जंग की आग में फंसे Trump, Iran को मिले तबाही मचाने वाले हथियार
सीजफायर के दौरान जहां अमेरिका अपनी ताकत दोबारा जुटाने में लगा...वहीं ईरान ने इस मौके का इस्तेमाल और भी चालाकी से किया.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: अमेरिका-ईरान में चल रहे तनाव के बीच एक नई कहानी सामने आ रही है…एक ऐसी कहानी जिसमें जंग भले कुछ समय के लिए रुकी हो…लेकिन असली तैयारी पर्दे के पीछे तेज़ी से जारी है…दरअसल, 8 अप्रैल को जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अचानक सीजफायर का ऐलान कर दिया था…उस वक्त ये फैसला काफी चौंकाने वाला था…
आमतौर पर इस तरह के बड़े फैसले लंबी बातचीत और रणनीति के बाद लिए जाते हैं…लेकिन यहां मामला कुछ अलग ही दिखा…माना गया कि ईरान के लगातार और तेज हमलों ने अमेरिकी सेना पर दबाव बना दिया था…कई रिपोर्ट्स में ये भी कहा गया कि अमेरिकी ठिकानों को भारी नुकसान हुआ…जिससे सेना को अपनी स्थिति संभालने के लिए समय चाहिए था…ऐसे में सीजफायर अमेरिका के लिए एक तरह का ब्रेक साबित हुआ…लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती…असली खेल तो यहीं से शुरू होता है…
सीजफायर के दौरान जहां अमेरिका अपनी ताकत दोबारा जुटाने में लगा…वहीं ईरान ने इस मौके का इस्तेमाल और भी चालाकी से किया…ईरान ने सिर्फ अपनी सैन्य ताकत को संभाला ही नहीं, बल्कि उसे और मजबूत करने की दिशा में तेज़ी से काम शुरू कर दिया…यही वजह है कि अब कहा जा रहा है कि…ईरान ने इस सीजफायर को एक रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया…..अब आप सोच रहे होंगे कि कैसे ?
तो सबसे पहले समझते हैं कि ईरान ने किया क्या……..तो जंग के दौरान अमेरिका और उसके सहयोगियों द्वारा कई जगहों पर बमबारी की गई थी…इन हमलों में बड़ी संख्या में हथियार और गोला-बारूद इस्तेमाल हुआ…लेकिन हर हथियार फटता नहीं है…कई बम जमीन में दब जाते हैं या अधूरे फटते हैं…आमतौर पर ये बेकार समझे जाते हैं…लेकिन ईरान ने इन्हें खजाना बना दिया…
सीजफायर के बाद ईरान ने बड़े पैमाने पर ऐसे ही बमों और हथियारों को ढूंढने का अभियान शुरू किया…मलबे के नीचे दबे मिसाइल पार्ट्स, क्लस्टर बम, रॉकेट…इन सबको सावधानी से निकाला गया…यही नहीं, इन हथियारों को सिर्फ हटाया नहीं गया…बल्कि उन्हें लैब में भेजा गया ताकि उनकी जांच की जा सके…
इस प्रक्रिया को आसान भाषा में समझें…तो इसे रिवर्स इंजीनियरिंग कहा जाता है…यानी दुश्मन के हथियार को खोलकर ये समझना कि वो बना कैसे है…उसमें कौन-सी तकनीक इस्तेमाल हुई है और उसे और बेहतर कैसे बनाया जा सकता है………
ईरान इस काम में नया नहीं है…वो पहले भी ड्रोन और मिसाइल तकनीक में इसी तरीके का इस्तेमाल करता रहा है…अब उसने अमेरिका और इजराइल के हथियारों पर भी यही रणनीति लागू कर दी है…इसका सीधा मतलब है कि जो हथियार ईरान पर हमला करने के लिए इस्तेमाल किए गए थे…अब वही हथियार ईरान के लिए सीखने का जरिया बन गए हैं…
यहीं से कहानी में बड़ा मोड़ सामने आता है…जहां अमेरिका को शायद उम्मीद थी कि सीजफायर के दौरान ईरान दबाव में आएगा और समझौते की तरफ बढ़ेगा…लेकिन हुआ इसका उल्टा…ईरान ने अपनी सैन्य ताकत को और बढ़ा लिया…उसने अपनी मिसाइल और ड्रोन क्षमताओं को अपग्रेड किया और नए हथियार बनाने का काम भी तेज कर दिया…
इसके साथ ही ईरान ने अमेरिका और इजरायल के खिलाफ युद्ध में नया हथियार इस्तेमाल करने की धमकी दी है और दावा किया है कि इससे दुश्मन को दिल का दौरा पड़ सकता है…ये चेतावनी ऐसे समय में आई है…जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के उस प्रस्ताव को खारिज कर दिया…जिसमें स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खोलने के बदले अमेरिकी नाकेबंदी हटाने की बात कही गई थी…
ईरान की नौसेना के कमांडर रियर एडमिरल शहराम ईरानी ने सरकारी मीडिया से बातचीत में कहा कि…इस्लामिक गणराज्य बहुत जल्द दुश्मन ताकतों का सामना ऐसे हथियार से कराएगा, जिससे वे बेहद डरते हैं। उन्होंने कहा कि…ये हथियार उनके बेहद करीब है, उम्मीद है उन्हें दिल का दौरा नहीं पड़ेगा। दुश्मनों ने सोचा था कि वो कम समय में अपने मकसद में कामयाब हो जाएंगे, लेकिन अब ये सोच सैन्य अकादमियों में मजाक बन गई है…
मीडिया से बात करते हुए रक्षा विशेषज्ञ संदीप उन्नीथन ने कहा कि…ईरानी संभवतः हूट रॉकेट टॉरपीडो की ओर इशारा कर रहे हैं…जिसका पहला गुप्त परीक्षण 2006 के आसपास किया गया था…ये इतनी तेजी से चलता है कि रक्षा प्रणालियों को प्रतिक्रिया देने का कोई समय नहीं मिलता…
इस हथियार के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है…लेकिन ईरान का दावा है कि ये पानी के भीतर चलने वाले दुनिया के सबसे तेज हथियारों में से एक है…ईरान का कहना है कि ये पानी के भीतर 360 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हमला कर सकता है…जबकि पारंपरिक टॉरपीडो की गति 60 से 100 किलोमीटर प्रति घंटे होती है…हालांकि, इन दावों पर कोई आधिकारिक जानकारी नहीं है….
हालांकि, ईरान ने अपनी पुरानी रणनीति…अंडरग्राउंड सिटीज…को भी और मजबूत किया…आपको बता दें…ये वो गुप्त ठिकाने हैं…जो जमीन के नीचे बनाए जाते हैं…जहां हथियार और मिसाइलें सुरक्षित रखी जाती हैं…जंग के दौरान इन ठिकानों को निशाना बनाना बेहद मुश्किल होता है…
रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने अपने हथियार एक जगह रखने के बजाय देश के अलग-अलग हिस्सों में फैला दिए थे…इससे हुआ ये कि अगर एक जगह हमला होता भी है…तो बाकी जगहों पर हथियार सुरक्षित रहते हैं…ये रणनीति जंग में काफी कारगर साबित हुई…
अब बात करते हैं अमेरिका की कंडीशन की…….तो सीजफायर के बाद अमेरिका एक बार फिर अपने सैनिकों की तैनाती बढ़ा रहा है…पश्चिम एशिया में नए हथियार भेजे जा रहे हैं…यानी साफ है कि अमेरिका भी संभावित संघर्ष के लिए तैयार हो रहा है…लेकिन सवाल ये है कि क्या अमेरिका पहले जितनी मजबूत स्थिति में है?
कई रिपोर्ट्स के मुताबिक, 40 दिनों की जंग के दौरान ईरान ने अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बड़ा नुकसान पहुंचाया….कुवैत, बहरीन, सऊदी अरब, जॉर्डन और कतर जैसे देशों में मौजूद अमेरिकी बेस निशाने पर थे…इन हमलों में रनवे, रडार सिस्टम, कम्युनिकेशन नेटवर्क और यहां तक कि हाई-टेक विमान भी प्रभावित हुए…
सबसे बड़ा झटका तब लगा जब एक एडवांस सर्विलांस विमान…E3 सेंट्री…हमले में तबाह हो गया…इसे अमेरिका की आंख कहा जाता है…क्योंकि ये आसमान से दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखता है…ऐसे अहम सिस्टम का नुकसान अमेरिका के लिए बड़ा झटका माना जाता है…इसके अलावा, कई सैन्य ठिकाने अब भी पूरी तरह काम करने की स्थिति में नहीं हैं…यानी अगर अचानक फिर से जंग शुरू होती है…तो अमेरिका को पहले अपनी बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर ठीक करना होगा…..
अब आते हैं डोनाल्ड ट्रंप के बयान पर…..ट्रंप लगातार कह रहे हैं कि ईरान के सामने दो रास्ते हैं…या तो वो डील करे, या फिर हमले के लिए तैयार रहे…लेकिन दिलचस्प बात ये है कि एक तरफ वो जंग की धमकी दे रहे हैं और दूसरी तरफ अमेरिकी संसद से कह रहे हैं कि अमेरिका कोई जंग लड़ ही नहीं रहा….इस आपसी टकराव की वजह से कहानी और भी उलझ गई है…
जहां ट्रंप का ये भी दावा है कि ईरान के अंदर कई गुट बन चुके हैं और वहां एकता नहीं है…लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग नजर आती है…हर बार जब अमेरिका दबाव बनाता है…ईरान एकजुट होकर जवाब देता है…ईरान की सेना ने भी साफ कह दिया है कि वो किसी भी हमले का जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार है…उनके मुताबिक, अगर अमेरिका कोई गलती करता है…तो उसे तुरंत और कड़ा जवाब मिलेगा…
अब सवाल उठता है कि क्या सीजफायर का फैसला अमेरिका के लिए उल्टा पड़ गया?…तो इसे लेकर कई विशेषज्ञ मानते हैं कि हां, ऐसा हो सकता है…क्योंकि इस ब्रेक का फायदा ईरान ने ज्यादा उठाया है..उसने अपनी कमजोरियों को दूर किया…नई तकनीक हासिल की और अपने हथियारों को अपग्रेड किया…दूसरी तरफ, अमेरिका अभी भी अपनी रणनीति को लेकर स्पष्ट नहीं दिख रहा है…वो एक साथ दो बातें कर रहा है…कभी बातचीत तो कभी धमकी…
इस पूरे घमासान में एक और अहम पहलू है और वो है तकनीक…रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने हाल के सालों में अपनी सैटेलाइट और निगरानी क्षमता को भी मजबूत किया है…इससे उसे दुश्मन के ठिकानों को ज्यादा सटीक तरीके से निशाना बनाने में मदद मिली…यही वजह है कि उसके हमले ज्यादा प्रभावी और सटीक रहे…इससे ये भी साफ होता है कि अब जंग सिर्फ जमीन या हवा में नहीं…बल्कि अंतरिक्ष और तकनीक के स्तर पर भी लड़ी जा रही है…
कुल मिलाकर, यह पूरा मामला सिर्फ एक सीजफायर या एक हादसे की कहानी नहीं है…ये एक बड़ी रणनीतिक लड़ाई है…जिसमें हर कदम सोच-समझकर उठाया जा रहा है…ईरान ने जहां मलबे से हथियार निकालकर उन्हें अपनी ताकत बना लिया…वहीं अमेरिका अब उस स्थिति में नजर आ रहा है…जहां उसे अपने ही फैसलों पर दोबारा सोचना करना पड़ सकता है…आने वाले समय में क्या होगा…ये कहना मुश्किल है…लेकिन इतना जरूर साफ है कि ये खेल अभी खत्म नहीं हुआ है…बल्कि असली मुकाबला तो अब शुरू हो रहा है…जहां हर चाल का जवाब और भी बड़ी चाल से दिया जाएगा…



