ट्रेन में सिविल जज के अशोभनीय आचरण पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा– ‘घिनौना व्यवहार’

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रेन यात्रा के दौरान सीविल जज के अशोभनीय आचरण पर कड़ी आपत्ति जताई है. कोर्ट ने इस आचरण को घिनौना बताया है. टीटीई की शिकायत पर रेलवे अधिनियम के तहत जज के खिलाफ मामला दर्ज हुआ था.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: सुप्रीम कोर्ट ने ट्रेन यात्रा के दौरान सीविल जज के अशोभनीय आचरण पर कड़ी आपत्ति जताई है. कोर्ट ने इस आचरण को घिनौना बताया है. टीटीई की शिकायत पर रेलवे अधिनियम के तहत जज के खिलाफ मामला दर्ज हुआ था.

सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के एक फैसले पर कड़ी आपत्ति जताते हुए उसे चौंकाने वाला बताया है. यह फैसला एक सिविल जज (क्लास-II) की बर्खास्तगी रद्द कर उन्हें सेवा में बहाल करने से जुड़ा है. मामला वर्ष 2018 का है, जब संबंधित न्यायिक अधिकारी पर ट्रेन यात्रा के दौरान अशोभनीय और अनुचित आचरण के गंभीर आरोप लगे थे.

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि न्यायिक अधिकारी का यह घिनौना आचरण है. वह यह समझने में असमर्थ है कि हाई कोर्ट ने इस तरह के गंभीर मामले में हस्तक्षेप कैसे किया. ऐसे मामलों में बर्खास्तगी ही होनी चाहिए थी. पीठ ने न्यायिक अधिकारी और राज्य सरकार दोनों से चार सप्ताह में जवाब मांगा है.

दरअसल, हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने मई 2025 में उस सिविल जज की याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया था, जिसमें उन्होंने अपनी बर्खास्तगी को चुनौती दी थी. हाई कोर्ट ने यह आधार लिया था कि रेलवे मजिस्ट्रेट कोर्ट ने आपराधिक मामले में सबूतों के अभाव में जज को बरी कर दिया था, इसलिए उनकी सेवा समाप्ति उचित नहीं मानी जा सकती. कोर्ट ने यह भी सुझाव दिया था कि विभागीय जांच में सामने आए कुछ छोटे आरोपों पर केवल हल्का दंड दिया जाना चाहिए.

हालांकि, इस फैसले को खुद मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के प्रशासनिक पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल और प्रधान रजिस्ट्रार (सतर्कता) की ओर से दायर याचिका में कहा गया है कि इस घटना की व्यापक मीडिया कवरेज से पूरी न्यायपालिका की छवि धूमिल हुई. याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि डिवीजन बेंच ने विभागीय जांच, प्रशासनिक समिति और फुल कोर्ट के निष्कर्षों को नजरअंदाज कर अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया.

महिला यात्री की सीट पर पेशाब किया
घटना के अनुसार, 2018 में सिविल जज बिना पूर्व अनुमति के इंदौर से जबलपुर ट्रेन से यात्रा कर रहे थे. आरोप है कि यात्रा के दौरान उन्होंने शराब का सेवन किया, सहयात्रियों और रेलवे कर्मचारियों के साथ दुर्व्यवहार किया, टीटीई को कर्तव्य निभाने से रोका और अपने न्यायिक पहचान पत्र का दुरुपयोग कर यात्रियों को धमकाया. यह भी आरोप है कि उन्होंने एक महिला यात्री की सीट पर पेशाब किया.

टीटीई की शिकायत पर दर्ज हुआ था मामला
टीटीई की शिकायत पर रेलवे अधिनियम के तहत आपराधिक मामला दर्ज हुआ था. हालांकि, प्रमुख गवाहों के मुकर जाने और मेडिकल साक्ष्य के अभाव में रेलवे मजिस्ट्रेट कोर्ट ने मार्च 2019 में उन्हें बरी कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि न्यायिक पद पर बैठे व्यक्ति से उच्चतम नैतिकता की अपेक्षा की जाती है और ऐसे मामलों में नरमी न्यायिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को कमजोर कर सकती है.

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