बांग्लादेश क्रिकेट मुद्दे पर मोदी सरकार को झटका, नायडू-नीतीश ने खोला विरोध का मोर्चा

दिल्ली की सत्ता का सिंहासन यानि कि पीएम मोदी की कुर्सी एक बार फिर से हिल उठी है और सबसे खास बात यह है कि कुर्सी को हिलाने वाले कोई और नहीं पीएम साहब की दो बैसाखियां यानि कि नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू ही है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क:दिल्ली की सत्ता का सिंहासन यानि कि पीएम मोदी की कुर्सी एक बार फिर से हिल उठी है और सबसे खास बात यह है कि कुर्सी को हिलाने वाले कोई और नहीं पीएम साहब की दो बैसाखियां यानि कि नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू ही है।

हालांकि इस बार मुद्दा पॉलिक्टिक्स नहीं बल्कि क्रिकेट है। वो क्रिकेट जो भारतीयों का जनून है, वो क्रिकेट जो रगों में खून की तरह दौड़ता है और अब इसी क्रिकेट को लेकर न सिर्फ नीतीश कुमार की पार्टी के तेवर तल्ख हुए हैं बल्कि चंद्रबाबू नायडू की पार्टी भी मोर्चा खोलते हुए नजर आ रही है। दोनों दलों का अल्टीमेटम है कि क्रिकेट के मैदान को जंग का मैदान न बनाया है। पूरा मामला क्या है, क्यों नीतीश नाडयू की पार्टी ने क्रिकेट को लेकर मोर्चा खोला है,

कहानी शुरु होती है बांग्लादेश से, जहां हिंदू अल्पसंख्यकों पर इन दिनों जुल्म की इंतहा हो गई है। आए दिन हिंदुओं के साथ हिंसा की बात सामने आ रही है और इसी को लेकर पिछले दिनों पूरे देश में प्रदर्शन भी हो रहे हैं। साथ ही  देश के कुछ संत महात्माओं  और बीजेपी के नेतआों ने आईपीएल  में बांग्लादेश के खिलाड़ियों का मुद्दा उठाया था। खासतौर से आईपीएल में केेकेआर की ओर से खरीदे गए प्लेयर मुस्तफिजुर रहमान को लेकर कुछ ज्यादा ही हंगामा हुआ था।

मुस्तफिजुर बांग्लादेश के अच्छे गेंदबाज है। आईपीएल में उनका प्रदर्शन ठीक रहता है। पिछले दिनों जब मिनी ऑक्शन हुआ था तो इनको खरीदने की होड़ मची थी। चेन्नई सुपर किंग्स, दिल्ली कैपिट्ल्स और आखिर में कोलकाता नाइट  राइर्ड्स खरीदने में कामयाब हुई लेकिन जब ये मामला तूल पकडा तो बीसीसीआई ने अचानक मुस्तफिजुर रहमान को रिलीज करने का आर्डर दे दिया। हालांकि देश के बहुत से लोगों ने इस फैसले का स्वागत किया लेकिन कुछ ऐसे लोग भी थे जो खुलकर इस फैसले के विरोध में भी बोले। क्रिकेट और राजनीति दो अगल-अलग पहलुओं के साथ देखा जाता रहा है। लेकिन बांग्लादेश के मामले के बाद क्रिकेट को जंग के मैदान के रुप में यूज किया जा रहा है,

जिसका असर देश की छवि पर भी पड़ रहा है। ऐसे में नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू की पार्टी ने एक बार फिर से निकल कर मोर्चा संभाला है। और  यहीं से शुरू हुआ है असली ड्रामा। मोदी सरकार को लगा था कि जैसा वो चाहेंगे, वैसा ही उनके सहयोगी मान लेंगे। लेकिन इस बार चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार की पार्टी ने चुप्पी तोड़ दी है।

बीजेपी के अचानक आए इस फैसले पर भाजपा के सहयोगी दलों जैसे जनता दल (यूनाइटेड) और तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के नेताओं ने नाराजगी जाहिर की है। जेडीयू नेता केसी त्यागी ने कहा कि खेल में राजनीति का दखल गलत है और क्रिकेट को राजनीति से अलग रखना चाहिए। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि बांग्लादेश ने एक हिंदू क्रिकेटर को कप्तान बनाकर पॉजिटिव संदेश दिया है। इसी तरह, टीडीपी और अन्य सहयोगियों ने आगाह किया कि क्रिकेट जैसे खेल को राजनीतिक मुद्दों में घसीटना उचित नहीं।

विपक्षी दलों ने भी इसकी कड़ी आलोचना की। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने इसे खेल का अनावश्यक राजनीतिकरण करार दिया और सवाल उठाया कि हम किसे सजा दे रहे हैं- एक व्यक्ति को, एक देश को या उसके धर्म को? तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सांसद सौगत रॉय ने कहा कि बांग्लादेश की राजनीतिक स्थिति चाहे जो हो, इसे राजनीतिक स्तर पर सुलझाया जाना चाहिए और क्रिकेट को इसमें नहीं घसीटना चाहिए।

जैसा कि खबरें आ रही हैं, ऐसे में यह बात पूरी तरह से साफ है कि नायडू और नीतीश ने साफ शब्दों में मोदी सरकार को सलाह दे डाली है। सलाह क्या, ये एक तरह की चेतावनी है। पीएम साहब की दोनों बैसाखियों ने कहा है कि  राजनीति को क्रिकेट से अलग रखिए। सोचिए, जो सरकार खुद को सुपर मानती है, उसे उसके अपने ही गठबंधन के साथी ये बता रहे हैं कि आप गलत कर रहे हैं। नायडू और नीतीश जानते हैं कि बांग्लादेश के साथ रिश्ते खराब करने का असर सिर्फ क्रिकेट पर नहीं, बल्कि व्यापार और क्षेत्रीय शांति पर भी पड़ेगा। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या मोदी सरकार की बैसाखियां अब उनके फैसलों पर ब्रेक लगाने लगी हैं?

हालांकि मोदी सरकार की इस क्रिकेट पॉलिटिक्स का जवाब बांग्लादेश ने भी दिया है। जब मुस्तफिजुर रहमान को आईपीएल से हटाया गया तो बीसीबी ने एक आपात बैठक बुलाई, जिसमें भारत में खेले जाने वाले मैचों को लेकर खिलाड़ियों की सुरक्षा पर चर्चा की गई. बोर्ड ने मौजूदा हालात और बांग्लादेश सरकार की सलाह को ध्यान में रखते हुए यह निष्कर्ष निकाला कि टीम के लिए भारत जाना फिलहाल सुरक्षित नहीं है। पहले जारी शेड्यूल के मुताबिक, बांग्लादेश को कोलकाता में तीन और मुंबई में एक मुकाबला खेलना था।दूसरी ओर भारतीय क्रिकेट बोर्ड से जुड़े सूत्रों का मानना है कि टूर्नामेंट से ठीक पहले मैचों की जगह बदलना आयोजकों और ब्रॉडकास्टर्स के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।

लॉजिस्टिक्स, टिकटिंग और प्रसारण से जुड़े कई मुद्दे खड़े हो सकते हैं।बीसीबी ने साफ किया है कि उनका फैसला किसी विवाद को बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि खिलाड़ियों और सपोर्ट स्टाफ की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए लिया गया है। बोर्ड ने आईसीसी से अपील की है कि हालात को समझते हुए बांग्लादेश के सभी मुकाबलों को भारत के बाहर किसी सुरक्षित स्थान पर कराने पर विचार किया जाए। माना जा रहा है कि आईसीसी श्रीलंका में ही मैचों को अयोजित कराएगा, क्योंकि 7 फरवरी से शुरु हो रहे टी 20 वर्ल्डकप 2026 में श्रीलंका सेकेंड मेजबान देश है। ऐसे में बांग्लादेश के मैच श्रीलंका जा सकते है लेकिन ये मामला सिर्फ यहीं नह है रुका है कि बल्कि भविष्य की बाई लेटरल सीरीजों पर भी संकट खड़ा करता हुआ दिख रहा है।

ऐसे में नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू का विरोध कुछ नया गुल खिला सकता है।शायद बांग्लादेश के साथ क्रिकेट के रिश्ते सही हो जाएं और बांग्लादेश खेलने इंडिया आए। लेकिन जिस तरह से नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नाडयू की पार्टी ने पूरे मामले पर स्टैंड लिया है वो अपने आप में एक अलग दिशा तय करता दिख रहा है। क्योंकि क्रिकेट को राजनीति का मैदान न बनाने को लेकर पीएम साहब की दोनों बैसाखियां जिस तरह से एक साथ आई हैं वो पीएम साहब के लिए शुभ नहीं है। क्योंकि दोनोे पार्टियों ने अपनी सलाह देकर ये साबित कर दिया है कि कोई भी फैसला गठबंधन धर्म के अनुसार ही लिया जाए और अगर गठबंधन की सरकार है तो फैसले में सबकी राय शामिल होनी चाहिए। माना जा रहा है कि नीतीश और नायडू का विरोध सिर्फ क्रिकेट के लिए नहीं है। यह इस बात का संकेत है कि अब गठबंधन की सरकार में तानाशाही नहीं चलेगी।

वैसे भी खेल जोड़ने का काम करता है, तोड़ने का नहीं। लेकिन जब सत्ता का नशा सिर चढ़कर बोलने लगे, तो मैदान पर पसीना नहीं, राजनीति बहने लगती है। नायडू और नीतीश ने जो मोर्चेबंदी की है, इसका क्या असर होगा।

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