राजनीति-सामाजिक वातावरण और कानून व्यवस्था को लेकर लगातार बहस जारी
2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनने के बाद चर्चा ही चर्चा

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनने के बाद देश की राजनीति सामाजिक वातावरण और कानून-व्यवस्था को लेकर लगातार बहस होती रही है। इस अवधि में मणिपुर की जातीय हिंसा नूंह में सांप्रदायिक टकराव भीड़ द्वारा हमलों और नफरत भरे भाषणों पर देश विदेश की संस्थाओं ने चिंता जताई है। मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच ने 2025 की अपनी रिपोर्ट में मणिपुर में मई 2023 से 200 से अधिक लोगों की मौत और 60 हजार से अधिक लोगों के विस्थापन का उल्लेख किया।
वहीं वाशिंगटन स्थित इंडिया हेट लैब के अध्ययन के मुताबिक 2024 में अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने वाले नफरती भाषणों की 1165 घटनाएं दर्ज की गईं जो 2023 की 668 घटनाओं से 74 प्रतिशत अधिक थीं।
यह आंकड़े अलग-अलग स्रोतों और परिभाषाओं पर आधारित हैं, लेकिन सामाजिक तनाव और हिंसा की रोकथाम पर गंभीर सवाल जरूर खड़े करते हैं। देश में कानून व्यवस्था पर सवाल उठते हैं तो मणिपुर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मई 2023 में शुरू हुई मेइती और कुकी समुदायों के बीच जातीय हिंसा में सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है और हजारों परिवारों को घर छोडऩा पड़ा। ह्यूमन राइट्स वॉच ने सितंबर 2026 में प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में मणिपुर में फरवरी 2023 से चली आ रही हिंसा के व्यापक प्रभाव और नए जातीय टकरावों का उल्लेख करते हुए बाकायदा एक पूरी रिपोर्ट जारी की है। उस रिपोर्ट के मुताबिक मौजूदा हिंसा के नए दौर में अगस्त 2026 के आखिर में कम से कम सात लोग मारे गए और फरवरी से जारी नागा कुकी टकराव में कुल 34 मौतें हुयी।
यह पुराने मेइती कुकी संघर्ष से जुड़ी एक अलग घटनाएं हैं जोकि राज्य में फैली हिंसा की नई परत के तौर पर सामने आयी है। मणिपुर की घटना किसी एक सामान्य आपराधिक वारदात जैसी नहीं है। यहां जातीय पहचान जमीन राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सुरक्षा को लेकर गहरे विवाद हैं। लेकिन इन कारणों से नागरिकों की जान और घरों की सुरक्षा का सवाल कम महत्वपूर्ण नहीं हो जाता। केंद्र सरकार और राज्य प्रशासन की जिम्मेदारी है कि हिंसा रोकने विस्थापित लोगों की वापसी दोषियों की जांच और दोनों समुदायों के बीच भरोसा कायम करने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं।

हरियाणा का नूंह सांप्रदायिक तनाव सवाल अभी जिंदा हैं
जुलाई 2023 में हरियाणा के नूंह में धार्मिक जुलूस के दौरान हिंसा भडक़ी और आसपास के जिलों तक तनाव फैल गया। इसके बाद गिरफ्तारियों और मुस्लिम परिवारों की संपत्तियों पर बुलडोजर कार्रवाई को लेकर विवाद हुआ। ह्यूमन राइट्स वॉच की 2024 की रिपोर्ट ने आरोप लगाया कि हिंसा के बाद प्रशासन ने मुस्लिम निवासियों की संपत्तियां गैरकानूनी तरीके से ध्वस्त कीं और अनेक लोगों को हिरासत में लिया। प्रशासन की कार्रवाई को लेकर अदालतों में भी सवाल उठे। यहां सवाल यह नहीं कि हिंसा करने वालों पर कार्रवाई होनी चाहिए या नहीं। कानून तोडऩे वालों पर कार्रवाई जरूरी है। लेकिन सवाल यह है कि कार्रवाई सबूत और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर हो रही है या किसी पूरे समुदाय को उसकी कीमत चुकानी पड़ रही है। किसी अपराध के लिए व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय होना और सामूहिक दंड देना दो बिल्कुल अलग बातें हैं। कानून की विश्वसनीयता इसी अंतर को बनाए रखने में है।
मॉब लिंचिंग का आधिकारिक हिसाब ही नहीं
भीड़ द्वारा हत्या या मॉब लिंचिंग पर बहस का सबसे गंभीर पहलू आंकड़ों की कमी है। गृह मंत्रालय ने संसद में बताया था कि राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो मॉब लिंचिंग के मामलों का अलग से आंकड़ा नहीं रखता। इसका मतलब यह नहीं कि घटनाएं नहीं होतीं बल्कि यह कि देशभर में इनके रुझान का एक समान आधिकारिक हिसाब उपलब्ध नहीं है। ऐसी स्थिति में यह दावा करना कि मोदी सरकार के आने के बाद मॉब लिंचिंग निश्चित प्रतिशत से बढ़ गई उपलब्ध सरकारी आंकड़ों से साबित नहीं किया जा सकता। लेकिन आंकड़ों की अनुपलब्धता अपने आप में नीति संबंधी सवाल है।
उत्तर प्रदेश में गोली पुलिस कार्रवाई और न्याय की कसौटी
उत्तर प्रदेश में भी हिंसा और कानून के राज पर बहस नयी नहीं है। अप्रैल 2023 में अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ की पुलिस हिरासत में कैमरों के सामने गोली मारकर हत्या कर दी गई। इससे पहले अतीक के बेटे असद और उसके सहयोगी गुलाम की पुलिस मुठभेड़ में मौत हुई थी। इन घटनाओं ने अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और न्यायिक प्रक्रिया के बीच की सीमा पर व्यापक बहस छेड़ी। ह्यूमन राइट्स वॉच ने अपनी 2024 की रिपोर्ट में पुलिस मुठभेड़ों में मौतों और जवाबदेही को लेकर उठी चिंताओं का भी उल्लेख किया। यहां भी दो बातें अलग अलग हैं एक ओर गंभीर अपराधों से निपटने और नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी है तो दूसरी ओर गिरफ्तारी जांच अभियोजन और सजा की संवैधानिक प्रक्रिया है। अपराध कितना भी गंभीर क्यों न हो कानून के राज का अर्थ है कि किसी व्यक्ति के दोष और दंड का फैसला निर्धारित कानूनी प्रक्रिया से हो। यही सिद्धांत आम नागरिक को भी सुरक्षा देता है और राज्य की कार्रवाई को भी वैधता प्रदान करता है।
’संजय सर’ सहित अन्य बिन्दुओं पर जाँच की जाए : अमिताभ
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। आजाद अधिकार सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमिताभ ठाकुर ने लखनऊ में शिवा शर्मा की संदिग्ध मृत्यु के प्रकरण में वायरल बताए जा रहे ऑडियो में उल्लिखित ‘संजय सर’ की पहचान तथा उनकी संभावित भूमिका की निष्पक्ष जाँच की माँग की है। उन्होंने कहा कि इस प्रकरण से संबंधित विभिन्न मीडिया रिपोर्टों में प्रभावशाली राजनीतिक व्यक्तियों, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों तथा पुलिस अधिकारियों से कथित संपर्कों को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
शिवा शर्मा के परिजनों ने भी इस संबंध में कुछ आरोप लगाए हैं। ऐसे में यह आवश्यक है कि प्रमाणित तथ्यों के आधार पर ऑडियो में उल्लिखित ‘संजय सर’ की पहचान की जाए तथा इस प्रकरण से संभावित रूप से जुड़े बताए जा रहे अन्य प्रशासनिक एवं पुलिस अधिकारियों के संपर्कों और उनकी संभावित भूमिका की निष्पक्ष जाँच की जाए। अमिताभ ठाकुर ने कहा कि श्रद्धा दुबे के मीडिया साक्षात्कारों, उनके कथित रूप से फरार होने तथा विवेचना से जुड़े घटनाक्रमों के संबंध में अब तक सामने आए प्रश्नों का निष्पक्ष परीक्षण आवश्यक है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कहीं किसी व्यक्ति द्वारा अनुचित प्रभाव का इस्तेमाल अथवा विवेचना में हस्तक्षेप तो नहीं किया गया।
वाह रे पुलिस! आरोपी आई इंटरव्यू दिया और तंत्र देखता रह गया
श्रद्धा दुबे प्रकरण में हजरतगंज इंस्पेक्टर के लाइन हाजिर होने के बाद उठे कई सवाल फरार आरोपी के इंटरव्यू और वायरल ऑडियो ने बढ़ाई चर्चा
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। राजधानी के चर्चित शिवा शर्मा हत्याकांड में अब सवाल सिर्फ हत्या के आरोप में वांछित श्रद्धा दुबे की गिरफ्तारी का नहीं, बल्कि उन चेहरों की भूमिका का भी उठ रहा है, जिनके कथित संरक्षण को लेकर शहर में चर्चाओं का बाजार गर्म है। पुलिस उपायुक्त मध्य स्तर पर कार्रवाई और हजरतगंज इंस्पेक्टर के लाइन हाजिर होने की चर्चा के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर व्यवस्था की सख्ती का असर किस पर पड़ रहा है? फरार आरोपी पर या उसकी तलाश में जुटी पुलिस पर?
एक तरफ श्रद्धा दुबे की गिरफ्तारी को लेकर पुलिस की कार्रवाई और इनाम घोषित किए जाने की खबरें सामने आती हैं, दूसरी तरफ उसके बयान सोशल मीडिया पर प्रसारित होते दिखाई देते हैं। यहां तक कि एएनआई जैसी प्रतिष्ठित समाचार एजेंसी को दिए गए इंटरव्यू ने भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं। श्रद्धा लगातार फरार है तो उसका इंटरव्यू कैसे और किन परिस्थितियों में हुआ? क्या पुलिस ने इंटरव्यू के स्रोत, स्थान और संपर्क सूत्रों की पड़ताल की? क्या कोई ऐसा व्यक्ति है जो श्रद्धा को पुलिस की पहुंच से दूर रखते हुए मीडिया तक पहुंच बनाने में मदद कर रहा है? इन सवालों के जवाब सामने आना जरूरी है।
श्रद्धा को शहर से बाहर भेजने वाला कौन? क्या किसी मददगार की भूमिका की जांच हुई?इस पूरे प्रकरण में एक और गंभीर सवाल सामने आ रहा है। आखिर वह कौन है जिसने कथित तौर पर श्रद्धा दुबे को शहर से बाहर भेजने में मदद की? अगर ऐसा हुआ तो क्या पुलिस ने उस व्यक्ति तक पहुंचने की कोशिश की?सूत्रों के हवाले से कथित मददगारों और बिचौलियों की भूमिका को लेकर भी चर्चाएं हैं। सवाल यह है कि क्या जांच केवल नामजद आरोपियों तक सीमित रहेगी या फरारी के दौरान मदद करने वालों की संभावित भूमिका भी खंगाली जाएगी?
विषकन्याओं की कहानी अधूरी, क्या पर्दे के पीछे सक्रिय हैं बिचौलिए?
शहर में अब चर्चा सिर्फ एक आरोपी की नहीं, बल्कि उन कथित बिचौलियों की भूमिका को लेकर भी है, जिनके संबंध में तरह-तरह के दावे किए जा रहे हैं। क्या ऐसे लोगों का कोई नेटवर्क सक्रिय है? क्या प्रभावशाली लोगों से संपर्क का इस्तेमाल किसी आरोपी को बचाने के लिए किया जा रहा है? या फिर यह केवल चर्चाएं हैं, जिनकी सच्चाई सामने आनी बाकी है? इन सवालों का जवाब किसी अफवाह से नहीं, बल्कि निष्पक्ष पुलिस जांच से ही मिल सकता है।
कथित ऑडियो में ‘संजय सर’ का जिक्र, आखिर कौन हैं ये संजय सर?
इस मामले में चर्चा का एक नया केंद्र वह कथित ऑडियो भी है, जिसमें श्रद्धा दुबे द्वारा ‘संजय सर’ का नाम लिए जाने की बात कही जा रही है।आखिर ये संजय सर कौन हैं? उनका श्रद्धा से क्या संबंध है? किस संदर्भ में उनका नाम लिया गया? क्या पुलिस ने ऑडियो की प्रामाणिकता और उसमें हुई बातचीत की जांच कराई?पुलिस पर कार्रवाई, लेकिन श्रद्धा की गिरफ्तारी कब? हजरतगंज इंस्पेक्टर को लाइन हाजिर किए जाने की चर्चा के बाद अब एक बड़ा सवाल पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर भी उठ रहा है।और सबसे अहम सवाल—जिस आरोपी की गिरफ्तारी पर इनाम घोषित हो, उसके कथित इंटरव्यू सामने आने के बावजूद गिरफ्तारी में देरी क्यों?
आखिरकार मरीज को दूसरे अस्पताल ही ले जाना पड़ा
दोपहर में डॉक्टर बोले—छुट्टी पर जा रहा हूं, मरीज कहीं और ले जाओ!
स्वामी विवेकानंद अस्पताल में इलाज के नाम सोर्स लगवाने का मामला
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। वाह स्वामी विवेकानंद अस्पताल! तेरा और तेरे डॉक्टर आमिर का क्या कहना! रात 9 बजे गंभीर हालत में भर्ती मरीज, पूरी रात इलाज के नाम पर मंगवाई जाती रहीं दवाइयां, लगभग 40 हजार रुपये खर्च हो गए, लेकिन परिजनों के मुताबिक मरीज की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ।
परिवार विशेषज्ञ चिकित्सक का इंतजार करता रहा और जब दोपहर करीब 2.30 बजे डॉक्टर पहुंचे तो कथित तौर पर यह कहकर दूसरे अस्पताल जाने की सलाह दे दी कि वह छुट्टी पर जा रहे हैं और यहां किसी अन्य डॉक्टर पर उन्हें इतना भरोसा नहीं कि मरीज का इलाज सौंपकर जा सकें। बता दें स्वामी विवेकानंद अस्पताल में इलाज के नाम पर गंभीर आरोप लगे है। मरीज के परिजनों का दावा है कि आयुष्मान कार्ड पर इलाज नहीं मिलगा। ऊपर से सोर्स लगाने पर यह सुविधा मिलेगी। हालत बिगडऩे पर सीपीआर की नौबत आग गई तब मरीज के परिजन उसे लोहिया अस्पताल लेकर भाग। वहीं डॉ. आमिर बोले, यहां किसी दूसरे डॉक्टर पर भरोसा नहीं जिसे मरीज सौंपकर जाऊं।



