जिसके संघर्ष से मिली आज़ादी, वही सत्ता से दूर क्यों रहा?

गांधी 1924 में एक बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे. उस समय कांग्रेस एक राजनीतिक आंदोलन थी, सरकार नहीं.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: गांधी 1924 में एक बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे. उस समय कांग्रेस एक राजनीतिक आंदोलन थी, सरकार नहीं. इसके बाद उन्होंने, पार्टी के भीतर भी, औपचारिक नेतृत्व से खुद को काफी दूर रखा.

आज बैंक बंद हैं. स्कूल भी बंद हैं. अदालतें और ज्यादातर सरकारी दफ्तर भी बंद हैं. किसी से पूछिए क्यों, तो लगभग हर कोई एक ही जवाब देगा, गांधी जयंती. इस दिन की तस्वीर हममें से ज्यादातर लोगों के मन में पहले से बनी हुई है.

गोल चश्मा. हाथ में लाठी. शरीर पर सफेद कपड़ा. एक ऐसा नाम, जो स्कूल की लगभग हर किताब के शुरुआती अध्यायों में मिलता है, लेकिन इस छुट्टी के दिन एक सवाल बहुत कम लोग पूछते हैं. जब 1947 में भारत आजाद हुआ, तब गांधी ने सरकार में कौन-सा पद लिया?

सच यह है कि उन्होंने कोई पद नहीं लिया. न प्रधानमंत्री. न राष्ट्रपति. न किसी भी स्तर के मंत्री. यहां तक कि नई संसद में भी उनकी कोई सीट नहीं थी. जिस व्यक्ति को ज्यादातर भारतीय, किसी भी दूसरे एक व्यक्ति से ज्यादा, अंग्रेजी शासन खत्म होने का श्रेय देते हैं, उसने जिस देश को आजाद कराने में इतनी बड़ी भूमिका निभाई, उसी देश में कभी कोई सरकारी पद नहीं संभाला. यह कोई छोटी बात नहीं है. यह इतनी असामान्य बात है कि इस पर एक पल रुककर सोचना चाहिए.

गांधी का असर लोगों पर कैसे आया?

गांधी 1924 में एक बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे. उस समय कांग्रेस एक राजनीतिक आंदोलन थी, सरकार नहीं. इसके बाद उन्होंने, अपनी ही पार्टी के भीतर भी, औपचारिक नेतृत्व से खुद को काफी दूर रखा. 1934 तक उन्होंने सक्रिय राजनीति से भी पीछे हटना शुरू कर दिया था. इसके बाद उनका ध्यान गांवों की ओर था.

सफाई, चरखा और कपड़ा कातना, और भारत के सबसे दबे-कुचले लोगों के साथ होने वाले भेदभाव जैसे विषय उनके काम के केंद्र में थे. जब अगस्त 1947 में भारत आजाद हुआ, तब गांधी दिल्ली में सत्ता के नए गलियारों में जश्न नहीं मना रहे थे. वे बंगाल में थे, जहां बंटवारे के दौरान हिंदू और मुसलमान एक-दूसरे को मार रहे थे और गांधी उन्हें रोकने की कोशिश कर रहे थे. तो फिर अगर उनके पास कोई सरकारी पद नहीं था, तो उनका असर आया कहां से?

वह असर उस चीज से आया, जिसे बाद में भारत का संविधान हर नागरिक के लिए सुरक्षित करना चाहता था. अपने आचरण की ताकत. अपनी बात कहने की आजादी. लोगों को एक साथ खड़ा करने की आजादी. विरोध करने और दूसरों को अपनी बात समझाने की आजादी.

इसके लिए किसी पद की जरूरत नहीं थी. गांधी के पास लोगों को आदेश देने की कोई सरकारी ताकत नहीं थी. लोग अपनी इच्छा से उनके साथ खड़े हुए. उन्होंने देखा कि गांधी कैसे जीते हैं और फिर उनके अपने व्यवहार में बदलाव आया.

यह बात ध्यान देने लायक है, क्योंकि हममें से ज्यादातर लोग चुपचाप यह मान लेते हैं कि असली बदलाव के लिए कुर्सी, पहचान या कोई बड़ा पद जरूरी होता है. एक छात्र सोचता है कि नेता बने बिना कुछ नहीं बदल सकता.

कोई अपने मोहल्ले में परेशान है तो सोचता है कि पार्षद की मदद के बिना कुछ ठीक नहीं होगा. कोई कर्मचारी सोचता है कि ऊपर का कोई बड़ा अधिकारी आगे आए बिना कुछ नहीं बदलेगा. गांधी का अपना जीवन हमें इसका दूसरा रास्ता दिखाता है, कम से कम कुछ हद तक.

प्रभाव और पद एक ही चीज नहीं

एक बहुत छोटा और आम उदाहरण देखिए. भारत के शहरों में कई जगह लोगों की अपनी मोहल्ला समितियां होती हैं. वहां कोई एक व्यक्ति बिना किसी सरकारी पद के, बिना किसी को जुर्माना देने या सजा देने की कानूनी ताकत के, फिर भी खराब स्ट्रीट लाइट ठीक करवा देता है, पार्क साफ करवाता है या पानी की समस्या को सही सरकारी दफ्तर तक पहुंचाता है.

उसके पास कोई सरकारी अधिकार नहीं होता. उसके पास लगातार कोशिश करने की ताकत होती है और पड़ोस के लोगों का इतना भरोसा होता है कि उसकी बात सुनी जाए. यह एक बहुत छोटी सी मिसाल है, एक बहुत बड़े जीवन की. लेकिन दोनों के पीछे काम करने वाली बात एक ही है. प्रभाव और पद एक ही चीज नहीं हैं. एक बिना दूसरे के भी मौजूद हो सकता है.

इसका मतलब यह नहीं है कि सरकारी पद का महत्व नहीं है. उसका महत्व साफ है. कानून बनाने हैं, बजट तय करने हैं और सरकारी व्यवस्था चलानी है, तो व्यवस्था के भीतर ऐसे लोगों की जरूरत होती है जो फैसले लें, आदेश जारी करें और जनता के प्रति जवाबदेह रहें.

गांधी का रास्ता संस्थाओं से बाहर निकल जाने का कोई आसान रास्ता नहीं है. वह केवल हमें यह याद दिलाता है कि बदलाव की शुरुआत केवल सरकारी संस्थाओं के भीतर से ही नहीं होती, लेकिन एक कठिन सच से भी नजर नहीं हटानी चाहिए. गांधी का रास्ता बहुत धैर्य, अनुशासन और व्यक्तिगत जोखिम मांगता था. इन गुणों की तारीफ करना आसान है. उन्हें अपने जीवन में उतारना कठिन है.

गांधी को कई बार जेल जाना पड़ा. उन्होंने लंबे उपवास किए, जिनमें उन्होंने अपनी सेहत और एक बार तो अपनी जान तक को खतरे में डाल दिया. इस तरह की नैतिक ताकत राजनीतिक ताकत का कोई आसान विकल्प नहीं है. कई बार वह व्यक्ति से कम नहीं, बल्कि ज्यादा मांगती है. शायद यही वजह है कि यह बात उस दिन कम सुनाई देती है, जिस दिन हम ज्यादातर यह देखते हैं कि बैंक बंद हैं.

असहज सवाल के साथ बैठना कठिन

किसी मुद्रा के नोट पर छपी तस्वीर को याद रखना आसान है. लेकिन इस असहज सवाल के साथ बैठना कठिन है. अगर बीसवीं सदी के सबसे प्रभावशाली भारतीयों में से एक ने देश को बदलने के लिए किसी सरकारी पद की जरूरत नहीं समझी, तो फिर हम बाकी लोग किसी चीज को बदलने से पहले आखिर किसका इंतजार कर रहे हैं? हाथ में लाठी और शरीर पर सफेद कपड़ा लगभग हर भारतीय को याद है. लेकिन उनके नाम के आगे किसी सरकारी पद का न होना उतना याद नहीं है. शायद इसे भी याद रखना चाहिए.

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