विपक्ष के एक प्रस्ताव से पलट गई कहानी, स्पीकर की कुर्सी छोड़कर क्यों चले गए ओम बिरला?
जब से बीजेपी ने ओम बिरला को स्पीकर की कुर्सी पर बिठाया है तब से लेकर अब तक ओम बिरला जी ने इस कुर्सी की गरिमा के रसातल में पहुंचा दिया है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: क्या स्पीकर ओम बिरला अब स्पीकर के पद पर फिर कभी नहीं बैठने वाले हैं? क्या उनको मजबूरन अपने पद से इस्तीफा देना पड़ सकत है?
ये सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि एक खबर ने बीजेपी सरकार की रातों की नींद उड़ा दी है। इन खबरों के मुताबिक अब से स्पीकर ओम बिरला ने खुुद ये फैसला लिया है कि वो अब लोकसभा नहीं जाएंगे। इसी खबर से पता चलका है कि विपक्ष नंबर में कम होने के बावजूद सत्ता पक्ष पर कितना भारी पड़ रहा है। वहीं मोदी-शाह एंड कंपनी इस सोच में पड़ गई है कि ओम बिरला नहीं होंगे तो उनको विपक्ष से कौन बचाएगा? कौन सत्ता को पूरा मौका देगा और विपक्ष को बोलने से रोकेगा?
जब से बीजेपी ने ओम बिरला को स्पीकर की कुर्सी पर बिठाया है तब से लेकर अब तक ओम बिरला जी ने इस कुर्सी की गरिमा के रसातल में पहुंचा दिया है। उन्होंने इस कुर्सी पर बैठते हुए आज तक निष्पक्षता और नैतिकता का ऐसा एक उदाहरण नहीं दिया जिसको देखकर कहा जा सके कि ओम बिरला जी बेहद निष्पक्ष हैं और ईमानदारी से अपना काम करते हैं। वैसे तो स्पीकर निष्पक्ष होना चाहिए, लेकिन लोकसभा स्पीकर ओम खुलेआम की छवि सरकार के चाटुकार के रूप में बनकर रह गई। वो खुलेआम अपनी गद्दी का दुरुपयोग करते रहे और सदन में सत्ता पक्ष की ढाल में तब्दील हो गए। जब भी मोदी या सरकार का कोई मंत्री बोलता, तो ओम बिरला ऐसे ध्यान से सुनते जैसे कोई धार्मिक कथा चल रही हो, चेहरे पर मुस्कान, आंखों में श्रद्धा और पूरे सदन में सन्नाटा। लेकिन जैसे ही कोई विपक्षी नेता, खासकर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी खड़े होते, स्पीकर का चेहरा बदल जाता।
तभी उन्हें नियम-कानून याद आने लगते, प्रक्रियाएं दिखने लगती और संविधान की मोटी किताब लहराई जाने लगती। पिछले दिनों का उदाहरण सबके सामने है, जब राहुल गांधी पूर्व आर्मी चीफ जनरल नरवणे की किताब की सिर्फ पांच लाइनें संसद में पढ़ना चाहते थे। वह कोई अफवाह नहीं, कोई आरोप नहीं बल्कि एक पूर्व सेनाध्यक्ष की लिखी किताब का हवाला था। लेकिन तब स्पीकर ओम बिरला सरकार के वकील की तरह खड़े हो गए। उन्होंने एक के बाद एक नियम गिनाए, सरकार का बचाव किया और नेता प्रतिपक्ष को बोलने ही नहीं दिया। लेकिन जब निशिकांत दुबे जैसे सांसद सदन में किताबों का बंडल लेकर पहुंच गए और पूर्व प्रधानमंत्री को लेकर गैर प्रमाणित दावे करने लगे तब ओम बिरला को किसी कानून की याद नहीम आई। हद तो तब हो गई जब स्पीकर ने कांग्रेस की महिला सांसदों पर ये तक आरोप लगा दिए कि वो प्रधानमंत्री मोदी पर अप्रत्यक्ष रूप से हमला करने वाली थी और इसकी उन्हें गुप्त सूचना मिली थी। और इसिलिए उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को अभिभाषण देने और सदन में एंट्री करने से रोक दिया।
यही वो प्वाइंट था जिसके बाद चीजें बगल गई। पहले तो विपक्ष ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया और कहा कि उनका विरोध केवल निशिकांत दुबे को लेकर था। और उनका कहना था कि जब तक नेता विपक्ष को बोलने का मौका नहीं दिया जाता है उससे पहले पीएम कैसे बोल सकते हैं। लेकिन स्पीकर द्वारा कांग्रेस की महिला सांसदों पर लगाए गए बेहद गंभीर और बेबुनियाद आरोपों ने आग में घी डालने का काम किया। प्रियंका गांधी समेत विपक्ष की सभी महिला सांसदों ने स्पीकर को आरोपों को खारिज करते हुए लेटर लिखा। लेकिन इसके बाद भी बात नहीं बनी तो कल समूचे विपक्ष ने लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश करने का फैसला ले लिया।
सूत्रों के अनुसार, कुल 118 सांसदों ने इस नोटिस पर हस्ताक्षर किए। लेकिन एक सांसद ने इसपर साइन नहीं किया और वो थे नेता विपक्ष राहुल गांधी। इसपर कांग्रेस नेताओं की तरफ से तर्क दिया गया कि संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष के नेता का स्पीकर को हटाने की मांग वाली याचिका पर हस्ताक्षर करना सही नहीं माना जाता है। मतलब राहुल गांधी ने सारी परंपराओं ओर नैतिकता का पालन किया। वहीं विपक्ष के सांसदों ने आरोप लगाया कि लोकसभा अध्यक्ष ने स्पष्ट तौर पर पक्षपाती व्यवहार किया और विपक्ष के नेताओं को बोलने की अनुमति नहीं दी। कहा जा रहा है कि अविश्वास प्रस्ताव के नोटिस में विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव में चार घटनाओं का जिक्र किया गया है। इनमें एक में कहा गया कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को बोलने नहीं दिया गया, जबकि उन्होंने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा में चीन के खिलाफ 2020 के घटनाक्रम को उठाया था। इलके अलावा जो महिला सांसदों पर जो स्पीकर द्वारा आरोप लगाया उसका भी उल्लेख किया गया है।
नौ मार्च को बिरला को लोकसभा स्पीकर के पद से हटाने के लिए विपक्ष की ओर से लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा हो सकती है। इस दौरान के कम से कम पचास सांसदों को खड़े होकर समर्थन दिखाना होगा। इसके बाद ही पीठासीन अधिकारी इस प्रस्ताव पर औपचारिक रूप से चर्चा की अनुमति दे सकता है। अब देखिए बजट सत्र का दूसरा चरण 9 मार्च से शुरू होगा. सूत्रों के अनुसार, अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा उसी दिन शुरू हो सकती है. इसी बीच ओम बिरला ने बड़ा फैसला शुरू लेकर सबको चौंका दिया है। खबरों की मानें तो उन्होंने फैसला किया है कि तब तक वो सदन में नहीं जाएंगे और न ही स्पीकर की कुर्सी पर बैठेंगे जब तक उनके खिलाफ विपक्ष के लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा नहीं हो जाती और फैसला नहीं हो जाता।
लोकसभा सचिवालय के सूत्रों ने बताया कि यह ‘नैतिक कदम’ है, ताकि कोई भी पक्ष यह न कह सके कि स्पीकर खुद प्रक्रिया को प्रभावित कर रहे हैं। मतलब कुर्सी पर रहते परंपराओं और नैतिकता को तार तार करने के बाद अब स्पीकर साहब नैतिकता की बात कर रहे हैं। अब देखिए उनका यह कदम संसद में काफी चर्चा का विषय बना हुआ है. विपक्ष इसे स्पीकर के पक्षपात के खिलाफ जीत मान रहा है. ओम बिरला का यह फैसला पहली बार ऐसा है जब कोई स्पीकर ने खुद को ऐसे प्रस्ताव के दौरान अलग-थलग रखने का फैसला लिया है और आने वाले दिनों में संसद की कार्यवाही पर इसका असर देखने को मिलेगा।
एक तरफ जहां स्पीकर ओम बिरला ने खुद अपने कदम पीछे किये तो मोदी के मंत्री अब नई कहानी लेकर आ गए हैं। केंद्रीय संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्षी सांसदों पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि कम से कम 20 से 25 मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के सांसद स्पीकर के चेंबर में घुस गए थे और उन्होंने स्पीकर को गंदी गंदी गालियां दी। उनका कहना कि मैं उस समय वहां मौजूद था। विपक्षी दलों के सांसदों के साथ केसी वेणुगोपाल और प्रियंका गांधी भी मौजूद थीं। उन्होंने भी विपक्षी सांसदों को अमर्यादित बयानबाजी करते हुए नहीं रोका।
कुल मिलाकर मामला अब सिर्फ एक अविश्वास प्रस्ताव का नहीं रह गया है, बल्कि यह लोकसभा की गरिमा और लोकतंत्र की विश्वसनीयता की परीक्षा बन चुका है। जिस कुर्सी को निष्पक्षता और संतुलन का प्रतीक माना जाता है, उसी पर बैठे व्यक्ति पर पक्षपात के गंभीर आरोप लग रहे हैं। विपक्ष इसे अपनी नैतिक जीत बता रहा है, तो सत्ता पक्ष इसे साजिश करार दे रहा है। लेकिन असली सवाल वही है—क्या संसद में सभी को बराबरी से बोलने का हक मिल रहा है या नहीं? अगर स्पीकर को खुद यह कदम उठाकर सदन से दूर रहना पड़ रहा है, तो कहीं न कहीं यह संकेत है कि हालात सामान्य नहीं हैं। आने वाले दिनों में जब इस प्रस्ताव पर चर्चा होगी, तब सिर्फ ओम बिरला का भविष्य तय नहीं होगा, बल्कि यह भी तय होगा कि संसद की कुर्सी सत्ता की ढाल बनेगी या लोकतंत्र की आवाज़। देश की निगाहें अब नौ मार्च पर टिकी हैं, जहां सच और सियासत आमने-सामने खड़े होंगे।



