ट्रंप की हार से मोदी की सत्ता को खतरा!

  • डेमोके्रट का अमेरिकन कांग्रेस पर कब्जा
  • अमेरिकन मध्यावधि चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की हार
  • ट्रंप की पार्टी अमेरिकी संसद के दोनों सदनों से बाहर
  • डेमोक्रेट्स ने सीनेट और प्रतिनिधि सभा दोनों में बहुमत हासिल कर लिया

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। ट्रंप की अकड़ पर अमेरिकी जनता ने ऐसा ब्रेक लगाया है कि व्हाइट हाउस से लेकर भारत तक कि सियासत में हड़कंप मच गया है। अमेरिका इलेक्शन में कांग्रेस के दोनों सदनों में अब डेमोक्रेट का कब्जा हो गया है। और रिपब्लिकन पार्टी की पकड़ जाती रही। सवाल उठ रहे हैं कि क्या अमेरिकन मध्यावधि चुनाव के नतीजे मोदी सरकार के लिए भी खतरे की घंटी है।
राहुल गांधी की एक साल पहले वाली भविष्यवाणी फिर चर्चा में। क्या बदलती वैश्विक राजनीति और देश के भीतर बढ़ता असंतोष मिलकर देश में सत्ता परिवर्तन की स्क्रिप्ट लिख सकते हैं क्योंकि जिस ट्रंप को दुनिया के सामने अपनी ताकत का प्रदर्शन करने का शौक था, जिस ट्रंप के हर बयान में धमकी और हर फैसले में दबाव बनाने की कोशिश दिखाई देती थी उसी ट्रंप को अपने देश के मतदाताओं ने ऐसा राजनीतिक झटका दिया है कि उनकी पार्टी अमेरिकी संसद के दोनों सदनों से बाहर हो गयी। डेमोक्रेट्स ने सीनेट और प्रतिनिधि सभा दोनों में बहुमत हासिल कर लिया। यह सिर्फ चुनावी नतीजा नहीं ट्रंप की नीतियों की शवयात्रा है।

देश की राजनीति में क्या कोई बड़ा उलटफेर आकार ले रहा है?

यहां कहानी को समझने की जरूरत है। अमेरिका में ट्रंप की हार मोदी सरकार के गिरने का प्रमाण नहीं है। लेकिन यह जरूर बताती है कि ताकतवर नेता भी जनता की नाराजगी से नहीं बच सकते। ईरान के मोर्चे पर ट्रंप की मुश्किलें और अमेरिका के भीतर उनकी नीतियों के खिलाफ आया जनादेश दुनिया की राजनीति में बदलते मूड का संकेत हैं। भारत में भी सत्ता को अब सिर्फ चुनावी जीत के पुराने आंकड़ों से नहीं बल्कि जनता के मौजूदा सवालों से जवाब देना होगा। तो क्या ट्रंप के राजनीतिक झटके से मोदी सरकार के लिए भी खतरे की घंटी बज गई है? क्या राहुल गांधी की भविष्यवाणी को अब नए राजनीतिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए? और क्या भारत की राजनीति में भी कोई बड़ा उलटफेर आकार ले रहा है? कहानी यहीं से शुरू होती है।

क्या संभव है भारत में सत्ता परिवर्तन

पीएम नरेंद्र मोदी और प्रेसीडेंट डोनाल्ड ट्रंप की नजदीकी को लंबे समय तक दोनों नेताओं की ताकत, वैश्विक प्रभाव और राजनीतिक केमिस्ट्री के रूप में देश के भीतर पेश किया गया। ट्रंप की जीत को मोदी की कूटनीतिक सफलता बताया गया लेकिन अब ट्रंप की पार्टी अपने ही देश में सत्ता के विधायी केंद्रों पर पकड़ खो चुकी है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या जिस अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक सहारे को मोदी सरकार अपनी ताकत के रूप में पेश करती चली आ रही है वह खुद कमजोर पड़ चुका है। देश के भीतर राहुल गांधी पहले ही दावा कर चुके हैं कि एक साल के भीतर पीएम मोदी की सरकार गिर जाएगी। उस वक्त उनके इस बयान को राजनीतिक बयानबाजी बताकर बीजेपी ने खारिज कर दिया था। लेकिन जिस तेजी से देश दुनिया के हालात बदलते हैं उनको देखकर लग रहा है कि राहुल गांधी की भविष्यवाणी में दम है। एसआईआर को लेकर देशव्यापी विवाद, चुनाव आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियां, दिल्ली में विपक्ष का बड़ा प्रदर्शन और सत्ता के खिलाफ बढ़ती राजनीतिक लामबंदी यह सारे घटनाक्रम अलग-अलग जरूर हैं, लेकिन एक ही सवाल खड़ा कर रहे हैं कि क्या मोदी सरकार जाने वाली है?

मोदी-ट्रंप की दोस्ती का राजनीतिक हिसाब

नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप के रिश्तों को दोनों देशों की राजनीति में खास महत्व दिया गया। हाउडी मोदी से लेकर नमस्ते ट्रंप तक दोनों नेताओं की सार्वजनिक नजदीकी को खूब प्रचारित किया गया। एक दूसरे के समर्थन में दिए गए बयान और साझा मंचों की तस्वीरें राजनीतिक संदेश का हिस्सा बनीं। भारत में ट्रंप की वापसी को मोदी सरकार की कूटनीतिक सफलता के रूप में भी प्रस्तुत किया गया। यह दावा किया गया कि मोदी और ट्रंप की दोस्ती से भारत को वैश्विक मंच पर फायदा मिलेगा। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। ट्रंप की पार्टी अमेरिकी संसद के दोनों सदनों में बहुमत गंवा चुकी है। राष्ट्रपति के पास विदेश नीति और कार्यपालिका के स्तर पर अधिकार बने रहेंगे लेकिन घरेलू राजनीति में उनकी स्थिति कमजोर हुई है और ट्रंप के कमजोर होने का असर सीधे भारत पर पड़ता दिखायी दे रहा है क्योंकि अमेरिका की विदेश नीति केवल राष्ट्रपति की निजी दोस्ती से नहीं चलती वहां संसद, संस्थाएं, रणनीतिक हित और प्रशासनिक तंत्र कि अहम भूमिका होती है। ट्रंप की हार का राजनीतिक संदेश बदलता है कि जिस नेता के साथ मजबूत रिश्तों को अपनी वैश्विक ताकत का प्रतीक बताया वह नेता अब अपने ही देश में विपक्ष के दबाव में है। ऐसे में मोदी सरकार के लिए भी यह समझना जरूरी है कि अंतरराष्ट्रीय रिश्तों का राजनीतिक लाभ स्थायी नहीं होता। कूटनीति की सफलता का आकलन तस्वीरों और मंचों से नहीं बल्कि देश के हितों और ठोस नतीजों से होता है।

ट्रंप की हार सत्ता के अहंकार पर जनता का प्रहार

अमेरिका के मध्यावधि चुनाव ने डोनाल्ड ट्रंप की राजनीति को बड़ा झटका लगा है। डेमोक्रेटिक पार्टी ने सीनेट और प्रतिनिधि सभा दोनों में बहुमत हासिल कर लिया है। इसका मतलब है कि ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के बचे हुए दो वर्षों में उन्हें संसद के दोनों सदनों में विपक्ष की मजबूत चुनौती का सामना करना पड़ेगा। यह परिणाम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ट्रंप ने इन चुनावों को अपनी लोकप्रियता और नीतियों के समर्थन की परीक्षा बना दिया था। उन्होंने कई रिपब्लिकन उम्मीदवारों के लिए प्रचार किया। लेकिन जिन उम्मीदवारों के लिए ट्रंप ने ताकत झोंकी उनमें से कई को हार का सामना करना पड़ा। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक डेमोक्रेट्स ने सीनेट की छह रिपब्लिकन सीटें पलटीं और प्रतिनिधि सभा में भी कम से कम आठ सीटें अपने पाले में कीं। टेक्सास, आयोवा, ओहायो और साउथ कैरोलाइना जैसे राज्यों में मिली सफलता ने इस जीत को और बड़ा बना दिया। मतदाताओं की नाराजगी के पीछे महंगाई जीवनयापन की बढ़ती लागत और ईरान युद्ध जैसे मुद्दे रहे।

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