20 रुपये रिश्वत केस में 30 साल बाद बरी कांस्टेबल, HC के फैसले से मिटा कलंक  

गुजरात हाईकोर्ट ने अहमदाबाद के एक पुलिस कांस्टेबल को 20 रुपये की कथित रिश्वत के मामले में करीब 30 साल बाद बरी कर दिया...

4पीएम न्यूज नेटवर्कः एक आम आदमी की जिंदगी में न्याय की देरी कितनी महंगी पड़ सकती है.. इसका जीता-जागता उदाहरण गुजरात के अहमदाबाद शहर से सामने आया है.. यहां के वेजलपुर इलाके में तैनात रहे.. पुलिस कांस्टेबल बाबूभाई प्रजापति पर 1996 में सिर्फ 20 रुपये की रिश्वत लेने का आरोप लगा था.. यह मामला पूरे 30 साल तक अदालतों में चला.. आखिरकार, 4 फरवरी 2026 को गुजरात हाई कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया.. और कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष के पास ठोस सबूत नहीं थे.. और गवाहों के बयानों में विरोधाभास थे.. लेकिन यह खुशी ज्यादा देर नहीं टिकी.. फैसले के अगले ही दिन, 5 फरवरी 2026 को बाबूभाई प्रजापति की अचानक मौत हो गई.. उन्होंने अपने वकील से कहा था कि जीवन का कलंक मिट गया है.. अब भगवान मुझे अपने पास बुला लें.. यह शब्द उनकी आखिरी इच्छा जैसे बन गए.. वहीं इस घटना ने पूरे देश में न्याय व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं.. आखिर इतने सालों की देरी क्यों.. और क्या एक बेगुनाह इंसान को इतना लंबा इंतजार न्याय के लिए करना चाहिए..

आपको बता दें कि बाबूभाई प्रजापति की कहानी 1996 से शुरू होती है.. उस समय वे अहमदाबाद के वेजलपुर पुलिस स्टेशन में कांस्टेबल के पद पर तैनात थे.. एक ट्रक ड्राइवर ने उन पर आरोप लगाया कि उन्होंने 20 रुपये की रिश्वत ली थी.. यह रकम आज के समय में बहुत छोटी लगती है.. लेकिन उस वक्त भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत यह एक गंभीर अपराध माना जाता था.. एंटी-करप्शन ब्यूरो ने एक ट्रैप लगाया और बाबूभाई को गिरफ्तार कर लिया.. गिरफ्तारी के समय उनकी उम्र करीब 34 साल रही होगी.. क्योंकि मौत के समय वे 64 साल के थे.. गिरफ्तारी के बाद उनका जीवन पूरी तरह बदल गया.. परिवार पर कलंक लगा, नौकरी पर खतरा मंडराने लगा.. और समाज में इज्जत कम हो गई.. लेकिन यह सिर्फ शुरुआत थी.. मामला अदालत में पहुंचा और लंबी कानूनी लड़ाई शुरू हो गई..

1997 में इस मामले में अहमदाबाद की सत्र अदालत में चार्जशीट दाखिल की गई.. चार्जशीट में आरोप लगाया गया कि बाबूभाई ने ट्रक ड्राइवर से 20 रुपये की रिश्वत मांगी और ली थी.. लेकिन उस समय भ्रष्टाचार के मामलों में सख्ती थी.. लेकिन जांच में कई कमियां थीं.. गवाहों के बयानों में शुरू से ही विरोधाभास थे.. एक गवाह कहता कि रिश्वत ली गई.. दूसरा कहता कि मांगी गई लेकिन ली नहीं.. लेकिन अदालत ने इन पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया.. 2002 में औपचारिक रूप से चार्ज फ्रेम किए गए.. यानी आरोप तय किए गए.. यह प्रक्रिया खुद में दो साल लग गई.. फिर 2003 में गवाहों के बयान दर्ज होने शुरू हुए..

2004 में सत्र अदालत ने अपना फैसला सुनाया.. बाबूभाई को दोषी ठहराया गया.. और उन्हें चार साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई.. साथ में 3,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया.. यह फैसला उनके लिए बड़ा झटका था.. वे कहते थे कि वे निर्दोष हैं, लेकिन अदालत ने अभियोजन पक्ष के सबूतों को पर्याप्त माना.. सजा सुनने के बाद बाबूभाई ने तुरंत गुजरात हाई कोर्ट में अपील दाखिल की.. अपील में उन्होंने कहा कि सबूत कमजोर हैं.. गवाहों के बयान विश्वसनीय नहीं और जांच में गड़बड़ी हुई है.. लेकिन हाई कोर्ट में मामला लंबित पड़ गया.. अपील दाखिल होने के बाद करीब 22 साल तक कोई सुनवाई नहीं हुई.. इस दौरान बाबूभाई की जिंदगी ठहर सी गई.. वे सजा काट चुके थे या नहीं.. लेकिन कलंक उनके साथ चिपका रहा.. परिवार को आर्थिक और मानसिक परेशानी झेलनी पड़ी..

गुजरात हाई कोर्ट में अपील लंबित रहने के दौरान.. यह एक बड़ा सवाल है.. कि भारत की न्याय व्यवस्था में अपीलों का ढेर लगा रहता है.. सुप्रीम कोर्ट के आंकड़ों के अनुसार, हाई कोर्टों में लाखों मामले पेंडिंग हैं.. बाबूभाई का मामला भी इन्हीं में से एक था.. उनके वकील नितिन गांधी ने कई बार सुनवाई की मांग की.. लेकिन कोर्ट की व्यस्तता या अन्य कारणों से देरी होती रही.. इस बीच बाबूभाई की उम्र बढ़ती गई.. वे रिटायर हो चुके थे.. लेकिन पेंशन और अन्य लाभ रुके हुए थे.. समाज में लोग उन्हें भ्रष्टाचारी कहकर देखते थे.. मानसिक तनाव इतना था कि वे अक्सर कहते थे कि न्याय मिले तो अच्छा.. लेकिन 30 साल की देरी ने उनकी जिंदगी के कई साल छीन लिए..

आखिरकार, 4 फरवरी 2026 को गुजरात हाई कोर्ट के जस्टिस एस वी पिंटो ने फैसला सुनाया.. कोर्ट ने अपील को स्वीकार किया और बाबूभाई को सभी आरोपों से बरी कर दिया.. फैसले में कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने आरोप साबित करने के लिए ठोस सबूत पेश नहीं किए.. गवाहों के बयानों में कई विरोधाभास थे.. एक गवाह ने कहा कि रिश्वत ली गई.. लेकिन दूसरे ने कहा कि सिर्फ मांगी गई.. एसीबी की ट्रैप रिपोर्ट में भी कमियां थी.. कोर्ट ने नोट किया कि भ्रष्टाचार के मामलों में सबूत बहुत मजबूत होने चाहिए.. लेकिन यहां ऐसा नहीं था.. साथ ही, दो अन्य कांस्टेबलों को भी बरी किया गया.. जो इस मामले में सह-आरोपी थे.. यह फैसला बाबूभाई के लिए बड़ी राहत था.. क्योंकि 30 साल का कलंक मिट गया..

आपको बता दें कि फैसले के बाद बाबूभाई अपने वकील नितिन गांधी के ऑफिस पहुंचे.. वहां वे बहुत भावुक हो गए.. वकील ने उन्हें बधाई दी और कहा कि अब वे रुके हुए सरकारी लाभों के लिए आवेदन कर सकते हैं.. पेंशन, बैक पे और अन्य सुविधाएं मिल सकती हैं.. लेकिन बाबूभाई ने कहा कि जीवन का कलंक मिट गया है.. अब तो भगवान मुझे अपने पास बुला लें, तो कोई दुख नहीं होगा.. यह बात ऑफिस में लगे सीसीटीवी कैमरे में रिकॉर्ड हो गई.. वकील ने बाद में मीडिया को बताया कि बाबूभाई बहुत खुश थे.. लेकिन थके हुए भी लग रहे थे.. 30 साल की लड़ाई ने उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर कर दिया था.. वे घर चले गए, लेकिन खुशी ज्यादा देर नहीं टिकी..

अगले दिन, 5 फरवरी 2026 को सुबह बाबूभाई प्रजापति की मौत की खबर आई.. परिवार के सदस्यों ने बताया कि वे रात को सोए थे.. लेकिन सुबह नहीं उठे.. डॉक्टरों ने जांच के बाद मौत को प्राकृतिक बताया.. लेकिन यह मौत सामान्य नहीं थी.. यह न्याय की देरी का एक दुखद अंत था.. अगर फैसला पहले आता, तो शायद बाबूभाई ज्यादा दिन जी पाते.. उनकी मौत ने पूरे गुजरात में हलचल मचा दी.. मीडिया में खबरें छपीं, सोशल मीडिया पर चर्चा हुई.. कई लोग कह रहे थे कि न्याय व्यवस्था में सुधार की जरूरत है..

 

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