नारों से शासन नहीं चलता: शर्मिला रेड्डी

- कांग्रेस नेता का मोदी सरकार पर हमला
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
हैदराबाद। आंध्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष वाईएस शर्मिला रेड्डी ने भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के तहत भारत की आर्थिक नींव और लोकतांत्रिक संस्थानों के क्षरण के संबंध में राहुल गांधी की चिंताओं का समर्थन किया है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और भारत पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर शर्मिला ने आरोप लगाया कि नरेंद्र मोदी सरकार को एक मजबूत अर्थव्यवस्था, विश्वसनीय संस्थान और जनता का महत्वपूर्ण विश्वास विरासत में मिला था, लेकिन उसने पिछले एक दशक में इन्हें लगातार कमजोर किया है।
रेड्डी ने कहा कि राहुल गांधी ने देश को लगातार चेतावनी दी है कि प्रचार, भाई-भतीजावाद और कुछ भर लोगों के हाथों में धन के संकेंद्रण पर आधारित अर्थव्यवस्था बड़े वैश्विक झटकों का सामना नहीं कर सकती। आज, जब दुनिया बढ़ती आर्थिक उथल-पुथल का सामना कर रही है, तो उनकी ये चेतावनियांचिंताजनक रूप से प्रासंगिक साबित हो रही हैं। शर्मिला ने बढ़ती बेरोजगारी, परिवारों पर वित्तीय दबाव, घटती क्रय शक्ति, बढ़ती असमानता और लघु एवं मध्यम उद्यमों के सामने आने वाली चुनौतियों को भारतीय अर्थव्यवस्था की गहरी संरचनात्मक कमजोरियों के संकेतक के रूप में बताया। उन्होंने तर्क दिया कि भाजपा सरकार ने छवि निर्माण और सुर्खियां बटोरने पर ध्यान केंद्रित करते हुए, रोजगार सृजन, उत्पादक निवेश, संस्थागत मजबूती और सामाजिक सद्भाव जैसे सतत विकास के लिए आवश्यक प्रमुख कारकों की उपेक्षा की। उन्होंने टिप्पणी की कि भाजपा ने राजनीतिक विपणन की कला में महारत हासिल कर ली है, लेकिन केवल नारों और प्रचार के दम पर शासन कायम नहीं रह सकता।
देश की आर्थिक मजबूती कमजोर हो गई है, जिससे लाखों आम भारतीय वैश्विक मंदी के परिणामों के प्रति असुरक्षित हो गए हैं।
लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थाओं को किया जा रहा है कमजोर
शर्मिला ने लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थाओं के व्यवस्थित रूप से कमजोर होने पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि जवाबदेही, पारदर्शिता और जनविश्वास के लिए जिम्मेदार निकायों से समझौता किया गया है, जिसके परिणामस्वरूप नागरिकों में अविश्वास बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि भारत की संस्थाएं दशकों से अनगिनत नेताओं और लोक सेवकों के सामूहिक प्रयासों से बनी हैं। अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के लिए इन्हें कमजोर करना देश के लिए भारी कीमत पर आता है। व्यवस्था के भीतर से ही आवाजें देश की दिशा को लेकर चिंता जता रही हैं।



