ममता की पार्टी का नया नाम MAITC, फुटबॉल खिलाड़ी होगा चुनाव चिन्ह?

चुनाव आयोग ने गुरुवार को TMC का नाम और सिंबल फ्रीज कर दिया था. पूर्व सीएम ममता बनर्जी के लिए ये बड़ा झटका था.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: चुनाव आयोग ने गुरुवार को TMC का नाम और सिंबल फ्रीज कर दिया था. पूर्व सीएम ममता बनर्जी के लिए ये बड़ा झटका था. आयोग ने दोनों गुटों से नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर आज 11 बजे तक विकल्प मांगा था.

चुनाव आयोग ने TMC के दोनों गुटों के नाम और चुनाव चिन्ह तय कर दिए हैं. ममता बनर्जी के गुट को ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (MAITC) नाम और फुटबॉल खिलाड़ी चुनाव चिन्ह मिला है, जबकि ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस नाम और लिफाफा चुनाव चिन्ह दिया गया है. इन दोनों गुटों को पश्चिम बंगाल, मेघालय और त्रिपुरा में मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों का दर्जा दिया जाएगा.

पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग को तीन नाम और तीन सिंबल का सजेशन भेजा था. सूत्रों के मुताबिक, ममता खेमे ने विकल्पों में तृणमूल ममता कांग्रेस या ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस ममता जैसे नाम दिए. सिंबल के विकल्पों में फुटबॉल, प्रार्थना और क्रिकेट बैट शामिल था. क्रिकेट बैट के साथ खेला होबे का स्लोगन भेजा गया. ममता खेमे ने चुनाव आयोग को ईमेल के जरिए अपनी पसंद भेजी थी.

तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बागी गुट की अगुवाई कर रहे ऋतब्रत बनर्जी ने कहा, हमने 3 नाम और 3 सिंबल ईमेल के जरिए भेजे. बता दें कि गुरुवार को चुनाव आयोग ने दोनों गुटों को 3-3 नाम और 3-3 फ्री सिंबल के विकल्प देने को कहा था. यह व्यवस्था आगामी उपचुनावों के लिए अंतरिम है. मूल पार्टी के नाम और फूल और घास वाले आरक्षित सिंबल पर अंतिम फैसला पैरा 15 की कार्यवाही के बाद होगा.

विवाद की शुरुआत कैसे हुई?

पूरे विवाद की शुरुआत पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद हुई. इस चुनाव में TMC को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा और बीजेपी ने प्रचंड जीत हासिल की.

TMC की इस हार के बाद जीते हुए अधिकतर विधायकों ने ममता बनर्जी को अपना नेता मानने से मना कर दिया और ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई में अलग गुट बना लिया. इसके बाद TMC का हक हासिल करने की लड़ाई शुरू हो गई. पहले पार्टी फंड पर दावा किया गया, फिर नाम और सिंबल पर.

इसके लिए पार्टी के संगठनात्मक ढांचे और नेशनल वर्किंग कमेटी के कार्यकाल को वजह बनाया गया. ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट का दावा है कि TMC की नेशनल वर्किंग कमेटी का गठन फरवरी 2022 में हुआ था और उसका तीन साल का कार्यकाल फरवरी 2025 में ही खत्म हो गया था. इसी आधार पर इस गुट ने पार्टी के मौजूदा संगठनात्मक ढांचे की वैधता पर सवाल उठाया. ऋतब्रत बनर्जी गुट का कहना है कि पार्टी संविधान के मुताबिक नई कमेटी का गठन होना चाहिए था.

इसी विवाद के बीच 22 जून 2026 को बागी नेताओं की बैठक हुई. इस बैठक में अरूप रॉय को नेशनल वर्किंग कमेटी का चेयरपर्सन चुने जाने का दावा किया गया. इसके बाद ऋतब्रत गुट ने चुनाव आयोग के सामने दावा किया कि वही असली TMC है और उसे पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर अधिकार मिलना चाहिए.

ममता गुट ने क्या कहा?

ममता बनर्जी गुट ने इन दावों को खारिज कर दिया. ममता खेमे का कहना है कि बागी गुट ने पार्टी संविधान की गलत व्याख्या की है और 22 जून की बैठक को वैध संगठनात्मक प्रक्रिया नहीं माना जा सकता. ममता गुट का तर्क है कि पार्टी के संगठनात्मक चुनाव और कमेटियों के गठन की प्रक्रिया संविधान के मुताबिक हुई थी, इसलिए बागी गुट की ओर से ममता बनर्जी को हटाने या नया संगठन बनाने का दावा मान्य नहीं है.

इस तरह दोनों पक्ष चुनाव आयोग के सामने खुद को असली तृणमूल कांग्रेस बताते हुए पार्टी के नाम और फूल और घास सिंबल पर अपना दावा करने लगे. विवाद उस समय और बढ़ गया जब पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर उपचुनाव की घोषणा हुई. दोनों गुटों ने इन सीटों पर उम्मीदवार उतारने की प्रक्रिया शुरू की और दोनों ही पक्ष TMC के आधिकारिक नाम और फूल और घास वाले सिंबल का इस्तेमाल करने का दावा कर रहे थे.

चुनाव आयोग ने क्या फैसला किया?

चुनाव आयोग ने दोनों पक्षों से संगठन, पदाधिकारियों और अधिकृत प्रतिनिधियों से जुड़े दस्तावेज मांगे और दोनों गुटों को अपना पक्ष रखने का मौका दिया. 17 सितंबर को चुनाव आयोग ने अंतरिम आदेश जारी किया. आयोग ने कहा कि फिलहाल न तो ममता बनर्जी गुट और न ही दूसरे गुट को ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस नाम का इस्तेमाल करने दिया जाएगा और न ही फूल और घास वाला आरक्षित चुनाव चिन्ह इस्तेमाल किया जा सकेगा.

आयोग ने दोनों गुटों से कहा कि वे तीन-तीन वैकल्पिक पार्टी नाम और तीन-तीन फ्री चुनाव चिन्ह अपनी पसंद के क्रम में दें. इनमें ऐसा नाम भी चुना जा सकता है जिससे मूल TMC से जुड़ाव का संकेत मिलता हो. दोनों गुटों को आगामी उपचुनावों के लिए अलग-अलग नाम और सिंबल दिए जाएंगे. यह फैसला अंतरिम व्यवस्था है. चुनाव आयोग ने साफ किया है कि पार्टी के वास्तविक नियंत्रण और नाम-सिंबल के अधिकार पर अंतिम फैसला अभी बाकी है.

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