पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव बीजेपी की कांटो भरी राह

  • नहीं हो पा रहा जुगाड़, मोदी सरकार के सामने चुनौतियों का पहाड़
  • युद्ध की थकान, महंगाई की मार और विदेश नीति पर उठते सवाल
  • फिलहाल बीजेपी के लिए स्थिति जटिल
  • मोदी के सामने सिर्फ विपक्ष नहीं बल्कि हालात भी खड़े हैं

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। किसी भी युद्ध के बाद जो माहौल बनता है उसमें आमतौर पर सरकार को फायदा मिलता है। राष्ट्रवाद का उबाल, सुरक्षा का सवाल और मजबूत नेतृत्व की छवि। लेकिन इस बार कहानी इतनी सीधी नहीं है। क्योंकि युद्ध के साथ-साथ जो चीजे देश में जबर्दस्ती घुस आयी हैं वह है पेट्रोल और गैस की किल्लत महंगाई की मार और आम आदमी की जेब पर सीधा हमला। अब सवाल यही है कि पांच राज्यों में होने जा रहे चुनाव पर इन चीजों का कितना असर होगा। सरकार किसी भी कीमत पर पश्चिम बंगाल चुनाव मे फतह हासिल करना चाहती है और बाकी की जगह अपनी जीत का मोमेंटम बरकरार रखना भी एक चुनौती है। देश एक अजीब मोड़ पर खड़ा है। एक तरफ युद्ध का तनाव दूसरी तरफ रोजमर्रा की जिंदगी में घुसती महंगाई और इसी बीच चुनावों का बिगुल। इसे अगर कोढ़ में खाज कहा जाए तो गलत नहीं होगा। क्योंकि हालात ऐसे हैं जहां जनता राहत चाहती है लेकिन सियासत उसे फिर से रणभूमि में खींच लाई है। अब सवाल यह है कि क्या जनता सिर्फ राष्ट्रवाद के नाम पर वोट देगी या फिर अपनी रसोई में जलते चूल्हे को भी देखेगी?

क्या बीजेपी के लिए जीत आसान होगी?

अगर हालात सामान्य होते तो शायद जवाब हां में आ सकता था लेकिन इस बार कहानी सीधी नहीं है बल्कि उलझी हुई परतदार और खतरनाक तरीके से अनिश्चित है। कागज पर देखें तो बीजेपी के पास सब कुछ है मजबूत संगठन, असीम संसाधन, और सबसे बड़ा चेहरा नरेन्द्र मोदी लेकिन जमीन पर तस्वीर उतनी आसान नहीं दिखती। सबसे पहली चुनौती है क्षेत्रीय किलों की मजबूती। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी सिर्फ एक मुख्यमंत्री नहीं हैं। वह एक राजनीतिक भावना बन चुकी हैं। उनका दिल्ली बनाम बंगाल वाला नैरेटिव बीजेपी की हर रणनीति को स्थानीय बनाम बाहरी की बहस में बदल देता है। ममता का अंदाज टकराव का है और यही टकराव उनके समर्थकों को और ज्यादा एकजुट करता है।

क्या इसबार मोदी फैक्टर काम करेगा

बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत यही रही है कि वह चुनाव को लोकल से उठाकर नेशनल बना देती है। लेकिन इस बार दिक्कत यह है कि महंगाई, बेरोजगारी और युद्ध की आर्थिक थकान जैसे मुद्दे सीधे जनता की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े हैं। मतदाता अब सिर्फ नेतृत्व नहीं बल्कि नतीजे भी देख रहा है। यानी यह चुनाव सिर्फ चेहरों का नहीं बल्कि हालात बनाम हुकूमत का मुकाबला बनता जा रहा है। इस चुनाव की सबसे दिलचस्प बात यह है कि केंद्र बनाम राज्य का टकराव। एक तरफ पीएम नरेन्द्र मोदी की राष्ट्रीय छवि दूसरी तरफ ममता और स्टालिन जैसे क्षेत्रीय दिग्गज। ममता बनर्जी खुद को संघर्ष की प्रतीक के रूप में पेश कर रही हैं जो दिल्ली की ताकत से लड़ रही हैं। उनका हर बयान हर आरोप इसी नैरेटिव को मजबूत करता है। स्टालिन भी तमिल पहचान और क्षेत्रीय स्वाभिमान के मुद्दे को आगे बढ़ा रहे हैं। इन दोनों नेताओं की खासियत यह है कि वे अपने राज्यों में सिर्फ नेता नहीं बल्कि भावना बन चुके हैं। और चुनाव में भावना अक्सर गणित पर भारी पड़ जाती है।

देश के भीतर आर्थिक बेचैनी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सामने यह शायद सबसे जटिल चुनावी चुनौती है। एक तरफ अंतरराष्ट्रीय मंच पर उनकी छवि जहां इजरायल से नजदीकी और फिर ईरान की नाराजगी जैसे मुद्दे हैं दूसरी तरफ देश के भीतर बढ़ती आर्थिक बेचैनी। विदेश नीति के मोर्चे पर भी सवाल उठ रहे हैं। इजरायल के साथ गले मिलना और उसके बाद पश्चिम एशिया में संतुलन बिगडऩा क्या इसका असर भारत के ऊर्जा हितों पर पड़ा? क्या यही वजह है कि तेल और गैस की आपूर्ति पर दबाव दिख रहा है? जनता इन सवालों का जवाब चाहती है और चुनाव वही मंच है जहां जवाब मांगे जाएंगे। और यहीं से यह चुनाव सामान्य नहीं बल्कि पीएम मोदी के लिए अग्निपरीक्षा बन जाता है।

जनता को राहत की जगह मिल रही है मुश्किलें

युद्ध होते है खत्म होते है, फिर होते लेकिन युद्ध का असर लंबे समय तक दुनिया के साथ चलाता है। भारत में भी यही देखने को मिल रहा है। पेट्रोल और एलपीजी की कीमतों में उछाल सप्लाई चेन पर दबाव और बाजार में अनिश्चितता। इन सबने मिलकर एक ऐसा माहौल बना दिया है जहां जनता राहत की उम्मीद कर रही थी लेकिन उसे और मुश्किलें मिल रही हैं। तेल की कीमत सिर्फ एक आंकड़ा नहीं होती। यह हर चीज को प्रभावित करती है। सब्जी से लेकर ट्रांसपोर्ट तक। जब गैस का सिलेंडर महंगा होता है तो उसका असर सीधे घर की रसोई पर पड़ता है। युद्ध के बाद सरकार पर यह जिम्मेदारी होती है कि वह स्थिति को स्थिर करे। लेकिन यहां सवाल उठ रहा है क्या सरकार उस मोर्चे पर सफल रही है?

चुनावी गणित पर भारी पड़ते मौजूदा हालात

यह चुनाव सिर्फ सीटों का खेल नहीं है। यह उस सवाल का जवाब है क्या राष्ट्रीय नेतृत्व स्थानीय गुस्से पर भारी पड़ेगा? मोदी के सामने चुनौती साफ है उन्हें न सिर्फ अपनी छवि बचानी है बल्कि उस आर्थिक और सामाजिक असंतोष को भी संभालना है जो धीरे धीरे बढ़ रहा है। ममता बनर्जी और स्टालिन जैसे नेता इस असंतोष को अपने पक्ष में मोडऩे की कोशिश कर रहे हैं। युद्ध की थकान महंगाई की मार और विदेश नीति पर उठते सवाल ये सब मिलकर बीजेपी के लिए स्थिति को जटिल बना रहे हैं। लेकिन राजनीति में कुछ भी तय नहीं होता। एक सही नैरेटिव एक बड़ा फैसला और खेल बदल सकता है। फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि यह चुनाव आसान नहीं है इस बार मोदी के सामने सिर्फ विपक्ष नहीं बल्कि हालात भी खड़े हैं।

विदेश नीति ने खोया संतुलन

विपक्ष यही नैरेटिव बना रहा है कि सरकार ने विदेश नीति में संतुलन खो दिया जिसका असर अब देश की अर्थव्यवस्था पर दिख रहा है। हालांकि सरकार का पक्ष है कि वैश्विक परिस्थितियों की वजह से यह संकट आया है। लेकिन चुनाव में ग्लोबल फैक्टर नहीं बल्कि लोकल दर्द काम करता है। और यही दर्द अब वोट में बदल सकता है।

बीजेपी के लिए हर राज्य में हालात चुनौतीपूर्ण हैं

एमके स्टालिन ने अपनी छवि एक स्थिर प्रशासनिक और भरोसेमंद नेता के रूप में बनाई है। द्रविड़ राजनीति की जड़ें इतनी गहरी हैं कि बीजेपी के लिए वहां जगह बनाना सिर्फ चुनावी रणनीति से संभव नहीं यह एक लंबी वैचारिक लड़ाई है। केरल में मुकाबला पारंपरिक है लेफ्ट बनाम कांग्रेस। बीजेपी यहां लगातार कोशिश कर रही है लेकिन अभी भी वह तीसरे खिलाड़ी की भूमिका से बाहर नहीं निकल पाई है। वोट शेयर बढ़ा है लेकिन सत्ता तक पहुंचने का रास्ता अभी भी लंबा और कठिन है। असम में जरूर बीजेपी मजबूत दिखती है लेकिन यहां भी तस्वीर पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। स्थानीय मुद्दे पहचान, नागरिकता, और क्षेत्रीय असंतोष। कभी भी चुनावी गणित को पलट सकते हैं। नॉर्थ ईस्ट की राजनीति अक्सर आखिरी वक्त में अप्रत्याशित मोड़ लेती है।

Related Articles

Back to top button