्री उन्हें डील के लिए फूलों की मालाएं पहनाने में लग गए और गोदी मीडिया इसे ट्रंप पर मोदी की जीत बताने में लग गया। लेकिन धीरे धीरे जब इस डील की परतें खुली तो सबको पता चल गया कि कौन किसके सामने सरेंडर करके आ गया है। लेकिन इसके बावजूद गोदी मीडिया कैसे भी करके इस डील को अपने साहेब की बड़ी जीत बताने पर तुला रहा। वहीं इसको लेकर जब नेता विपक्ष राहुल गांधी ने सदन में आवाज उठाई तो उनको मोशन का डर दिखाकर चुप कराने की कोशिश की गई। और गोदी मीडिया ऐसे दिखाने लगा जैसे विपक्ष देश की तरक्की से जल रहा है। लेकिन अंतराष्ट्रीय अखबार ने मोदी सरकार और गोदी मीडिया के मुंह पर कालिक पोतते हुए न सिर्फ इस डील की सच्चाई सबके सामने रखी बल्कि विपक्ष की आवाज को भी अंतराष्ट्रीय लेवल पर जगह दी। तो कैसे एक अंतराष्ट्रीय अखबार ने मोदी सरकार के नरैटिव को पलट कर रख दिया है.

जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वैक्सीन लगने से लेकर ट्रेन के उद्घाटन तक, हर चीज का क्रेडिट लेते हैं और बात बात पर राष्ट्र के नाम संदेश देने कैमरे पर चले आते हैं, वहीं यूएस से हुए डील को लेकर वो कहीं भी बात करते नजर नहीं आ रहे हैं और सवालों से बचने के लिए उन्होंने मंत्रियों को आगे कर दिया है।

बाकि का काम गोदी मीडिया संभाल रही है। लेकिन अंतराष्ट्रीय मीडिया में सच्चाई छुपाए नहीं छुप रही है। एक तरफ जहां गोदी मीडिया ये हेडलाइन चला रहा है कि झुकती है दुनिया झुकाने वाला चाहिए तो वहीं अंतराष्ट्रीय मीडिया इस डील को मोदी के लिए सिरदर्द बता रही है।  आप The New York Times की इस हेडलाइन को पढ़िए- Trump’s Trade Deal With India Has Become a Headache for Modi। न्यूयॉर्क टाइम्स ने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर नजर डाली है, इकोनॉमिस्ट एलेक्स ट्रेवेली ने इस बात का विश्लेषण किया है कि सौदे में किसे अधिक लाभ हुआ।

इसमें साफ साफ ये लिखा हुआ कि जब भारत और यूएस डील की खबर आई कि अमेरिका ने भारत पर लगा टैरिफ 50% से घटाकर 18% है किया तो लगा भारत को इससे फायदा होगा लेकिन जैसे जैसे व्हाइट हाउस से इस समझौते की डिटेल सामने आई तो पता चला कि इसमें खुशी मनाने वाली तो कोई बात नहीं थी। बल्कि व्हाइट हाउस के बयानों ने उस समझौते को मोदी के लिए सिरदर्द बना दिया। इस रिपोर्ट के मुताबिक इस तथाकथित “ऐतिहासिक” समझौते में सबसे अहम बात यह थी कि भारत ने अगले पांच वर्षों में 500 अरब डॉलर मूल्य के अमेरिकी सामान खरीदने की “प्रतिबद्धता” जताई थी।

 500 अरब डॉलर। ये कोई छोटी मोटी रकम नहीं है। ये कोई सामान्य व्यापार संतुलन की बात नहीं है। ये एक ऐसी प्रतिबद्धता है जो सीधे सीधे भारत की आयात नीति, ऊर्जा नीति और रणनीतिक स्वायत्तता को प्रभावित करती है।सरकार इसे “आर्थिक सुरक्षा गठबंधन” बता रही है। लेकिन सवाल ये है कि सुरक्षा किसकी? भारत की या अमेरिका की? अगर भारत अगले पांच वर्षों में 500 अरब डॉलर का अमेरिकी सामान खरीदेगा तो उसका सीधा मतलब है कि भारत को अपने आयात ढांचे को उसी हिसाब से ढालना होगा। और इसमें ऊर्जा उत्पाद भी शामिल होंगे। यानी तेल और गैस जैसे रणनीतिक संसाधन। एलेक्स ट्रेवेली ने अपनी रिपोर्ट में साफ लिखा कि शुरुआती घोषणा के बाद दोनों देशों के बयानों में विसंगतियां साफ नजर आने लगीं। ट्रंप प्रशासन ने जिस तरह से इस डील को पेश किया और भारत सरकार ने जिस तरह से इसे पेश किया, दोनों में जमीन-आसमान का फर्क दिखा।

रूस पर भारत की तेल निर्भरता में कमी की घोषणा करने के लिए बेहद उत्सुक दिखे। लेकिन भारत के आधिकारिक बयान में इसका कोई उल्लेख नहीं था। अब यहां से असली कहानी शुरू होती है। अमेरिका द्वारा जारी ‘फैक्ट शीट’ में साफ कहा गया कि भारत पर लगाया गया 25 प्रतिशत दंडात्मक टैरिफ “रूसी संघ से तेल खरीदना बंद करने की भारत की प्रतिबद्धता को ध्यान में रखते हुए” कम किया गया है। यानी साफ संकेत यह कि टैरिफ में राहत किसी सामान्य व्यापार वार्ता का नतीजा नहीं थी, बल्कि इसके पीछे एक रणनीतिक शर्त जुड़ी थी कि रूस से तेल खरीद कम करना या बंद करना। लेकिन भारत सरकार के बयान में इस बात का कोई जिक्र नहीं। क्यों? क्या सरकार देश को पूरी सच्चाई बताने से बच रही थी?

क्या इसलिए प्रधानमंत्री खुद सामने नहीं आए और मंत्रियों को आगे कर दिया गया? The New York Times की रिपोर्ट में साफ कहा गया कि भारत ने “आर्थिक सुरक्षा गठबंधन” का वादा करके इस दिशा में सबसे करीबी कदम उठाया और यह भी कहा कि अगले पांच वर्षों में भारत द्वारा खरीदे जाने वाले 500 अरब डॉलर के अमेरिकी सामानों में ऊर्जा उत्पाद शामिल होंगे। इसका सीधा मतलब है कि भारत को अमेरिकी तेल और गैस की खरीद बढ़ानी होगी। अब जरा सोचिए। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने रूस से रियायती दरों पर तेल खरीदा था। इससे भारत को आर्थिक फायदा हुआ था। पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दबाव कम हुआ था। लेकिन अगर अब भारत अमेरिकी दबाव में रूस से तेल खरीद कम करता है और अमेरिकी ऊर्जा उत्पादों की ओर मुड़ता है तो क्या वह सस्ता पड़ेगा? क्या भारत के उपभोक्ताओं को इसका खामियाजा नहीं भुगतना पड़ेगा?

यही वह सवाल है जिसे विपक्ष उठा रहा था। लेकिन संसद में जब यह मुद्दा उठा तो उसे राष्ट्रविरोधी बताने की कोशिश की गई। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने पूछा कि क्या यह डील भारत की रणनीतिक स्वायत्तता से समझौता नहीं है? क्या भारत अब अमेरिकी दबाव में अपनी ऊर्जा नीति तय करेगा? लेकिन गोदी मीडिया ने इसे ऐसे पेश किया जैसे विपक्ष कोई देश विरोधी बात कर रहा है। सरकार से मंत्रियों ने इसे महामानव की बेइज्जती मान ली। और राहुल गांधी को चुपर कराने के लिए बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने सदन में सब्सटेंटिव मोशन पेश कर दिया ताकि सदन से राहुल को कभी सरकार से सवाल पूछने का मौका ही न मिले। इसको लेकर कांग्रेस केसी वेणुगोपाल ने अपना गुस्सा भी जाहिर किया।

जो संसद में राहुल गांधी पहले ही कह चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया इस पूरे मामले को एक अलग नजरिए से देख रहा है। उसने यह सवाल उठाया कि क्या यह समझौता वास्तव में बराबरी का था या फिर अमेरिका की शर्तों पर हुआ था? ट्रंप प्रशासन के बयानों से यह स्पष्ट झलकता है कि उन्होंने इसे अपनी कूटनीतिक जीत के रूप में पेश किया। वहीं भारत में इसे “मोदी की जीत” बताकर प्रचारित किया गया। सवाल यह भी है कि 500 अरब डॉलर की खरीद की प्रतिबद्धता क्या विश्व व्यापार संगठन के नियमों के अनुरूप है? क्या यह मुक्त व्यापार की भावना के खिलाफ नहीं है? अगर भारत एक देश से तय रकम का सामान खरीदने की प्रतिबद्धता देता है तो अन्य व्यापारिक साझेदारों को क्या संदेश जाता है? इस डील के बाद भारत की ऊर्जा नीति, विदेश नीति और व्यापार नीति तीनों पर असर पड़ सकता है।

अगर भारत अमेरिकी ऊर्जा उत्पादों की खरीद बढ़ाता है तो रूस के साथ उसके संबंधों पर असर पड़ सकता है। और अगर वह रूस से दूरी बनाता है तो चीन और अन्य देशों के साथ क्षेत्रीय संतुलन पर भी असर पड़ेगा। यही वजह है कि न्यूयॉर्क टाइम्स ने इसे मोदी के लिए सिरदर्द बताया। क्योंकि घरेलू राजनीति में इसे जीत बताना आसान है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंच पर इसके रणनीतिक परिणामों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि एक ऐसे नेता की बनाई गई है जो विश्व मंच पर भारत का डंका बजा रहे हैं। लेकिन जब अंतरराष्ट्रीय अखबार यह लिखता है कि यह डील उनके लिए सिरदर्द बन गई है, तो यह छवि पर सीधा सवाल है।

गोदी मीडिया भले ही हेडलाइन चला दे कि “झुकती है दुनिया झुकाने वाला चाहिए”, लेकिन सवाल यह है कि क्या सचमुच दुनिया झुकी है या भारत को झुकना पड़ा है? अगर टैरिफ में राहत के बदले रूस से तेल खरीद कम करने की शर्त है, अगर 500 अरब डॉलर की खरीद प्रतिबद्धता है, अगर अमेरिकी फैक्ट शीट और भारतीय बयान में फर्क है, तो फिर यह सौदा बराबरी का कैसे हुआ?अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने इस पूरे मामले में विपक्ष की आवाज को भी जगह दी। उसने यह दिखाया कि भारत के अंदर भी इस डील को लेकर सवाल उठ रहे हैं। यह लोकतंत्र की खूबसूरती है कि सवाल पूछे जाते हैं। लेकिन जब सवाल पूछने वालों को ही कठघरे में खड़ा कर दिया जाए तो फिर अंतरराष्ट्रीय मंच ही वह जगह बनता है जहां सच्चाई सामने आती है।

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