नंदी को देखा, बंदर को देखा… फिर खुद से पूछा-हमने देश को क्या दिया?
पुरानी समझ हमें यही सिखाती रही है कि किसी काम की कीमत केवल इस बात से नहीं होती कि हमने क्या किया, बल्कि इस बात से भी होती है कि किस भावना से किया.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: पुरानी समझ हमें यही सिखाती रही है कि किसी काम की कीमत केवल इस बात से नहीं होती कि हमने क्या किया, बल्कि इस बात से भी होती है कि किस भावना से किया.
कभी-कभी इंसानियत का सबसे बड़ा पाठ हमें वहीं से मिलता है, जहां हम उसकी उम्मीद भी नहीं करते. सोचिए, एक व्यस्त सड़क है. गाड़ियां तेजी से निकल रही हैं. लोग अपने काम में भाग रहे हैं. शोर चारों तरफ है.
सड़क के किनारे नंदी की एक पत्थर की मूर्ति है. तभी एक बंदर वहां आकर बैठ जाता है. उसके छोटे-से हाथ में एक केला है. वह उस केले को नंदी के पास ले जाता है, जैसे किसी अपने को खाना खिला रहा हो.
हमें नहीं पता कि वह बंदर क्या समझता है. शायद वह नंदी को पवित्र मानता है. शायद उसे बस कोई परिचित चीज दिखाई देती है. शायद उसे पूजा के बारे में कुछ भी पता नहीं. फिर भी उस छोटे-से दृश्य को देखकर हमारे भीतर कुछ पल के लिए शांति उतर आती है.
पत्थर के सामने हाथ जोड़ते हैं’
शायद इसलिए कि हम अपनी पूरी जिंदगी यह साबित करने में लगा देते हैं कि हम इंसान हैं, जबकि इंसानियत खुद बहुत सरल हो सकती है. हम मंदिर बनाते हैं. दीप जलाते हैं. फूल और भोजन चढ़ाते हैं. लंबी कतारों में खड़े होते हैं और पत्थर के सामने हाथ जोड़ते हैं.
इसमें कुछ गलत नहीं है. आस्था ने करोड़ों लोगों को उम्मीद, साहस और जीवन का अर्थ दिया है. लेकिन शायद एक जगह आकर हमें यह खतरा हो जाता है कि पूजा का तरीका उस भावना से बड़ा हो जाए जिसके लिए पूजा की जाती है. हम भगवान के सामने सिर झुकाना याद रखते हैं, लेकिन मंदिर के बाहर खड़े भूखे इंसान के सामने झुकना भूल जाते हैं.
मंदिर के बाहर खड़े भूखे आदमी को भोजन की जरूरत है. गर्म सड़क पर प्यासे जानवर को पानी चाहिए. धीरे-धीरे सड़क पार करते बुजुर्ग को किसी के रुकने की जरूरत है.
डरे हुए बच्चे को किसी का हाथ चाहिए. कई दिनों से चुप रहने वाले पड़ोसी को शायद सिर्फ एक फोन की जरूरत हो. इनमें से किसी काम के लिए बड़े मंदिर, लंबी पूजा या बड़ी बात की जरूरत नहीं है. बस इतना चाहिए कि हम सामने की जिंदगी को देख सकें.
बंदर के छोटे से काम में एक सुंदर सी मासूमियत
शायद भगवान हमेशा यह नहीं कहते कि ऊपर देखो. शायद कभी-कभी वे कहते हैं, आसपास देखो. बंदर के उस छोटे-से काम में एक सुंदर-सी मासूमियत है. उसे शायद पूजा और प्यार का फर्क नहीं मालूम. उसके पास कुछ है और वह उसे दे देता है.
इंसान ने लगभग हर सरल चीज को जटिल बना दिया है. हमने नाम बनाए, नियम बनाए, बहसें कीं और सीमाएं खींच दीं. यहां तक कि दया भी कभी-कभी प्रदर्शन बन जाती है. हम किसी की मदद करते हैं और फिर मन के किसी कोने में इंतजार करते हैं कि कोई हमें अच्छा कहे. लेकिन अगर कोई देख ही न रहा हो तो?
अगर हम अच्छा काम करें और कोई तस्वीर न बने, कोई तालियां न बजें, कोई धन्यवाद न मिले और कोई इनाम भी न हो, तो क्या वह अच्छाई फिर भी हमारे लिए उतनी ही महत्वपूर्ण रहेगी?
पुरानी समझ हमें यही सिखाती रही है कि किसी काम की कीमत केवल इस बात से नहीं होती कि हमने क्या किया, बल्कि इस बात से भी होती है कि किस भावना से किया. शायद सबसे शुद्ध दया वही है, जिसका हिसाब हम अपने मन में भी नहीं रखते.
नागरिकता की शुरुआत
नागरिकता की शुरुआत भी शायद यहीं से होती है. देश के बारे में बड़े-बड़े शब्द बोलने से नहीं, बल्कि उन छोटे फैसलों से जो हम तब लेते हैं जब कोई हमें देख नहीं रहा होता. हम सड़क पर कचरा नहीं फेंकते क्योंकि कोई दूसरा उसे साफ करेगा.
हम धीरे-धीरे सड़क पार कर रहे बुजुर्ग पर बेवजह हॉर्न नहीं बजाते।. गर्मी में किसी जानवर के लिए पानी रख देते हैं. अपने से कमजोर व्यक्ति को अपमानित करने से मना कर देते हैं. जो हमारा नहीं है, उसे वापस कर देते हैं. बिना किसी प्रशंसा की उम्मीद के मदद करते हैं और असहमति होने पर भी सामने वाले इंसान को दुश्मन नहीं बना देते.
‘आज मैंने अपने देश को क्या दिया?
ये काम इतने छोटे लग सकते हैं कि हमें लगता है, इससे देश कैसे बदलेगा? लेकिन देश आसमान में बना कोई अलग विचार नहीं है. देश करोड़ों लोगों के रोजमर्रा के व्यवहार से बनता है. किसी राष्ट्र का चरित्र धीरे-धीरे उसके नागरिकों के चरित्र में उतरता है.
हम अक्सर पूछते हैं, ‘मेरे देश ने मुझे क्या दिया? यह सवाल गलत नहीं है. एक नागरिक को अधिकार, सम्मान, सुरक्षा, अवसर और न्याय मिलना चाहिए. लेकिन एक दूसरा सवाल है, जो थोड़ा कठिन है, क्योंकि उसमें किसी और को जिम्मेदार ठहराने की जगह नहीं बचती. ‘आज मैंने अपने देश को क्या दिया?
शायद जवाब बहुत बड़ा न हो. शायद किसी को सुनने के लिए दिए गए पांच मिनट हों. शायद पानी की एक बोतल. शायद किसी अपमानजनक संदेश को आगे न भेजने का फैसला. शायद बदला लेने के बजाय किसी को माफ कर देना. शायद केवल इतना कि हमने किसी और का कठिन दिन और कठिन नहीं बनाया.
उस बंदर के पास सिर्फ एक केला था. उसके पास कोई भाषण नहीं था. पैसा नहीं था. शक्ति नहीं थी. उसे यह भी नहीं पता था कि कोई उसे देख रहा है या नहीं. उसके पास बस कुछ था और उसने वह दे दिया. शायद हमारी अपनी यात्रा भी यहीं से शुरू होती है. यह पूछने से नहीं कि हमारे पास कितना है, बल्कि यह पूछने से कि हमारे हाथ में जो पहले से है, उसमें से हम कितना देने को तैयार हैं.



