बीएमसी चुनाव के नतीजों केबाद फिर लगा भाजपा पर सियासी दाग!

- शिवसेना-यूबीटी ने बीजेपी पर किए तीखे प्रहार
- जयचंद की मेहरबानी से बन रहा है पहली बार बीजेपी का मेयर : राउत
- राज ठाकरे दहाड़े -यह लड़ाई अब सड़कों, गलियों और मराठी अस्मिता की नसों में उतरेगी
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
मुंबई। बीएमसी चुनाव के नतीजे सामाने आ चुके हैं और तय हो चुका है कि मुंबई का अगला मेयर बीजेपी से होगा। ऐसा पहली बार हो रहा है जब बीएमसी मेयर की कुर्सी पर बीजेपी का मेयर बैठेगा। 227 वार्डों वाले इस महानगर में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। अभी तक बीएमसी पर ठाकरे परिवार का कब्जा रहा है। सरकार किसी कि हो, मुख्यमंत्री कोई भी हो लेकिन बीएमसी की सरकार ठाकरे परिवार ही चला रहा था। बीएमसी नतीजो पर शिवसेना यूबीटी के नेता संजय राउत ने कहा है कि एकनाथ शिंदे जयचंद न बनते तो मुंबई में भाजपा का मेयर कभी नहीं बनता। वहीं राज ठाकरे के भी नतीजो पर दहाड़े हैं और कहा है कि कम मतदान, बिखरा विपक्ष और सत्ता के पूरे संसाधनों से लैस मशीनरी यह चुनाव बंदूक ताने खड़े व्यक्ति और निहत्थे नागरिक के बीच हुआ मुकाबला लगता है। उन्होंने जीत की बधाई दी है और हार के कारण पता लगाने के लिए कार्यकर्ताओं से अहवान किया है।
कभी नहीं बनता बीजेपी का मेयर!
यह तय हो जाने के बाद कि अगला मेयर बीजेपी से होगा पर शिवसेना यूबीटी के नेता संजय राउत का दर्द छलक उठा है। उन्होंने एकनाथ शिंदे पर निशाना साधते हुए उन्हें जयचंद बताया है। संजय राउत ने एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा है कि अगर एकनाथ शिंदे शिवसेना का जयचंद नहीं बनते तो मुंबई में बीजेपी का मेयर कभी नही बनता। मराठी जनता शिंदे को जयचंद के तौर पर याद रखेगी। संजय राउत ने शिवसेना के साथ विश्वासघात करने पर एकनाथ शिंदे को जयचंद का नाम दिया है जिसके इतिहास में सबसे बड़े धोखे के तौर पर जाना जाता है। शिवसेना का बीएमसी की सत्ता पर साल 1997 से 2022 तक लगातार कब्जा रहा है। लेकिन 25 साल बाद बीजेपी गठबंधन ने उन्हें बीएमसी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है।
कैसे जीती बीजेपी बीएमसी चुनाव?
बीएमसी चुनाव में बीजेपी की जीत कोई अचानक हुआ चमत्कार नहीं है। बल्कि यह कई सालों से बुनी जा रही रणनीति का अंतिम परिणाम है। 227 वार्डों वाली देश की सबसे अमीर नगर पालिका को सिर्फ नारों से नहीं जीता जा सकता। इसके लिए संगठन, गठजोड़, जमीनी मैनेजमेंट और नाराज़ लोगों को साधने की कला चाहिए और बीजेपी ने यही किया। सबसे पहला और निर्णायक फैक्टर रहा एकनाथ शिंदे गुट के साथ गठजोड़। 2022 में शिवसेना टूटने के बाद बीजेपी ने यह समझ लिया था कि मुंबई में मराठी वोट को सीधे कुचलना संभव नहीं है उसे तोड़ा और बांटा जा सकता है। शिंदे गुट ने वही काम किया। उद्धव ठाकरे के पारंपरिक शिवसैनिक वोट बैंक में सेंध लगाई। नतीजा यह हुआ कि शिवसेना का वोट एकमुश्त नहीं रहा बल्कि कई धाराओं में बंट गया।
चुनावी गणित की जीत है : राज ठाकरे
एमएनएस नेता राज ठाकरे बीजेपी की जीत को स्वीकार किया है लेकिन वह झुके नहीं। उन्होंने बयान जारी करते हुए साफ संकेत दिये हैं कि यह लड़ाई खत्म नहीं हुई है अब लड़ाई सड़कों, गलियों और मराठी अस्मिता की नसों में उतरेगी। उन्होंने कहा है कि महायुति को बहुमत मिला जरूर है लेकिन आत्मा नहीं। बीजेपी का मेयर बनना चमत्कार नहीं है बल्कि गणित है। वह गणित जिसमें वोट कम पड़े लेकिन असर ज़्यादा दिखाया गया। यह वही हालात हैं जहां जनता बोलती नहीं और सत्ता तय हो जाती है। उन्होंने सवाल पूछते हुए कहा है कि जब आधी मुंबई वोट देने नहीं निकली तब जो जीता वह जनता का प्रतिनिधि नहीं खामोशी का उत्तराधिकारी है।
बड़े चेहरे को आगे नहीं किया बीजेपी ने
चौथा फैक्टर रहा नेतृत्व का विभाजन और कंट्रोल। बीजेपी ने बड़े चेहरों को ज़रूरत से ज़्यादा आगे नहीं किया, ताकि चुनाव स्थानीय लगे। लेकिन पर्दे के पीछे देवेंद्र फडणवीस जैसे नेताओं की रणनीतिक मौजूदगी साफ महसूस की गई। टिकट वितरण से लेकर बागियों को संभालने तक हर कदम पर सख्ती और समझौते का संतुलन रखा गया। पांचवां और निर्णायक कारण रहा कम मतदान। शहरी उदासीनता बीजेपी के पक्ष में गई। जो वोट देने नहीं निकले उन्होंने अनजाने में उस पार्टी का रास्ता साफ किया जिसका कैडर सबसे अनुशासित था। बीजेपी का वोटर घर से निकला विपक्ष का बड़ा हिस्सा घर पर रहा। यह जीत बीजेपी की नहीं बल्कि राजनीतिक गणित, गठजोड़ और संगठनात्मक अनुशासन की जीत है। शिंदे सेना के साथ गठबंधन ने भावनात्मक वोट काटे संगठन ने ज़मीन जीती और रणनीति ने नतीजा तय किया। बीएमसी अब बीजेपी के पास है और यह सिर्फ सत्ता नहीं मुंबई की राजनीति का कंट्रोल रूम है।
स्थानीय चेहरे को आगे रखने की रणनीति कर गयी काम
दूसरा बड़ा हथियार रहा संगठनात्मक ताकत। बीजेपी ने हर वार्ड में बूथ स्तर तक काम किया। पन्ना प्रमुख, डेटा एनालिसिस, स्थानीय मुद्दों की माइक्रो मैपिंग। यह चुनाव एयर कंडीशन कमरों में नहीं एक्सेल शीट और गली नुक्कड़ों में लड़ा गया। पार्टी ने यह भी सुनिश्चित किया कि हर इलाके में स्थानीय चेहरा आगे रहे जिससे बाहरी पार्टी का आरोप कमजोर पड़े। तीसरा अहम पहलू था नाराज़ वर्गों को मनाना। व्यापारियों, बिल्डरों, हाउसिंग सोसायटियों और झुग्गी पुनर्वास से जुड़े लोगों से सीधे संवाद किया गया। संदेश साफ था बीएमसी में बीजेपी का मेयर मतलब तेज़ फैसले कम अड़चनें और सीधी सुनवाई। यह संदेश उन तबकों में गया जो सालों से फाइलों और परमिशन के चक्कर में उलझे थे।




