संसद में नारी वंदन, जमीन पर नारी क्रंदन

महिला आरक्षण बिल पास, हकीकत बेनकाब

  • परिसीमन बिल को विपक्ष ने बताया राजनीतिक नोटबंदी
  • सरकार बिल को नारी शक्ति का प्रतीक बता रही है लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और   
  • दिल्ली में अधिकारों का जश्न, फिरोजाबाद में आरोपों का तूफान
  • परिसीमन बिल से भी विपक्ष आग बबूला सीएम स्टालिन का वार
  • क्या कानून बदलेगा या सिर्फ चुनावी गणित?

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। संसद का विशेष सत्र इतिहास के पन्नों में सदा के लिए इंगित हो गया। इस विशेष सत्र में वैसे तो कई विशेष बिल पास हुए।
लेकिन चर्चा नारी शक्ति वंदन अधिनियम और परिसीमन बिल को रही। दोनों ही बिलों पर अलग-अलग राय सुनी गयी। सरकार ने इसे वक्त की जरूरत बताया तो विपक्ष ने इसे जल्दबाजी में उठाया गया कदम…।

तस्वीर का दूसरा रूख

अब जरा तस्वीर का दूसरा हिस्सा देखिए। दिल्ली में संसद के भीतर महिला सशक्तिकरण की नई इबारत लिखी जा रही है। यह वही बिल है जिसे वर्षों से लंबित बताया जाता रहा, जिसे हर चुनाव में मुद्दा बनाया गया, और अब जब यह पास होने जा रहा है तो इसे ऐतिहासिक कहा जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या कानून बनने भर से हालात बदल जाते हैं? जब एक महिला तहसीलदार को ही अपने वरिष्ठ अधिकारी पर शोषण और भ्रष्टाचार के आरोप लगाने पड़ रहे हों तब यह मान लेना कि संसद में पास हुआ कानून अगले ही दिन महिलाओं की स्थिति बदल देगा यह एक खतरनाक भ्रम भी हो सकता है।

सत्ता के पुनर्संतुलन का खेल

विपक्ष का आरोप है कि सरकार महिला आरक्षण को एक कवर की तरह इस्तेमाल कर रही है। एक ऐसा कवर जिसके पीछे चुनावी नक्शे को अपने पक्ष में ढालने की तैयारी चल रही है। परिसीमन के बाद नई सीटों की संरचना और उन पर महिला आरक्षण की अनिवार्यता। यह संयोजन भविष्य के चुनावों में किसे फायदा देगा यह सवाल अब खुलकर पूछा जा रहा है। दूसरी तरफ, जाति जनगणना को नजरअंदाज करने का मुद्दा इस बहस को और पेचीदा बना देता है। अगर नई सीमाएं तय होनी हैं तो क्या वह सिर्फ कुल जनसंख्या के आधार पर होंगी या सामाजिक संरचना को भी ध्यान में रखा जाएगा? अगर पिछड़े वर्गों का वास्तविक डेटा ही शामिल नहीं होगा तो क्या यह आरक्षण वास्तव में समावेशी कहा जा सकता है?

चर्चा में बिल जमीन पर हंगामा

संसद ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर मोहर लगा दी। बिल के समर्थन और विरोध में स्वर गूंज चुके हैं और बिल के पास होने के बाद अब सत्ता के गलियारों में एक ऐतिहासिक क्षण का जश्न मनाने की तैयारी है। लेकिन ठीक इसी वक्त इसी देश में उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद से उठी एक आवाज इस जश्न के बीच सवालों की ऐसी गूंज पैदा कर रही है जिसे अनसुना करना आसान नहीं। यह आवाज है एक महिला अधिकारी की एक ऐसी अफसर जो खुद सिस्टम का हिस्सा है लेकिन उसी सिस्टम पर शोषण और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगा रही है।

शक्तिमान नारी, एसडीएम जैसा पद फिर भी कमजोर!

फिरोजाबाद की टूंडला तहसील की महिला तहसीलदार राखी शर्मा ने जिस तरह देर रात प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर रमेश रंजन जिलाधिकारी पर आरोप लगाए उसने प्रशासनिक तंत्र की परतें उधेड़ दी हैं। आरोप सिर्फ भ्रष्टाचार का नहीं है बल्कि उस माहौल का है जिसमें एक महिला अधिकारी को काम करने से रोका जाता है दबाव बनाया जाता है और जब वह आवाज उठाती है तो उसे जांच और प्रताडऩा के जाल में फंसा दिया जाता है। सबसे चौंकाने वाला आरोप 1.75 लाख रुपये के आईफोन की कथित रिश्वत का है। आरोप यह कि जांच को खत्म कराने के लिए यह डील हुई। और उससे भी ज्यादा गंभीर बात तहसीलदार का यह कहना कि कुछ ऐसे आरोप भी हैं जिन्हें कैमरे पर बोलना संभव नहीं। यानी जो सामने आया है वह सिर्फ सतह है असली कहानी शायद उससे कहीं ज्यादा गहरी है।

परिसीमन बिल राजनीतिक नोटबंदी की तरह

परिसीमन बिल को लेकर लोकसभा में कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए इसे राजनीतिक नोटबंदी करार दिया है। उन्होंने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि इस प्रक्रिया को जल्दबाजी में लागू करना देश के संघीय ढांचे के लिए नुकसानदायक हो सकता है। शशि थरूर ने मशहूर नारा जस्ट डू इट को उलटते हुए कहा कि डॉन्ट डू इट। उन्होंने 2016 की नोटबंदी का जिक्र करते हुए इसे एक सबक बताया। शशि थरूर ने कहा कि आप परिसीमन को उसी जल्दबाजी में ला रहे हैं जैसे नोटबंदी लाई गई थी। हमने देखा कि उससे कितना नुकसान हुआ। परिसीमन भी राजनीतिक नोटबंदी साबित हो सकता है इसलिए इसे लागू मत कीजिए। उन्होंने आगे कहा कि परिसीमन में तीन बड़े मुद्दों पर ध्यान देना जरूरी है। पहला छोटे और बड़े राज्यों के बीच संतुलन बनाए रखना। दूसरा उन राज्यों के साथ न्याय करना जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण की नीति का पालन किया। शशि थरूर ने आरोप लगाया कि इस बिल से ऐसा लगता है कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में असफलता पाई है उन्हें इनाम दिया जा रहा है जबकि दक्षिणी राज्यों के साथ अन्याय हो रहा है। वहीं डीएम के सांसद कनिमोझी ने भी केंद्र सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि विशेष सत्र में कुछ ही दिनों के भीतर इस बिल को पास कराने की कोशिश साजिश है। संविधान के तहत राज्यों को अपने अधिकार प्राप्त हैं और उन्हें हर फैसले के लिए केंद्र पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार राज्यों के अधिकारों को नजरअंदाज कर रही है और सब कुछ दिल्ली से नियंत्रित करना चाहती है। उनके मुताबिक यह कदम संघीय ढांचे के खिलाफ है और राज्यों की स्वायत्तता को कमजोर करता है। परिसीमन को आरक्षण से जोडऩे पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार महिलाओं के मुद्दों को लेकर न तो गंभीर है और न ही संवेदनशील बल्कि वह 2०11 की जनगणना के आंकड़ों को परिसीमन का आधार बनाकर खुद को ही फायदा पहुंचा रही है।

कानून से तुरंत अधिकार नहीं बल्कि भविष्य का वादा

आलोचना का एक और तीखा पहलू यह है कि यह कानून तुरंत अधिकार नहीं बल्कि भविष्य का वादा बनकर सामने आता है। यानी, महिलाओं को आरक्षण मिलेगा लेकिन कब यह साफ नहीं। यह अनिश्चितता खुद इस पूरे कदम की गंभीरता पर सवाल खड़े करती है। इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ा खतरा यही है कि नारी शक्ति का नैरेटिव कहीं सत्ता शक्ति के खेल में न बदल जाए। अगर आरक्षण का मकसद सिर्फ राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाना है तो उसे तत्काल लागू किया जाना चाहिए। लेकिन अगर इसे परिसीमन और जनगणना के जाल में फंसाकर टाल दिया जाता है तो यह शक और गहरा होगा कि असली मकसद कुछ और है। यह बहस सिर्फ एक कानून की नहीं है यह उस भरोसे की है जो जनता अपने लोकतंत्र पर करती है। अगर कानून के पीछे की मंशा पर ही सवाल उठने लगें तो सबसे बड़ा नुकसान उसी भरोसे का होता है।

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