सात साल, पांच को जमानत, दो जेल में

- दिल्ली दंगों में सात साल बाद आधी राहत, आधा सन्नाटा
- उमर खालिद और शरजिल इस्लाम को एक वर्ष तक जमानत याचिका लगाने पर भी रोक
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। आज की अहम और सबसे बड़ी खबर वर्ष 2020 में दिल्ली में हुए दंगों के आरोपी उमर खालिद और शरजिल इस्लाम को सर्वोच्च अदालत ने जमानत देने से इंकार कर दिया है। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने इन दोनों के साथ जेल में बंद पांच अन्य की जमानत याचिका को स्वीकार कर उन्हें जमानत दे दी है। यही नहीं कोर्ट ने उमर खालिद ओर शरजिल पर एक वर्ष तक जमानत अर्जी न लगाने की भी बात कही है। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने इस मामले में जिन अन्य पांच आरोपियों को जमानत दी है उनके नाम इस प्रकार हैं गुलफिशा फातिमा, मीरन हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद। कोर्ट ने कहा है कि प्रत्येक आरोपी की जमानत याचिका पर अलग अलग विचार किया जाना चाहिए क्योंकि सातों आरोपी अपराध के मामले में समान स्तर पर नहीं हैं। बेंच ने कहा है कि उमर खालिद और शरजील इमाम अन्य आरोपियों की तुलना में गुणात्मक रूप से अलग स्तर पर हैं।
भारत की न्याय प्रणाली पर अंतरराष्ट्रीय नजर
दिल्ली दंगों के आरोपियों की लंबी हिरासत को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिंता जताई जा रही हैं। हाल ही में अमेरिका के कई सांसदों और न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी ने भारत सरकार को एक संयुक्त चिट्ठी लिखकर सवाल उठाए हैं। इस पत्र में कहा गया है कि लंबे समय तक बिना सजा के जेल में रखा जाना अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों का उल्लंघन है। चिट्ठी में विशेष रूप से यह उल्लेख किया गया है कि विचाराधीन कैद को निवारक उपाय की बजाय दंडात्मक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। सांसदों ने चिंता जताई कि ऐसे मामलों में कानून का इस्तेमाल राजनीतिक असहमति को दबाने के लिए हो सकता है जो लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। जोहरान ममदानी ने अपने बयान में कहा है कि भारत एक संवैधानिक लोकतंत्र है और उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखे। उन्होंने यह भी जोड़ा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय भारत की आंतरिक न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं चाहता लेकिन मानवाधिकारों पर चुप भी नहीं रह सकता। भारत सरकार ने इस पत्र पर अब तक कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है लेकिन कूटनीतिक हलकों में इसे आंतरिक मामलों में दखल के रूप में देखा जा रहा है। वहीं मानवाधिकार समूह इसे भारत के लिए चेतावनी मान रहे हैं कि दुनिया अब सिर्फ आर्थिक नहीं लोकतांत्रिक सूचकांकों पर भी नजर रख रही है।
करीब सात साल बाद…
करीब सात साल बाद दिल्ली दंगों से जुड़े एक अहम मामले में सुप्रीम कोर्ट का आज फैसला आया है आज के फैसले ने राहत से ज्यादा सवाल खड़े कर दिए हैं? कि शीर्ष अदालत ने शरजिल इस्लाम और उमर खालिद को छोड़कर बाकी पांच आरोपियों को जमानत दे दी है। यह आदेश ऐसे वक्त आया है जब ट्रायल अब तक निर्णायक मोड़ तक नहीं पहुंच सका और आरोपी लंबे समय से न्यायिक हिरासत में हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में खुद स्वीकारा है कि लंबी कैद को सजा का विकल्प नहीं बनाया जा सकता खासकर तब जब मुकदमे की सुनवाई ठोस प्रगति नहीं दिखा पा रही हो। अदालत ने यह भी रेखांकित किया है कि विचाराधीन कैदियों के मौलिक अधिकारों की अनदेखी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर प्रश्न खड़े करती है। हालांकि इसी आदेश में दो नाम ऐसे हैं जिनके लिए राहत का दरवाजा नहीं खुला। शरजिल इस्लाम और उमर खालिद। अदालत ने उनके मामलों को अलग परिस्थितियों वाला बताते हुए फिलहाल जमानत देने से इनकार कर दिया। यही बिंदु इस फैसले को कानूनी से ज्यादा राजनीतिक और नैतिक बहस में बदल देता है।
लोकतंत्र की परीक्षा
दिल्ली दंगों के मामलों में यह आदेश सिर्फ एक कानूनी निर्णय नहीं है बल्कि भारतीय लोकतंत्र की सेहत का एक्सरे है। सवाल यह नहीं कि किसे जमानत मिली और किसे नहीं सवाल यह है कि क्या न्याय अब भी समान निष्पक्ष और समयबद्ध है? फिलहाल पांच परिवारों के घरों में राहत की सांस है जबकि दो नामों के साथ सन्नाटा और लंबा हो गया है। और देश के सामने एक पुराना सवाल फिर खड़ा है क्या न्याय सबके लिए एक जैसा है या हर नाम का अपना अलग वजन है?
राजनीति की खामोशी
इस फैसले पर सत्तापक्ष की ओर से अब तक कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं आई है। विपक्ष ने इसे आधी इंसाफ, आधा अन्याय करार दिया है। कांग्रेस, वाम दलों और समाजजिक संगठनों ने सवाल उठाया है कि अगर ट्रायल में देरी और सबूतों की कमजोरी जमानत का आधार है तो यह आधार सभी पर समान रूप से क्यों लागू नहीं हुआ? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला आने वाले समय में न्यायपालिका बनाम कार्यपालिका की बहस को और तेज करेगा खासकर तब जब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी भारत की न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं।




