BJP संग गठबंधन पर Congress का एक्शन, अंबरनाथ में पूरी स्थानीय इकाई को कर दिया निलंबित
महाराष्ट्र में उठी राजनीतिक चिंगारी ने पूरे देश के सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है...दरअसल, महाराष्ट्र की राजनीति में अंबरनाथ नगर परिषद से उठी हलचल ने राज्य से लेकर राष्ट्रीय राजनीति तक हलचल मचा दी है...

4पीएम न्यूज नेटवर्क: महाराष्ट्र में उठी राजनीतिक चिंगारी ने पूरे देश के सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है…दरअसल, महाराष्ट्र की राजनीति में अंबरनाथ नगर परिषद से उठी हलचल ने राज्य से लेकर राष्ट्रीय राजनीति तक हलचल मचा दी है…
जहां भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस जैसे वैचारिक तौर पर धुर विरोधियों का स्थानीय स्तर पर साथ आना…जितना चौंकाने वाला था….उससे कहीं ज्यादा चौंकाने वाला कांग्रेस आलाकमान का वो फैसला है…जिसमें बिना किसी हिचक के अंबरनाथ की पूरी कांग्रेस संगठनात्मक इकाई को निलंबित कर दिया गया…इस कदम ने साफ कर दिया है कि चाहे बीजेपी किसी भी रणनीति के तहत…किसी भी मजबूरी या गणित के नाम पर गठबंधन का ऑफर दे…कांग्रेस नेतृत्व उसके लिए तैयार नहीं है…
अंबरनाथ नगर परिषद में सत्ता गठन के दौरान कांग्रेस के कुछ स्थानीय नेताओं और निर्वाचित पार्षदों ने बीजेपी के साथ मिलकर भूमिका निभाई….माना जा रहा है कि ये गठबंधन बीजेपी की उस रणनीति का हिस्सा था…जिसके जरिए वो महाराष्ट्र की सियासत में अपने समीकरण मजबूत करना चाहती है…राजनीतिक हलकों में ये चर्चा भी तेज हुई कि बीजेपी, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट को संतुलित करने या फिर दबाव में रखने के लिए नए विकल्प तलाश रही है…इसी कड़ी में कांग्रेस के कुछ स्थानीय नेताओं से हाथ मिलाना बीजेपी के लिए एक सियासी दांव माना गया…लेकिन ये दांव कांग्रेस आलाकमान को कतई मंजूर नहीं था….जैसे ही ये खबर पार्टी नेतृत्व तक पहुंची…तुरंत सख्त कदम उठाए गए….महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाळ के निर्देश पर अंबरनाथ की पूरी कांग्रेस इकाई पर कार्रवाई कर दी गई…
कांग्रेस ने न केवल अंबरनाथ ब्लॉक कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष प्रदीप पाटिल को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया…बल्कि नगर परिषद में कांग्रेस के सभी निर्वाचित पार्षदों को भी पार्टी विरोधी गतिविधियों का दोषी मानते हुए निलंबित कर दिया…इसके साथ ही अंबरनाथ ब्लॉक कांग्रेस कमेटी को पूरी तरह भंग कर दिया गया…ये कदम अपने आप में असाधारण है….क्योंकि आमतौर पर पार्टी ऐसे मामलों में सीमित कार्रवाई करती है…लेकिन यहां पूरी इकाई को ही जिम्मेदार ठहराया गया…पार्टी सूत्रों के मुताबिक, ये फैसला सोच-समझकर और शीर्ष स्तर पर चर्चा के बाद लिया गया…कांग्रेस नेतृत्व ये साफ करना चाहता था कि पार्टी की घोषित नीति और विचारधारा से हटकर लिया गया कोई भी फैसला…चाहे वो स्थानीय स्तर पर ही क्यों न हो…बर्दाश्त नहीं किया जाएगा….
इस पूरे सियासी ममाले का सबसे अहम राजनीतिक पहलू यही है कि कांग्रेस ने सीधा बिना किसी देरी के बीजेपी के कथित गठबंधन ऑफर को ठुकरा दिया है….भले ही बीजेपी की ओर से ये गठबंधन किसी स्थानीय मजबूरी, नगर परिषद के गणित या सत्ता संतुलन के नाम पर किया गया हो…कांग्रेस आलाकमान ने इसे पार्टी लाइन के खिलाफ माना……बता दें कांग्रेस लंबे समय से खुद को बीजेपी की नीतियों और विचारधारा के सबसे बड़े राजनीतिक विकल्प के तौर पर पेश करती रही है…ऐसे में बीजेपी के साथ किसी भी स्तर पर हाथ मिलाना कांग्रेस की साख और उसके राजनीतिक नैरेटिव को कमजोर कर सकता था….माना जा रहा है कि यही वजह है कि कांग्रेस आलाकमान ने अंबरनाथ मामले को उदाहरण बनाकर पूरे देश के कार्यकर्ताओं और नेताओं को संदेश दिया कि बीजेपी से नजदीकी की कोई गुंजाइश नहीं है….
महाराष्ट्र की राजनीति में उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे का फैक्टर लगातार चर्चा में रहता है…बीजेपी और शिंदे गुट का गठबंधन भले ही सत्ता में हो…लेकिन अंदरखाने खींचतान की खबरें समय-समय पर सामने आती रहती हैं…राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बीजेपी, शिंदे को पूरी तरह निर्भर बनाए रखने के लिए वैकल्पिक राजनीतिक रास्ते भी खुला रखना चाहती है…ऐसे में स्थानीय स्तर पर कांग्रेस के साथ गठबंधन की खबरों को इसी रणनीति के चश्मे से देखा जा रहा है…ये संदेश देने की कोशिश करी….कि बीजेपी के पास विकल्प हैं और वो जरूरत पड़ने पर नए समीकरण बना सकती है…लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने इस संभावित राजनीतिक खेल को शुरुआत में ही रोक दिया…
कांग्रेस की इस कार्रवाई को पार्टी अनुशासन के लिहाज से एक मजबूत कदम माना जा रहा है…पिछले कुछ सालों में कांग्रेस पर ये आरोप लगता रहा है कि स्थानीय स्तर पर उसके नेता मनमानी करते हैं और केंद्रीय नेतृत्व कमजोर नजर आता है…अंबरनाथ में की गई सख्त कार्रवाई ने इस नेरेटिव को तोड़ने की कोशिश की है….पार्टी ने साफ कर दिया है कि सत्ता के लिए पार्टी सिद्धांतों से समझौता स्वीकार्य नहीं है…चाहे नगर परिषद हो या पंचायत…पार्टी की राष्ट्रीय और प्रदेश नीति सर्वोपरि रहेगी और जो नेता या कार्यकर्ता इसके खिलाफ जाएंगे…उन पर कठोर कार्रवाई तय है…वहीं इसे लेकर राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अंबरनाथ की कार्रवाई केवल एक स्थानीय मामला नहीं है…ये पूरे महाराष्ट्र के कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए चेतावनी है…खासकर उन इलाकों में…जहां स्थानीय स्तर पर बीजेपी के साथ समझौते या तालमेल की अटकलें लगती रहती हैं…
कांग्रेस नेतृत्व ये दिखाना चाहता है कि बीजेपी के साथ किसी भी तरह की एडजस्टमेंट पॉलिटिक्स का दौर अब खत्म हो चुका है….पार्टी अब स्पष्ट वैचारिक लड़ाई के मूड में है और किसी भी तरह के भ्रम या दोहरे संदेश से बचना चाहती है…वहीं राष्ट्रीय स्तर पर भी इस फैसले के मायने हैं…2024 के बाद के राजनीतिक स्थिति में कांग्रेस खुद को विपक्ष की धुरी के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रही है…ऐसे में बीजेपी के साथ किसी भी स्तर पर गठबंधन या समझौते की खबरें इस रणनीति को कमजोर कर सकती थीं…अंबरनाथ में सख्त कार्रवाई कर कांग्रेस ने ये साफ कर दिया है कि वो बीजेपी की राजनीति का विकल्प बनकर ही आगे बढ़ेगी…न कि उसका सहायक बनकर…..ये संदेश न केवल पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए है…बल्कि विपक्षी दलों और आम जनता के लिए भी है…
सूत्रों के मुताबिक, अंबरनाथ में निलंबित नेताओं के खिलाफ आगे और अनुशासनात्मक कार्रवाई भी हो सकती है…पार्टी ये जांच कर रही है कि गठबंधन का फैसला किन परिस्थितियों में लिया गया और इसमें किन-किन नेताओं की भूमिका रही…अगर जरूरत पड़ी तो निष्कासन जैसी कार्रवाई से भी पीछे नहीं हटने के संकेत दिए गए हैं…ये सख्ती कांग्रेस के बदले हुए तेवरों को दिखाती है…पार्टी अब स्थानीय दबाव, सत्ता का लालच या राजनीतिक गणित के नाम पर अपनी घोषित लाइन से हटने को तैयार नहीं है…अंबरनाथ मामले ने महाराष्ट्र की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है…जहां बीजेपी भले ही शिंदे को किनारे करने या दबाव में रखने के लिए नए गठबंधन विकल्पों पर विचार कर रही हो…लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने साफ कर दिया है कि वो इस खेल का हिस्सा नहीं बनेगी…
और यही वजह है कि पूरी स्थानीय इकाई को निलंबित कर कांग्रेस ने ये मजबूत संदेश दिया है कि बीजेपी के साथ किसी भी तरह की नजदीकी उसकी विचारधारा और राजनीति के खिलाफ है…ये फैसला न केवल अंबरनाथ, बल्कि पूरे राज्य और देश की राजनीति में दूरगामी असर डाल सकता है…और साथ ही बीजेपी के लिए भी सीधा संदेश है कि कांग्रेस अब मजबूती के साथ उसे सियासी टक्कर देने को तैयार है.



