महिला आरक्षण बिल: क्या विपक्ष ने हराया या सरकार ने खुद रास्ता छोड़ा?
संशोधन पास करने के लिए 352 वोट चाहिए थे, लेकिन सत्ता पक्ष 298 वोट पर सिमट गया. विपक्ष को 230 वोट मिले.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: सतही तौर पर देखें तो यह मोदी सरकार की हार है लेकिन राजनीति में तस्वीर इतनी सीधी नहीं होती.
सरकार इसे महिला आरक्षण के विरोध के रूप में पेश कर रही है. वहीं विपक्ष इसे संघीय ढांचे की रक्षा की लड़ाई बता रहा है, यानी संसद के भीतर की हार चुनावी मैदान में अलग-अलग नैरेटिव बनकर सामने आएगी.
2014 के बाद पहली बार मोदी सरकार किसी बिल पर स्पष्ट बहुमत नहीं जुटा पाई. अब बड़ा सवाल है कि क्या ये महज हार है या एक बड़ा पॉलिटिकल मोमेंट है. दरअसल नारी शक्ति वंदन अधिनियम से जुड़ा संविधान संशोधन पर वोटिंग के दौरान शुक्रवार रात लोकसभा में कुल 528 सांसद मौजूद थे.
संशोधन पास करने के लिए 352 वोट चाहिए थे, लेकिन सत्ता पक्ष 298 वोट पर सिमट गया. विपक्ष को 230 वोट मिले. इसमें दिलचस्प बात ये भी है कि विपक्ष के पास 235 का दावा था, लेकिन 5 वोट कम पड़े. वहीं सरकार के पास 293 का आंकड़ा था, जिसे 5 अतिरिक्त वोट मिले.
इनमें वाईएस जगनमोहन रेड्डी की पार्टी वाईएसआरसीपी के चार सांसद और एक निर्दलीय का समर्थन शामिल रहा. नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 में ही पास हो चुका है, जिसे 16 अप्रैल रात 10 बजे एक्ट के तौर पर नोटिफाई किया गया. लेकिन इसका क्रियान्वयन जनगणना और परिसीमन से जुड़ा है.
कब-कब सरकार को लगा झटका
इससे पहले 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार द्वारा लाया गया आतंकवाद निरोधक कानून (POTA) राज्यसभा में गिर गया था. हालांकि बाद में इसे संयुक्त सत्र बुलाकर पास करा लिया गया था.
1989 में राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार द्वारा लाया गया 64वां संविधान संशोधन (पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा देने के लिए) भी राज्यसभा में गिर गया था. बाद में पीवी नरसिम्हा राव की सरकार में यह 73वें संशोधन के रूप में लाया गया.
कृषि कानून को लिया वापस
इससे पहले मोदी सरकार ने 2014 से अब तक कुछ महत्वपूर्ण फैसला वापस भी लिए हैं. जिसमें कृषि कानून 2020, पास करने के बाद भी वापस लेना पड़ा. वहीं भूमि अधिग्रहण बिल 2015 को ऑर्डिनेंस के जरिए लागू किया गया लेकिन बाद में बिल नहीं लाया गया.
पॉलिटिकल मैसेज सेट करने की कोशिश
अब राजनीतिक सवाल ये उठ रहा है कि क्या सरकार को पहले से पता था कि संख्या कम है? क्या ये तीन दिन का सत्र सिर्फ इस बिल को पास करवाने के लिए था या इसके साथ एक पॉलिटिकल मैसेज सेट करने की कोशिश भी हो सकती है. पास होता तो सरकार को क्रेडिट, अब गिरा तो विपक्ष को कठघरे में खड़ा कर उस पर हमला यानी दोनों तरफ राजनीतिक स्पेस.
संसद में विपक्ष ने इस मुद्दे को महिला आरक्षण से आगे बढ़ाया और इसे परिसीमन और संघीय संतुलन से जोड़ा. कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल समेत कई नेताओं ने इसे राज्यों के बीच पावर बैलेंस का सवाल बताया.
केंद्र सरकार का काउंटर भी तैयार
इस पर केंद्र सरकार का काउंटर भी तैयार था. केंद्रीय गृह मंत्री शाह ने विपक्ष के सवाल पर जवाब तैयार रखा था. इस मुद्दे को महिला प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय के फ्रेम में रखा जाएगा. सरकार का तर्क साफ है, परिसीमन से SC/ST सीटें भी बढ़तीं लेकिन विपक्ष ने इसका समर्थन नहीं किया.
इस बहस में एक नया एंगल भी उभरा, उत्तर बनाम दक्षिण. जनसंख्या आधारित परिसीमन से बड़े राज्यों, जैसे उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व बढ़ सकता है. जबकि दक्षिणी राज्यों में हिस्सेदारी घटने की आशंका जताई जा रही है, यानी यह सिर्फ महिला आरक्षण नहीं बल्कि फेडरल बैलेंस की भी लड़ाई बनती जा रही है.
राजनीतिक नक्शे की नई बिसात
सतही तौर पर देखें तो यह सरकार की हार है लेकिन राजनीति में तस्वीर इतनी सीधी नहीं होती. सरकार इसे महिला आरक्षण के विरोध के रूप में पेश कर रही है. वहीं विपक्ष इसे संघीय ढांचे की रक्षा की लड़ाई बता रहा है, यानी संसद के भीतर की हार चुनावी मैदान में अलग-अलग नैरेटिव बनकर सामने आएगी. अब सवाल ये है कि क्या यह महिला सशक्तिकरण की लड़ाई है. या आने वाले परिसीमन के जरिए राजनीतिक नक्शे की नई बिसात बिछाई जा रही है?



