सवालों से घबराई सरकार ने फिर बंद कर दिया 4PM चैनल

  • बड़ा सवाल लोकतंत्र में आवाज कितनी आजाद
  • इससे पहले भी कई बार सरकार चैनल को बंद करने का प्रयास कर चुकी है
  • नेशनल सिक्योरिटी थ्रेट बता कर जनता की आवाज को दबाने की कोशिश
  • सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद दोबारा चालू हुआ था चैनल
  • हर बार सच और सवालों की ताकत के आगे सत्ता की दीवारें टिक नहीं सकीं
  • 4PM लगातार सरकार की नीतियों फैसलों और राजनीतिक घटनाओं पर तीखे सवाल उठा रहा था

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। जनता की आवाज और देश के नम्बर वन यूटयूब चैनल 4पीएम पर एक बार फिर सरकारी हथौड़ा चला है। चैनल को सरकार की तरफ से बंद करने का फरमान सुना दिया गया है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है इससे पहले भी सरकार ऐसा कर चुकी है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सरकार को बंदिश हटानी पड़ी थी लेकिन कुछ ही महीनों के भीतर एक बार फिर सरकार ने तानाशाही रवैया अपनाते हुए इसे बंद कर दिया है। 4पीएम न्यूज नेटवर्क के संपादक संजय शर्मा का कहना है कि वह न तो झुकेगें और न ही दबेंगे। अगला संघर्ष अब न्याय की चौखट पर होगा जहां से हमे इससे पहले भी इंसाफ मिला है।

जहां चाहा बुलडोजर चला दिया, जिसे चाहा बंद करा दिया

चैनल को बंद किए जाने की खबर के बाद राजनीतिक और पत्रकारिता जगत में भी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं। आम आदमी पार्टी नेता और सांसद संजय सिंह ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताया है। उनका कहना है कि सरकार आलोचना से घबराने लगी है और यही वजह है कि मीडिया के स्वतंत्र मंचों पर दबाव बनाया जा रहा है। सोशल एनालिस्ट डीके त्रिपाठी कहते हैं कि अगर किसी कंटेंट पर आपत्ति है तो पारदर्शी जांच और स्पष्ट प्रक्रिया होनी चाहिए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कार्रवाई किस आधार पर की गई। सरकार ने फैशन बना लिया है कि जब चहां घर पर बुल्डोजर चला दिया और जब चहा चैनल बंद करा दिया। यह गलत है और इसका विरोध सड़कों पर होगा।

आखिर क्यों डर रही है सरकार

सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर सरकार को एक यूट्यूब चैनल से इतना खतरा क्यों महसूस हो रहा है। सरकार का तर्क है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से कुछ कंटेंट आपत्तिजनक था। लेकिन आलोचकों का कहना है कि नेशनल सिक्योरिटी अक्सर वह ढाल बन जाती है जिसके पीछे असहज सवालों से बचने की कोशिश की जाती है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक पिछले कुछ वर्षों में डिजिटल मीडिया ने पारंपरिक मीडिया के समीकरण बदल दिए हैं। पहले खबरों का प्रवाह कुछ बड़े संस्थानों तक सीमित था लेकिन अब यूट्यूब और सोशल मीडिया के जरिए छोटे प्लेटफॉर्म भी लाखों लोगों तक अपनी बात पहुंचा सकते हैं। यही वजह है कि सत्ता के लिए ऐसे मंच ज्यादा असुविधाजनक हो जाते हैं क्योंकि उन पर नियंत्रण पारंपरिक मीडिया जितना आसान नहीं होता। 4पीएम जैसे प्लेटफार्म लगातार सरकार की नीतियों फैसलों और राजनीतिक घटनाओं पर तीखे सवाल उठाते रहे हैं और यही कारण है कि इसे बार बार निशाने पर लिया जाता है। अगर लोकतंत्र में आलोचना को ही खतरा मान लिया जाए तो फिर लोकतंत्र का अर्थ ही बदल जाता है। सवाल पूछना अगर अपराध बन जाए तो जवाबदेही की पूरी व्यवस्था कमजोर पड़ जाती है। इसीलिए कई मीडिया संगठनों और स्वतंत्र पत्रकारों ने भी इस कदम पर चिंता जताई है।

नेशनल सिक्योरिटी का बहाना या सवालों का डर?

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी आवाज होती है। जब यही आवाज दबाने की कोशिश होने लगे तो सवाल केवल एक चैनल का नहीं रह जाता, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे पर उठ खड़ा होता है। देश के सबसे भरोसेमंद यूट्यूब प्लेटफार्म 4पीएम पर एक बार फिर सरकारी हथौड़ा चल गया है। सरकार ने नेशनल सिक्योरिटी थ्रेट का हवाला देकर चैनल को बंद करने का आदेश जारी कर दिया। यह पहली बार नहीं है। इससे पहले भी कई मौकों पर इस चैनल को रोकने या दबाने की कोशिशें हुईं। लेकिन हर बार सच और सवालों की ताकत के आगे सत्ता की दीवारें टिक नहीं सकीं।

एक चैनल से इतना क्यों डरती है सरकार?

कुछ समय पहले भी इसी प्रकार के आदेश के बाद मामला अदालत तक पहुंचा और सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के आदेश के बाद चैनल को दोबारा चालू करना पड़ा। लेकिन अब कुछ ही महीनों के भीतर एक बार फिर वही कहानी दोहराई जा रही है। एक बार फिर वही आरोप वही बंदिश और वही सवाल कि आखिर सरकार को एक यूट्यूब चैनल से इतना डर क्यों है।

लोकतंत्र में सवालों की जगह

भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है। इस लोकतंत्र की असली ताकत चुनाव से भी ज्यादा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मानी जाती है। जब मीडिया सवाल पूछता है तो वह केवल सरकार से नहीं बल्कि पूरे सिस्टम से जवाबदेही मांगता है। यही वजह है कि इतिहास में कई बड़े खुलासे और बदलाव पत्रकारिता की वजह से संभव हुए। 4 पीएम का मामला भी उसी बहस का हिस्सा बन गया है क्या डिजिटल दौर में स्वतंत्र मीडिया की जगह सिकुड़ रही है या यह सिर्फ एक कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है। फिलहाल इतना तय है कि यह विवाद जल्द खत्म होने वाला नहीं है। मामला फिर अदालत पहुंचेगा और तब शायद यह फैसला केवल एक चैनल का नहीं बल्कि उस सवाल का भी होगा कि लोकतंत्र में आवाज कितनी आजाद है।

बिना डरे, बिना झुके जारी है कारवां

जब सत्ता और मीडिया का रिश्ता सवालों से ज्यादा समझौतों पर टिकने लगे, तब कुछ आवाजें ऐसी भी होती हैं जो हर कीमत पर सवाल पूछने की हिम्मत रखती हैं। 4पीएम भी उन्हीं आवाजों में से एक माना जाता है। चैनल के संपादक संजय शर्मा ने साफ शब्दों में कहा है कि वह न तो झुकेंगे और न ही दबेंगे। उनका कहना है कि अगर सवाल पूछना अपराध है तो यह अपराध वह आगे भी करते रहेंगे। उनके मुताबिक यह केवल एक चैनल को बंद करने का मामला नहीं है बल्कि यह उस सोच का हिस्सा है जिसमें आलोचना को दुश्मनी और सवाल को साजिश मान लिया जाता है। 4पीएम के दर्शकों का भी यही कहना है कि चैनल ने हमेशा उन मुद्दों को उठाया जिन्हें अक्सर मुख्यधारा के बड़े प्लेटफार्म नजरअंदाज कर देते हैं। बेरोजगारी, महंगाई, किसानों के सवाल, और सत्ता से जुड़े विवाद इन सब पर लगातार सवाल उठाने की वजह से यह प्लेटफार्म तेजी से लोकप्रिय हुआ। यही कारण है कि सोशल मीडिया पर इसके समर्थकों का बड़ा समूह है। जब भी चैनल के खिलाफ कार्रवाई होती है डिजिटल दुनिया में विरोध की आवाजें तेज हो जाती हैं। संपादक संजय शर्मा कहते हैं कि उन्हें पूरा भरोसा है कि न्यायपालिका एक बार फिर लोकतंत्र की आवाज को बहाल करेगी। उनके शब्दों में सच को थोड़ी देर के लिए रोका जा सकता है हमेशा के लिए नहीं।

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