भ्रष्ट सिस्टम, सुनियोजित लूट कालाबाजरियों की बल्ले-बल्ले

  • यूपी में 17 हजार छापें, 17 गिरफ्तार
  • लाल सिलेंडर से काली कमाई
  • पेट्रोल/डीजल से करोड़ों के वारे न्यारे!
  • हैदराबाद के कब्रिस्तान में छिपाए गए 414 एलपीजी सिलेंडर जब्त, 10 गिरफ्तार
  • अब पसरने लगा है युद्ध का असर, भारतीय मुद्रा में रिकार्ड गिरवाट
  • गल्फ कंट्रीज से वापस लौटते श्रमिक

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। लापरवाह सरकार, निरंकुश सिस्टम और बेबसी के आलम में जीता आम आदमी। जी हां यह कोई छोटी मोटी गड़बड़ी नहीं है बल्कि एक सुनियोजित लूट का तंत्र है जिसमें सिस्टम की सुस्ती और सरकार की ढिलाई खुलकर सामने आ रही है।
सवाल उठता है कि क्या सरकारें इतनी बेबस हैं कि कालाबाजारियों पर लगाम नहीं लगा पा रहीं या फिर यह सब उनकी आंखों के सामने ही हो रहा है? उत्तर प्रदेश में कालाबाजारियों पर पड़े 17 हजार से ज्यादा छापे इस बात का सबूत हैं कि खेल कितना बड़ा है। वही हैरत की बात है कि अब कब्रिस्तान सिलेंडर छुपाने की जगह के तौर पर इस्तेमाल होने की खबरें आ रही है। छापों की संख्या जितनी बड़ी है उतना ही बड़ा सवाल भी अगर कार्रवाई हो रही है तो फिर कालाबाजारी रुक क्यों नहीं रही?

कब्रिस्तान में सिलेंडर नहीं व्यवस्था की लाश दबी

हैदराबाद के पाश इलाके में जो सामने आया वह सिर्फ एक पुलिस कार्रवाई नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की चीर-फाड़ है। बंजारा हिल्स के नागार्जुन चौराहे के पास कब्रिस्तान जहां लोगों की यादें दफन होती हैं वहीं सैकड़ों एलपीजी सिलेंडर छिपाकर काले बाजार का खेल खेला जा रहा था। 414 सिलेंडर, करीब 22 लाख का माल और 10 गिरफ्तारियां आंकड़े चौंकाते हैं लेकिन असली सवाल इससे भी ज्यादा खतरनाक है इतना बड़ा रैकेट कब्रिस्तान में पलता रहा और सिस्टम को भनक तक नहीं लगी? यह कोई छोटे स्तर का जुगाड़ नहीं था। घरेलू और कमर्शियल दोनों सिलेंडर अलग/अलग कैटेगरी पूरा स्टाक प्लानिंग के साथ छिपाया गया। 47 किलो से लेकर 5 किलो तक हर साइज का सिलेंडर मौजूद। मतलब साफ है कि यह कोई अचानक बना नेटवर्क नहीं बल्कि संगठित जमाखोरी का धंधा था जिसमें सप्लाई चेन से लेकर डिस्ट्रीब्यूशन तक सब सेट था। और इस पूरे खेल का मास्टरमाइंड गैस एजेंसी चलाने वाला शख्स यानी सिस्टम के भीतर बैठा वही खिलाड़ी निकला। पुलिस ने कार्रवाई की रैकेट पकड़ा यह अपनी जगह ठीक है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हर बार इसी तरह रेड के बाद कहानी खत्म हो जाएगी? या फिर यह सिर्फ बर्फ की चोटी है जिसके नीचे और बड़ा नेटवर्क छिपा है? क्योंकि जब तक सप्लाई के हर स्तर पर जवाबदेही तय नहीं होगी तब तक कब्रिस्तान बदलते रहेंगे लेकिन कालाबाजारी नहीं रुकेगी।

आर्थिक संकट नहीं जीने की जंग

आम आदमी के लिए यह सिर्फ आर्थिक संकट नहीं बल्कि जीने की जंग बन चुका है। एक तरफ रोजमर्रा की जरूरतें आसमान छू रही हैं तो दूसरी तरफ सिस्टम का भरोसा जमीन में गड़ता जा रहा है। हर संकट में आपदा को अवसर बनाने वालों की पौ बारह हो जाती है और आम आदमी हर बार की तरह ठगा रह जाता है। सवाल वही पुराना है कि क्या यह महज प्रशासनिक विफलता है या फिर एक ऐसा ढांचा तैयार हो चुका है जहां संकट भी मुनाफे का जरिया बन जाता है। यह सवाल सिर्फ सरकार से नहीं पूरे सिस्टम से है क्योंकि जब रसोई का चूल्हा बुझता है तब राजनीति के बड़े बड़े दावे भी राख में बदल जाते हैं।

कोरोना में भी यही हुआ था

अभी बहुत समय नहीं गुजरा है कोरोना काल की याद आते ही नजारा आखों के सामने घूम जाता है। तब भी दवाईयों से लेकर आक्सीजन सिलेंडर तक और एंम्बूलेंस से लेकर साग सब्जी तक सभी चीजों पर दोगुनी/चौगनी कीमत वसूली गयी थी। आज भी वहीं हो रहा है। सरकार कह रही है कि पेट्रोल/डीजल की कमी नहीं है तो फिर एलपीजी के जहाजों के आने की खबरें भी लगातार आ रही है तो फिर यह जानना जरूरी है कि इस क्राइसेस के पीछे कौन है? क्या यह मैन मेड समस्या है ? पेट्रोल पंप पर लंबी लाइन रसोई में खाली सिलेंडर और जेब में बढ़ती बेबसी। यह कोई अपवाद नहीं बल्कि आज के भारत की जमीनी सच्चाई है। सवाल सिर्फ महंगाई का नहीं बल्कि उस सिस्टम का है जो हर संकट के समय आम आदमी को उसके हाल पर छोड़ देता है। अब मध्य पूर्व के संकट की आहट के बीच फिर वही कहानी दोहराई जा रही है जहां 950 रुपये का गैस सिलेंडर 4 हजार में बिक रहा है और जिम्मेदार लोग या तो खामोश हैं या नाकाफी।

टूटता रूपया, छूटती नौकरियां

मध्य पूर्व में उठती जंग की लपटें अब भारत के आम आदमी की जेब तक पहुंच चुकी हैं। असर साफ है। रुपया रिकार्ड गिरावट की ओर फिसल रहा है और खाड़ी देशों में काम कर रहे लाखों भारतीय श्रमिकों की वापसी का सिलसिला तेज होने लगा है। जो कल तक विदेशी मुद्रा भेजकर घर चलाते थे आज खुद घर लौटने को मजबूर हैं। सवाल सिर्फ अंतरराष्ट्रीय संकट का नहीं बल्कि उस तैयारी का है जो हर बार ऐसे हालात में नदारद दिखती है। रुपये की कमजोरी का मतलब सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं है बल्कि यह सीधे महंगाई ईधन की कीमत और रोजमर्रा के खर्च पर चोट है। दूसरी तरफ गल्फ से लौटते श्रमिक सिर्फ बेरोजगारी ही नहीं बल्कि टूटे हुए सपनों का बोझ भी लेकर आ रहे हैं। उनके पास न वहां काम बचा न यहां कोई ठोस व्यवस्था। हर बार की तरह इस बार भी सिस्टम प्रतिक्रिया में है तैयारी में नहीं। संकट आते ही नीतियां बनती हैं लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। सवाल सीधा है। क्या हम हर बार वैश्विक संकट के बाद ही जागेंगे या कभी पहले से तैयारी भी करेंगे?

यूपी में 17 हजार छापे, 17 गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश में सरकार सख्ती के दावे कर रही है हजारों छापे, दर्जनों गिरफ्तारियां और सैकड़ों पर कार्रवाई। कागजों पर सब कुछ चुस्त दिखता है लेकिन जमीन पर कहानी बिल्कुल उलट है। पेट्रोल पंप पर लंबी कतारें डीजल के लिए भटकते ट्रक और रसोई में महंगे सिलेंडर। यह बताने के लिए काफी है कि सिस्टम कहीं न कहीं बुरी तरह चूक रहा है। सवाल यह नहीं कि छापे कितने पड़े, सवाल यह है कि कालाबाजारी रुक क्यों नहीं रही?

छापे और गिरफ्तारियोंं पर उठे सवाल

12 मार्च से अब तक 17,581 जगहों पर छापेमारी और महज 17 गिरफ्तारियां। यह आंकड़ा खुद सवाल खड़ा करता है। क्या इतना बड़ा नेटवर्क सिर्फ इतने लोगों तक सीमित है या फिर असली खिलाड़ी अब भी पकड़ से बाहर हैं? 224 लोगों पर कार्रवाई का दावा भी तब फीका पड़ जाता है जब बाजार में लूट खुलेआम जारी रहती है। कार्रवाई अगर असरदार होती तो डर दिखता लेकिन यहां तो बेखौफ खेल जारी है। यह सिर्फ कानून/व्यवस्था का मामला नहीं बल्कि भरोसे का संकट है। आपदा अवसर बन जाती है और सिस्टम सिर्फ आंकड़े गिनाता रहे।

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