भूमि घोटाले में घिरे मोदी के लाडले सीएम, 12 हजार बीघे जमीन कब्जाने का आरोप

असम में विधान सभा चुनाव होने है और ऐसे में लगातार हिमंता बिस्वा सरमा हिंदू-मुस्लिम का बड़ा गेम खेलकर चुनाव का धु्रवीकरण करना चाहते हैं। और इसके लिए वो लगातार अर्नगल बयान दे रहे हैं। पिछले दिनों मियां यानि मुस्लिम समुदाय को उन्होेंने पांच के बजाय चार रुपए देने और मुस्लिम समुदाय का अलग थलग करने की अपील कर रहे हैं।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: मुस्लिमों को सरेआम मंचो से गाली देकर दोबारा सत्ता हासिल करने का ख्वाब देख रहे मोदी के लाडले सीएम बुरा फंस गए हैं क्योंकि उन पर बहुत बड़े घोटाले का आरोप लगा है। बड़ी खबर सामने आई है कि एक दो नहीं बल्कि 12 हजार बीघे से ज्यादा की जमीन पीएम साहब के लाडले सीएम ने हड़पी है और जैसे ही ये खबर वायरल होते ही हड़कंप मच गया है।

ऐसे में खुद को सेफ जोन में ले जाने के लिए एक ओर जहां पीएम साहब के लाडले सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने मियां मुस्लिम को लेकर एक बार फिर से तगड़ा जहर उगला है और महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से इसको जोड़ दिया है तो दूसरी ओर उनको ये दांव भी उल्ट पड़ता दिख रहा है। कैसे और कहां से पीएम के लाडले सीएम हिमंता पर 12 हजार बीघे जमीन हड़पने का आरोप लगा है और कैसे पूरे मामले में बड़ा दांव खेलने के चक्कर में हिमंता बुरा फंस गए हैं।

असम में विधान सभा चुनाव होने है और ऐसे में लगातार हिमंता बिस्वा सरमा हिंदू-मुस्लिम का बड़ा गेम खेलकर चुनाव का धु्रवीकरण करना चाहते हैं। और इसके लिए वो लगातार अर्नगल बयान दे रहे हैं। पिछले दिनों मियां यानि मुस्लिम समुदाय को उन्होेंने पांच के बजाय चार रुपए देने और मुस्लिम समुदाय का अलग थलग करने की अपील कर रहे हैं। हालांकि उनका दावा है कि वो ये सबकुछ मुस्लिम समुदाय को नहीं बल्कि बांग्लादेश से आकर जबरन रह रहे मुस्लिमों के लिए कह रहे हैं हालांकि इस पूरे मामले को लेकर जमीअत उलेमा- ए-हिंद ने कड़ा ऐतजराज जताया है। पहले को मुस्लिम पसर्नल लॉ बोर्ड ने इस मामले पर खुद ही रिएक्शन दिया था और सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति से पूरे मामले पर स्वतः संज्ञान लेकर कार्रवाई करने की अपील की लेकिन इस का न राष्ट्रपति का कोई रिएक्शन आया और न ही सुप्रीम कोर्ट ने खुद ही स्वतः संज्ञान लिया तो जमीअत ने अब खुद ही सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है और हिमंता के नफरती बयान के खिलाफ याचिका दायर की है।

जमीयअ का दावा है कि संविधान की शपथ लेने वाला व्यक्ति कोई इस तरह की भाषा और मंचों से खुलेआम कैसे मुस्लिम समुदाय के लोगों को गाली दे सकता है। जमीयत का कहना है कि ये न सिर्फ संविधान का अपमान है बल्कि ये डेमोक्रेसी की मर्यादा का भी खुला अपमान है हालांकि अभी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का कोई रिएक्शन नहीं आया है लेकिन एक ओर जहां याचिका दायर हुई है तो वहीं दूसरी ओर हिमंता का नफरती रंग कम होने के बजाय और चटख हो गया है। हिमंता अब सीधे मियां मुस्लिम को असम से निकालने के लिए नया प्लान ले आए हैं और सबसे चौंका देने वाली बात यह है कि गांधी अपने नफरती काम को महात्मा गांधी के उस बड़े आंदोलन से जोड़ दिया है जिससे महात्मा गांधी ने आजादी दिलाई थी।

शिवसागर जिले में बुधवार को एक कार्यक्रम के दौरान कहा, कि हर रोज हम 20-30 लोगों को बाहर भेजते हैं। लेकिन हम उन्हें लाइन में खड़ा करके ट्रेन में बिठाकर बांग्लादेश नहीं भेज सकते। इसके बजाय ऐसा इंतजाम होना चाहिए कि वे खुद चले जाएं। हमने 1.5 लाख बीघा जमीन से बेदखली की है। उन्हें जमीन नहीं मिलेगी तो वे असम छोड़कर चले जाएंगे। उन्होंने आगे कहा, कि मेरा विचार है कि ऐसा माहौल बनाया जाए जिसमें वे असम में रह न सकें। उन्हें जमीन मत दो, वाहन मत दो, रिक्शा मत दो, ठेला मत दो। फिर बांग्लादेशी खुद चले जाएंगे। हर रोज 20-25 लोग बांग्लादेश भेजे जा रहे हैं, किसी में अदालत जाने की हिम्मत नहीं है। हिमंता ने इसे महात्मा गांधी की नॉन-कोऑपरेशन और सिविल डिसओबिडियंस से जोड़ा। उन्होंने कहा, महात्मा गांधी ने हमें दो चीजें सिखाईं- असहयोग और नागरिक अवज्ञा। जब असम के लोग असहयोग और नागरिक अवज्ञा करेंगे तो वे खुद चले जाएंगे। रिक्शा में चढ़ने से पहले सोचो कि किसका रिक्शा है। इसके साथ ही उन्होंने मियां और मुस्लिम में फर्क करने की बात कही। उन्होंने कहा, मियां वे हैं जो बांग्लादेश से अवैध रूप से आए।

हालांकि कहा जाता है कि ये सिर्फ बयान है लेकिन जिस असल में यह एक नफरती भाषा है और वैसे भी अगर बांग्लादेशी असम में हैं तो पिछले 11 साल से देश में बीजेपी की सरकार है। सरकार ने क्यों नहीं इन बांग्लादेशियों को बाहर खदेड़ा । क्यों सरकार इनको अपने यहां शरण दिए है और कैसे इनके नाम जमीन जायदाद हो गई। सवाल यह भी है कि सिर्फ चुनाव में बीजेपी को बांग्लादेशी और रोहिंग्या याद आते हैं। बिहार में जब चुनाव था तो पूरी बीजेपी को बिहार में रोहिंग्या दिख रहे थे लेकिन सरकार बनने के बाद बिहार में अब रोहिंग्या और बांग्लादेशी का नाम लेने वाला कोई नहीं है। अब इस समय पश्चिम बंगाल और असम में बांग्लादेशी और रोहिंग्या की भरमार हो गई है क्योंकि यहां चुनाव है और चुनाव में वोट लेना है इसलिए अभी बांग्लादेशी और रोहिंग्या का मामला उठा है। अगर सच में है बांग्लादेशी और रोहिंग्या हैं तो उनको तुरंत सरकार क्यों नहीं वापस बांग्लादेश भेजती है। सवाल यह भी है कि क्या ये मोदी सरकार का फेलियर नहीं है। हालांकि अब इस मामले पर असम की ही सिविल सोसाइटी सामने आई है।

43 नागरिकों के एक समूह ने गुवाहाटी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को ज्ञापन दिया। उन्होंने मुख्यमंत्री के बार-बार हेट स्पीच और संवैधानिक रूप से ग़लत करने पर स्वतरू संज्ञान लेने की मांग की। इस समूह में प्रोफेसर हिरेन गोहैन, पूर्व डीजीपी हरेकृष्ण डेका, पूर्व आर्कबिशप थॉमस मेनमपराम्पिल, सांसद अजित कुमार भुइयां और पर्यावरण वैज्ञानिक दुलाल चंद्र गोस्वामी शामिल हैं। ज्ञापन में कहा गया कि मुख्यमंत्री के बयान बंगाली मूल के मुस्लिम समुदाय यानी मियां को निशाना बनाते हैं। ये बयान राजनीतिक से आगे बढ़कर अपमान, सामूहिक कलंक और राज्य समर्थित उत्पीड़न की धमकी देते हैं। उन्होंने एक हालिया बयान का जिक्र किया जिसमें कथित तौर पर लोगों से कहा गया कि उन्हें कम पैसे दें, ताकि वे परेशान हों। इन नागरिकों का कहना है कि यह आर्थिक भेदभाव और सामाजिक अपमान को बढ़ावा देता है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 यानी जीवन और गरिमा के अधिकार का उल्लंघन है। वे चुनावी रोल्स की स्पेशल रिवीजन में हस्तक्षेप का भी आरोप लगाते हैं।

मुख्यमंत्री ने पार्टी कार्यकर्ताओं को मियां के नाम पर आपत्ति दर्ज करने को कहा। यह निष्पक्ष प्रक्रिया को प्रभावित करता है। हालांकि ये बात हाईकोर्ट पर निर्भर करती है कि वो स्वतः संज्ञान लेगी या नहीं। क्योंकि ये कानून मामला है लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि हिमंता बिस्वा सरमा का चरित्र हमेशा से नफरती पोस्टर बॉय का रहा है। हालांकि इस सबके बीच नफरती पोस्टर बॉय के खिलाफ कांग्रेस ने मोर्चा संभाला है। कांग्रेस ने बड़ा खुलासा किया है कि हिमंता बिस्वा सरमा ये सबकुछ सिर्फ और सिर्फ इसलिए कर रहे हैं ताकि उनके 12 हजार बीघे की जमीन हड़कंपने का एजेंडा खुलने न पाए। कांग्रेस का दावा है कि हिमंता और उनके परिवार ने 12 हजार बीघे से ज्यादा की सरकारी जमीन पर कब्जा कर लिया है।

गौरव गोगोई ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया कि सरमा ने इसी भूमि घोटाले को छिपाने के लिए उनके कथित पाकिस्तानी संबंधों का मुद्दा उठाया था। उन्होंने कहा, कि कांग्रेस ने जांच की है और इससे कुछ चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। मुख्यमंत्री और उनके परिवार ने पूरे असम में लगभग 12,000 बीघा जमीन पर कब्जा किया हुआ है। गौरव गोगोई का दावा है कि यह आंकड़ा अंतिम नहीं है, क्योंकि जांच अभी जारी है और आने वाले दिनों में यह बढ़ सकता है। हालांकि जैसे ही कांग्रेस ने यह आंकड़ा जारी किया है, हिमंता सहम गए हैं। उन्होंने एक्स पर एक पोस्ट कर कहा है कि- कांग्रेस की ओर से दिए गए मेरे बारे में दिए गए झूठे, मनगढ़ंत और मानहानिकारक बयानों के लिए नौ फरवरी को जितेंद्र सिंह, भूपेश बघेल, गौरव गोगोई और देबब्रत सैकिया के खिलाफ दीवानी और फौजदारी मानहानि कार्यवाही शुरू करूंगा।

गोगोई के दावों में कोई सच्चाई नहीं है। उन्होंने कहा, उनके इस बयान में क्या सच्चाई है? क्या इतनी बड़ी जमीन रखना संभव है, जबकि भारतीय कानूनों के अनुसार कोई भी व्यक्ति 50 बीघा से अधिक जमीन नहीं रख सकता? यह जमीन सीमा अधिनियम के कारण संभव नहीं है। इसका मतलब है कि गौरव गोगोई को कानूनों की जानकारी नहीं है। उन्होंने कहा, कि अगर गौरव गोगोई के पास कोई जानकारी है, तो उन्हें अदालत जाना चाहिए, जैसा कि लोग रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ अदालत गए थे। बोफोर्स से लेकर वाड्रा मामलों तक, कई मुद्दों पर लोगों ने अदालतों का दरवाजा खटखटाया है। अगर आपके पास दस्तावेज हैं, तो उन्हें उजागर करने के लिए अदालत से संपर्क करें। हालांकि कांग्रेस का दावा है कि अभी जांच चल रही है और जल्द ही इसके पूरी डिटेल सामने आ जाएगी। वैसे जिस तरह से कांग्रेस की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद से हिमंता और उनके परिवार भड़का है, उससे लग रहा है कि हड़कंप मचा हुआ है हालांकि यह बातें किसी सरकारी जांच के बाद ही तय हो पाएंगी कि पूरे मामले की सच्चाई कया है लेकिन फिलहाल कांग्रेस ने बड़ा आरोप और बड़े खेल का उजागर कर दिया है।

ऐसे में साफ है कि असम इस वक्त एक दोराहे पर खड़ा है। एक तरफ वो सत्ता है जो नफरत के बीज बोकर अपनी कुर्सी बचाना चाहती है, और दूसरी तरफ वो नागरिक समाज है जो संविधान की रक्षा के लिए कोर्ट की दहलीज पर खड़ा है। हिमंता बिस्वा सरमा, कोर्ट जाने की धमकी आप दे रहे हैं, लेकिन याद रखिए… जनता की अदालत सबसे बड़ी होती है। 12 हजार बीघा जमीन का सच आज नहीं तो कल, बाहर आकर ही रहेगा। अब देखना यह होगा कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट इस मामले में क्या रुख अपनाते हैं। क्या असम को नफरत की इस आग से बचाया जा सकेगा?

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