ड्रैगन और ईगल की डील के बीच क्या अकेला पड़ जाएगा भारत!

  • बदल जाएगा एशिया की शक्ति का संतुलन, भारत के लिए चेतावनी?
  • ट्रंप-जिनपिंग मुलाकात ने बदली वल्र्ड पॉलिटिक्स नई दोस्ती में सबसे बड़ा दांव भारत पर?
  • सीमा पर तनाव, बाजार पर दबाव और दुनिया में बदलते समीकरण क्या नई चाल चल चुका है चीन?

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। दुनिया की राजनीति में कुछ तस्वीरें इतिहास बदल देती हैं। नेताओं का हाथ मिलाना सिर्फ कूटनीति नहीं होता अक्सर वह आने वाले तूफानों की आहट बन जाता है। चीन के ग्रेट हॉल में जब शी जिनपिंग ने डोनाल्ड ट्रंप का स्वागत किया तब कैमरों ने सिर्फ दो नेताओं की मुस्कान कैद नहीं की बल्कि एक ऐसे भूचाल की पटकथा रिकॉर्ड की जिसकी गूंज नई दिल्ली से लेकर वाशिंगटन और ताइवान स्ट्रेट तक सुनाई दे सकती है। कल तक जो अमेरिका चीन को दुनिया का सबसे बड़ा खतरा बता रहा था वही अमेरिका आज चीन से नए रिश्तों की जमीन तैयार करता दिख रहा है। और यही वह मोड़ है जहां भारत को सबसे ज्यादा सतर्क हो जाने की जरूरत है। क्योंकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थायी दोस्ती नहीं होती सिर्फ स्थायी हित होते हैं। और डोनाल्ड ट्रंप हितों की राजनीति के सबसे बड़े कारोबारी खिलाड़ी माने जाते हैं।

भारत दोस्त भी चुनौती भी

भारत के सामने चुनौती यह है कि वह किसी एक खेमे का हिस्सा बने बिना अपने हित कैसे बचाए। अगर अमेरिका और चीन के रिश्ते सुधरते हैं तो भारत पर दबाव बढ़ सकता है। सीमा विवाद पर चीन और आक्रामक हो सकता है। व्यापारिक प्रतिस्पर्धा तेज हो सकती है। दक्षिण एशिया में चीन का प्रभाव बढ़ सकता है। और सबसे बड़ा खतरा यह कि भारत कहीं जरूरी साझेदार से वैकल्पिक खिलाड़ी न बना दिया जाए। एशिया में शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है। ताइवान, दक्षिण चीन सागर, रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्षों के बीच दुनिया की राजनीति नए मोड़ पर खड़ी है। अगर अमेरिका और चीन टकराव कम करते हैं तो इसका असर पूरी एशियाई राजनीति पर पड़ेगा। जापान, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया और भारत सभी को अपनी रणनीति नए सिरे से तय करनी होगी। भारत के लिए यह सिर्फ विदेश नीति का सवाल नहीं यह आर्थिक और सैन्य सुरक्षा का भी सवाल है। क्योंकि चीन सिर्फ सीमा पर नहीं लड़ता वह बाजार, तकनीक और निवेश के जरिए भी दबाव बनाता है।

भारत पर आने वाला है दबाव!

अगर कल भारत अमेरिका के लिए चीन को रोकने का हथियार था तो आज वही अमेरिका चीन के साथ बैठकर नई आर्थिक डील लिख रहा है। सवाल यह नहीं कि अमेरिका और चीन दोस्त बनेंगे या नहीं सवाल यह है कि अगर दोनों महाशक्तियों के बीच नई समझ बन गई तो भारत की रणनीतिक अहमियत कितनी बचेगी? यह वही चीन है जिसने लद्दाख की बर्फीली चोटियों पर भारत की आंखों में आंखें डालकर तनाव पैदा किया। यह वही चीन है जिसने हिंद महासागर से लेकर दक्षिण एशिया तक भारत को घेरने की कोशिश की। और यह वही चीन है जो अब आर्थिक संकट गिरते बाजार और बेरोजगारी के दबाव में अमेरिका से नरमी चाहता है। लेकिन कहानी का सबसे खतरनाक हिस्सा अभी बाकी है। चीन की प्राथमिकता रिश्ते सुधारने नहीं नहीं बल्कि समय खरीदना है। वह अमेरिका को व्यापार निवेश और बाजार के सपनों में उलझाकर एशिया में अपनी ताकत को स्थायी बनाना चाहता है। और अगर अमेरिका इस खेल में शामिल हो गया तो सबसे बड़ा दबाव भारत पर आएगा। भारत आज सिर्फ एक देश नहीं दुनिया की सबसे बड़ी रणनीतिक जमीन बन चुका है। अमेरिका के लिए भारत चीन के खिलाफ संतुलन है। रूस के लिए भारत भरोसेमंद दोस्त है। पश्चिम एशिया के लिए भारत बड़ा बाजार है। और चीन के लिए भारत एशिया की सबसे बड़ी चुनौती। दुनिया तेजी से बदल रही है और उससे ज्यादा तेजी से बदल रहे हैं गठबंधन। दुश्मन दोस्त बन रहे हैं। और इस बदलती दुनिया में भारत को सिर्फ तालियां नहीं चालें भी समझनी होंगी। क्योंकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सबसे खतरनाक हमला वही होता है जो मुस्कुराकर किया जाए।

ट्रंप राजनीति के कारोबारी खिलाड़ी

डोनाल्ड ट्रंप को समझना दुनिया की राजनीति को समझने जैसा है। ट्रंप विचारधारा से ज्यादा डील में विश्वास करते हैं। उनके लिए कोई स्थायी दुश्मन नहीं कोई स्थायी दोस्त नहीं। अगर व्यापार में फायदा दिखा तो कल का विरोधी आज का साझेदार बन सकता है। यही वजह है कि चीन के खिलाफ टैरिफ युद्ध छेडऩे वाले ट्रंप आज उसी चीन के साथ मंच साझा करते दिखाई दे रहे हैं। कारण साफ है कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था दबाव में है। चुनावी राजनीति में आर्थिक स्थिरता चाहिए। अमेरिकी कंपनियां चीनी बाजार चाहती हैं। और ट्रंप जानते हैं कि दुनिया की सबसे बड़ी उपभोक्ता लड़ाई में चीन को पूरी तरह अलग करना आसान नहीं। लेकिन भारत के लिए खतरा यहीं पैदा होता है। क्योंकि पिछले कई वर्षों में भारत ने खुद को अमेरिका के रणनीतिक सहयोगी के रूप में स्थापित किया। क्वाड से लेकर इंडो-पैसिफिक रणनीति तक भारत अमेरिका के लिए अहम दोस्त बनकर उभरा लेकिन अगर ट्रंप चीन के साथ बड़ी डील कर लेते हैं तो भारत की उपयोगिता का समीकरण बदल सकता है।

चीन की मुस्कान के पीछे छिपा है संकट

शी जिनपिंग की मुस्कान के पीछे भी बेचैनी छिपी हुई है। चीन की अर्थव्यवस्था लगातार दबाव में है। रियल एस्टेट संकट युवाओं में बेरोजगारी, विदेशी निवेश में गिरावट और पश्चिमी कंपनियों का बाहर निकलना इन सबने चीन को अंदर से हिला दिया है। चीन जानता है कि अगर अमेरिका के साथ व्यापार युद्ध लंबा चला तो उसकी आर्थिक रफ्तार टूट सकती है। इसलिए बीजिंग अब नरमी का चेहरा दिखा रहा है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि चीन बदल गया है। ड्रैगन की रणनीति हमेशा लंबी होती है। वह सीधे युद्ध से ज्यादा आर्थिक और रणनीतिक कब्जे में विश्वास करता है। पाकिस्तान से लेकर श्रीलंका और अफ्र ीका तक चीन ने कर्ज और निवेश के जरिए प्रभाव बढ़ाया। अब वह अमेरिका के साथ रिश्ते सुधारकर खुद को फिर स्थिर करना चाहता है। और इस पूरी रणनीति में भारत सबसे बड़ा अवरोध है।

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