पाकिस्तानी खून खराबा भारत पर युद्ध का साया!

  • पाकिस्तान का अफगानिस्तान पर हमला, 400 से ज्यादा मरे
  • काबुल से तेल अवीव तक बारूद, मिडिल ईस्ट में महायुद्ध के संकेत
  • बमों और मिसाइलों की बारिश के बीच चीन का सबसे बड़ा दांव

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। मध्य पूर्व में चालू बमों की बारिश के बीच पाकिस्तान का काबुल पर हमले ने जंग के दायरे को भारत की दहलीज पर लाकर खड़ा कर दिया है। अफगानिस्तान के एक नशा मुक्ति केन्द्र पर पाकिस्तानी एयर स्ट्राईक ने 400 से ज्यादा लाशें बिछां दी है। अफगानिस्तान में करूण रूंदन है और उसने बदला लेने का एलान कर दिया है। वहीं मध्य पूर्व में जंग और ज्यादा विस्फोटक हो रही है। कहीं से सुलाह के असार नहीं सुनाई दे रहे। जंग का ताजा अपडेट यह है कि डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी बीजिंग यात्रा को स्थागित कर दिया है वहीं चीन ने अमेरिका को ईरान में उलझा देखकर ताइवान के इर्द-गिर्द बारूद का जाल बुनना शुरू कर दिया है। बस यूरोपियन देशों की थोड़ी सी समझदारी जंग के व्यापक रूप को रोकने का काम कर रही है। जर्मनी, इटली, और दूसरे कई अन्य देशों ने अमेरिका का खुलकर साथ देने से इंकार कर दिया है। ताजा हालात की बात करें तो अमेरिकी बमबारी से तेहरान की सड़कों में दूर से ही गड्डे नजर आ रहे हैं। ईराक के अमेरिकी बेस कैंप में तबाही के शोले है और तेल अवीव खंडहर बन चुका है। दुनिया इस वक्त बारूद के ऐसे ढेर पर बैठी है, जहां एक चिंगारी पूरे महाद्वीप को आग में झोंक सकती है। पाकिस्तान ने अचानक अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पर हमला कर जंग के नक्शे को और खतरनाक बना दिया। यह हमला सिर्फ एक सैन्य कार्रवाई नहीं बल्कि उस आग में घी डालने जैसा है जो पहले ही ईरान और इजरायलके बीच धधक रही है। काबुल में एक नशा मुक्ति केंद्र को निशाना बनाकर की गई एयर स्ट्राइक ने 400 से ज्यादा लोगों की जान ले ली। सैकड़ों लाशें, चीखते परिवार, और बदले की खुली धमकी-अफगानिस्तान अब खामोश नहीं है। यह हमला एक नई जंग का उद्घोष बन चुका है।

भारत पर पड़ेगा इस धमाके का असर

मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया में भड़कती आग अब सीधे भारत की चौखट तक पहुंचती दिखाई दे रही है। काबुल में हुए हमले और ईरान-इजरायल के बीच जारी टकराव का असर भारत के लिए सिर्फ कूटनीतिक चुनौती नहीं बल्कि आर्थिक और सामाजिक संकट भी बन सकता है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है। ऐसे में अगर युद्ध लंबा खिंचता है तो तेल की कीमतों में उछाल तय है। इसका सीधा असर महंगाई ट्रांसपोर्ट और आम आदमी की रसोई तक देखने को मिलेगा। एलपीजी और पेट्रोल-डीजल की कीमतें पहले ही दबाव में हैं और अब हालात और बिगड़ सकते हैं। इसके अलावा लाखों भारतीय नागरिक खाड़ी देशों में काम करते हैं। अगर युद्ध का दायरा बढ़ता है तो उनकी सुरक्षा भी एक बड़ा सवाल बन जाएगी। एयरलाइंस, व्यापार और समुद्री मार्गों पर भी खतरा मंडराने लगा है। रणनीतिक रूप से भी भारत के लिए यह समय बेहद संवेदनशील है। एक तरफ उसे संतुलित कूटनीति बनाए रखनी है वहीं दूसरी ओर अपने आर्थिक हितों और नागरिकों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करनी है। कुल मिलाकर यह जंग भले सीमाओं से दूर शुरू हुई हो लेकिन इसके झटके अब भारत के भीतर महसूस होने लगे हैं।

भारत कहां खड़ा हैं?

मध्य पूर्व की स्थिति पहले ही विस्फोटक है। तेहरान से लेकर तेल अवीव तक आग की लपटें उठ रही हैं। अमेरिकी हमलों ने ईरान की राजधानी को जख्मी कर दिया है वहीं इजरायल भी हमलों की चपेट में है। हालात ऐसे हैं कि सुलह की कोई आवाज सुनाई नहीं दे रही सिर्फ युद्ध के नगाड़े बज रहे हैं। इसी बीच डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी बीजिंग यात्रा स्थगित कर दी है। संकेत साफ है कि वैश्विक कूटनीति भी अब जंग के साए में दबती जा रही है। उधर चीन चुप नहीं बैठा है। उसने ताइवान के आसपास अपनी सैन्य गतिविधियां तेज कर दी हैं जैसे किसी बड़े मौके की तलाश में हो। यूरोप के कुछ देश जरूर संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। जर्मनी, इटली जैसे देशों ने खुलकर अमेरिकी हमलों का समर्थन करने से दूरी बनाई है लेकिन क्या यह पर्याप्त है? सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस पूरे घटनाक्रम में भारत कहां खड़ा है। क्योंकि काबुल में गिरा बम तेहरान में उठती हर आग और तेल अवीव में विस्फोट उसकी आंच अब भारत की दहलीज तक महसूस होने लगी है। यह सिर्फ अब दो देशों की जंग नहीं रही। यह एक ऐसा जाल बनता जा रहा है जिसमें एशिया यूरोप और वैश्विक अर्थव्यवस्था सब उलझते जा रहे हैं। और इस बार सवाल सिर्फ यह नहीं कि कौन जीतेगा। सवाल यह है कि इस जंग में बचा कौन रहेगा।

काबुल का मंजर और बदले की तैयारी

काबुल पर हुआ हमला सिर्फ एक सैन्य कार्रवाई नहीं बल्कि एक मानवीय त्रासदी बन चुका है। पाकिस्तान की एयर स्ट्राइक में जिस नशा मुक्ति केंद्र को निशाना बनाया गया वहां सैकड़ों लोग मौजूद थे। नतीजा 400 से ज्यादा लोगों की मौत की खबर और दर्जनों के घायल होने की सूचना एक झटके में बाहर आ गयी। अफगानिस्तान ने इस हमले को सीधी आक्रामकता करार दिया है। तालिबान के नेतृत्व वाली सरकार ने साफ कहा है कि इस हमले का जवाब दिया जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान का यह कदम टीटीपी के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर उठाया गया लेकिन इसका असर कहीं ज्यादा व्यापक हो सकता है। क्योंकि अब यह सिर्फ आतंकवाद विरोधी आपरेशन नहीं बल्कि दो देशों के बीच खुला सैन्य टकराव बनता जा रहा है। अफगानिस्तान की तरफ से बदले की चेतावनी ने हालात को और खतरनाक बना दिया है। सीमा पर तनाव बढ़ चुका है और छोटे-छोटे संघर्ष बड़े युद्ध का रूप ले सकते हैं। काबुल की सड़कों पर पसरा सन्नाटा और मलबे के बीच तलाशती जिंदगियां इस बात का सबूत हैं कि जंग का सबसे बड़ा नुकसान हमेशा आम लोगों को ही उठाना पड़ता है।

आर्थिक मोर्चो पर फायदा उठाना चाहता है चीन

इसके अलावा आर्थिक मोर्चे पर भी चीन इस स्थिति का फायदा उठाने की कोशिश कर रहा है। वैश्विक सप्लाई चेन में हो रहे बदलाव और ऊर्जा संकट के बीच वह खुद को एक स्थिर विकल्प के रूप में पेश कर रहा है। ताइवान को लेकर चीन का रुख पहले से ही आक्रामक रहा है लेकिन मौजूदा हालात ने उसे और ज्यादा अवसर दे दिया है। अगर यह घेराबंदी और बढ़ती है तो एशिया में एक और बड़ा संकट खड़ा हो सकता है। यानी एक तरफ बम और मिसाइलों की जंग है तो दूसरी तरफ रणनीति और मौके की जंग। और इस खेल में चीन शायद सबसे ज्यादा चुपचाप लेकिन सबसे बड़ा दांव खेल रहा है।

चीन की ताइवान के इर्द-गिर्द घेराबंदी

जब दुनिया का ध्यान मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया की जंग पर केंद्रित है तब बीजिंग अपनी रणनीति को चुपचाप आगे बढ़ा रहा है। यह वही पुराना खेल है जब विरोधी उलझे हों तब अपने पत्ते मजबूत कर लो। चीन ने ताइवान के आसपास अपनी सैन्य गतिविधियां तेज कर दी हैं। ताइवान के चारों ओर नौसैनिक और हवाई अभ्यास बढ़ा दिए गए हैं। यह सिर्फ अभ्यास नहीं बल्कि एक स्पष्ट संदेश है कि चीन इस मौके को गंवाना नहीं चाहता। विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका इस समय ईरान और इजरायल के मुद्दे में उलझा हुआ है। ऐसे में चीन को लगता है कि एशिया प्रशांत क्षेत्र में उसकी गतिविधियों पर तत्काल सख्त प्रतिक्रिया नहीं आएगी। चीन का मकसद सिर्फ सैन्य दबाव बनाना नहीं बल्कि वैश्विक परसेप्शन को भी प्रभावित करना है। वह यह दिखाना चाहता है कि विश्व व्यवस्था बदल रही है और अब अमेरिका हर मोर्चे पर एक साथ प्रभावी नहीं रह सकता।

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