सरकारी योजनाएं कागजों तक सीमित? बांदा की बस्ती ने खड़े किए कई सवाल

केंद्र और राज्य सरकारें गांव-गांव तक विकास पहुंचाने, हर घर नल, हर घर शौचालय, पक्की सड़क और आवास जैसी योजनाओं के जरिए ग्रामीण भारत की तस्वीर बदलने का दावा कर रही हैं।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में  देश आजादी के बाद विकास की नई-नई इबारतें लिख रहा है।

केंद्र और राज्य सरकारें गांव-गांव तक विकास पहुंचाने, हर घर नल, हर घर शौचालय, पक्की सड़क और आवास जैसी योजनाओं के जरिए ग्रामीण भारत की तस्वीर बदलने का दावा कर रही हैं। चौड़ी सड़कों, एक्सप्रेसवे, स्मार्ट शहरों और आधुनिक बुनियादी ढांचे के बीच विकास की चमक दूर-दूर तक दिखाई देती है। लेकिन जब इन दावों की जमीनी हकीकत परखी जाती है तो कई जगह तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आती है।

उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के बांदा जिले में विकास के दावों और वास्तविकता के बीच की खाई आज भी साफ दिखाई देती है। जिला मुख्यालय से सटे मवई बुजुर्ग गांव की एक दलित बस्ती आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रही है। यहां रहने वाले करीब दो सौ परिवार ऐसे हालात में जीवन गुजारने को मजबूर हैं, जिन्हें देखकर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति का दिल दहल जाए।

सड़क की जगह कीचड़, नाली की जगह जलभराव

चित्रकूटधाम मंडल मुख्यालय बांदा से कुछ ही दूरी पर स्थित मवई बुजुर्ग गांव की इस दलित बस्ती में प्रवेश करते ही विकास के दावों की हकीकत सामने आ जाती है। पूरी बस्ती में कहीं भी पक्की सड़क दिखाई नहीं देती। बरसात के मौसम में कच्चे रास्ते कीचड़ और दलदल में तब्दील हो जाते हैं।

हालात ऐसे हैं कि कई जगह लोगों के घरों के सामने घुटनों तक कीचड़ जमा रहता है। पानी निकासी के लिए नालियों का अभाव होने के कारण बरसाती पानी और गंदा पानी घरों के आसपास ही जमा रहता है। इससे न केवल लोगों का आवागमन प्रभावित होता है बल्कि संक्रामक बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि बरसात के दिनों में इस बस्ती में पैदल निकलना भी मुश्किल हो जाता है। छोटे बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं को सबसे ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ता है।

जल जीवन मिशन का लाभ भी नहीं पहुंचा

सरकार द्वारा हर घर तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाने के लिए जल जीवन मिशन चलाया जा रहा है। बुंदेलखंड जैसे जल संकट प्रभावित क्षेत्र में इस योजना को विशेष महत्व दिया गया है। लेकिन मवई बुजुर्ग की इस दलित बस्ती में स्थिति कुछ और ही कहानी बयां करती है। ग्रामीणों का आरोप है कि आज भी उनके घरों तक नल कनेक्शन नहीं पहुंचा है। पीने के पानी के लिए उन्हें दूर-दराज के हैंडपंपों और अन्य स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है। महिलाओं और बच्चों को रोजाना पानी लाने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।

शौचालय योजना भी नहीं पहुंची जरूरतमंदों तक

खुले में शौच मुक्त भारत का सपना लेकर शुरू की गई योजनाओं का असर भी इस बस्ती में नजर नहीं आता। यहां रहने वाले कई परिवारों के पास आज भी शौचालय की सुविधा नहीं है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार ग्राम पंचायत और प्रशासनिक अधिकारियों से शौचालय निर्माण की मांग की, लेकिन उनकी समस्याओं पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। मजबूरी में आज भी कई लोग खुले में शौच करने को विवश हैं।

प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ भी नहीं मिला

इस बस्ती में रहने वाले अधिकांश परिवार आर्थिक रूप से बेहद कमजोर हैं। कई परिवार आज भी कच्चे मकानों और झोपड़ियों में जीवन बिता रहे हैं। बरसात के दौरान इन कच्चे घरों में पानी भर जाता है और दीवारों के गिरने का खतरा बना रहता है। ग्रामीणों का कहना है कि प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत पक्के मकान का सपना अभी तक पूरा नहीं हो सका है। कई पात्र परिवार वर्षों से आवास की आस लगाए बैठे हैं।

1962 में बसी बस्ती, लेकिन विकास अब तक अधूरा

स्थानीय लोगों के अनुसार यह कोई नई बस्ती नहीं है। गांव का यह हिस्सा वर्ष 1962 से आबाद है। आजादी के छह दशक से अधिक समय बीत जाने के बावजूद यहां मूलभूत सुविधाओं का अभाव बना हुआ है। ग्रामीणों का कहना है कि गांव के दूसरे हिस्सों में विकास कार्य दिखाई देते हैं, लेकिन जैसे ही दलित बस्ती शुरू होती है, विकास की रफ्तार मानो थम जाती है। यही कारण है कि यहां रहने वाले लोग खुद को उपेक्षित महसूस करते हैं।

शिकायतें बहुत हुईं, समाधान नहीं मिला

बस्ती के लोगों का कहना है कि उन्होंने अपनी समस्याओं को लेकर कई बार प्रशासनिक अधिकारियों से शिकायत की है। ग्रामीणों ने जिलाधिकारी कार्यालय तक पहुंचकर सड़क और नाली निर्माण की मांग की, लेकिन उन्हें केवल आश्वासन ही मिला। लोगों का आरोप है कि वर्षों से उनकी समस्याएं फाइलों में दबकर रह गई हैं और जमीनी स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

बेटी की शादी से पहले रो पड़ी मां

बस्ती की बदहाली का सबसे मार्मिक दृश्य तब देखने को मिला जब गांव की महिला आशा देवी अपनी बेटी की शादी को लेकर चिंता जताते हुए भावुक हो गईं। उन्होंने बताया कि 28 जून को उनकी बेटी की बारात आने वाली है, लेकिन गांव की सड़कें कीचड़ से भरी हुई हैं। ऐसे में उन्हें डर है कि बारातियों को गांव तक पहुंचने में भारी परेशानी होगी। आशा देवी का कहना है कि उन्होंने कई बार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से सड़क बनवाने की गुहार लगाई, लेकिन अब तक कोई सुनवाई नहीं हुई। बेटी की शादी की चिंता में उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े।

विकास के दावों पर बड़ा सवाल

मवई बुजुर्ग गांव की यह तस्वीर कई सवाल खड़े करती है। जब सरकारें गांव-गांव तक विकास पहुंचाने का दावा कर रही हैं, तब जिला मुख्यालय से सटी एक बस्ती आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए क्यों तरस रही है?

सड़क, नाली, पानी, शौचालय और आवास जैसी मूलभूत जरूरतों से वंचित यह बस्ती विकास के उन दावों की हकीकत बयां करती है जो अक्सर सरकारी रिपोर्टों और मंचों पर सुनाई देते हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशासन और जनप्रतिनिधि इस बस्ती की आवाज सुनेंगे, या फिर यहां के सैकड़ों परिवार आने वाले वर्षों तक इसी बदहाली और नारकीय जीवन को जीने के लिए मजबूर रहेंगे।

रिपोर्ट- इकबाल खान बांदा

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